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विद्योदय



महापुरुष प्रकाश में नहीं आते, आना भी नहीं चाहते प्रकाश प्रदान में ही उन्हें रस आता हैं उनका कथन किसी श्लोक से कम नहीं उनका लेखन किसी दर्शन से कम नहीं और उनका जीवन किसी शास्त्र से कम नहीं उनका हाथ ही पवित्र पात्र हैं पृथ्वी ही जिनकी सैय्या हैं जिन्हें अप्राप्त की चाह नहीं और प्राप्त का मोह नहीं जो दिगम्बर हैं रोम-रोम में पुरुषार्थ वो परोपकार का सागर लिये अनंत यात्री महापुरुष आचार्य श्री विद्यासागर जी 
आनंदमयो ज्ञानमयो विज्ञानमयो आदित्या

आचार्य श्री की उपस्थिति ही विद्या का उदय हैं विद्योदय हैं !

स्त्रोत : विद्योदय 

पिता

माँ घर का गौरव तो पिता घर का अस्तित्वा होते हैं,
माँ के पास अश्रुधारा तो पिता के पास संयम होता है।
दोनो समय का भोजन माँ बनाती है,
तो जीवन भर भोजन की व्यवस्था करने वाले पिता होते हैं।
कभी चोट लगे तो मुंह से ‘ओह माँ’ निकलता है,
रास्ता पार करते वक़्त कोई ट्रक पास आकर ब्रेक लगाये,
तो ‘बाप रे’ ही निकलता है।
क्योंकि छोटे-छोटे संकट के लिये माँ याद आती है,
मगर बड़े संकट के वक़्त हमेशा पिता ही याद आते हैं।
पिता एक वट वृक्ष है जिसकी शीतल च्हाव मे,
सम्पूर्ण परिवार सुख से रहता है।।
माँ पिता के श्री चरणों में चरण स्पर्श 
~ एल.एस.आर