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धर्म के साथ चिकित्सा सेवा की शुरुआत खजुराहो में

।।कृपया अधिक से अधिक शेयर करे धन्यवाद।।


साभार: पीयूष जैन सुरखी 

सबसे ज्यादा दीक्षाएं प्रदान करने के लिए

गोल्डन बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स ने प्रदान किया सर्टिफिकेट ऑफ़ एक्सीलेंस
मोस्ट जैन मनेस्टसिज़म बिस्टोड बाय अ मुनि

साभार: सौरभ मोदी, सागर 

विद्योदय



महापुरुष प्रकाश में नहीं आते, आना भी नहीं चाहते प्रकाश प्रदान में ही उन्हें रस आता हैं उनका कथन किसी श्लोक से कम नहीं उनका लेखन किसी दर्शन से कम नहीं और उनका जीवन किसी शास्त्र से कम नहीं उनका हाथ ही पवित्र पात्र हैं पृथ्वी ही जिनकी सैय्या हैं जिन्हें अप्राप्त की चाह नहीं और प्राप्त का मोह नहीं जो दिगम्बर हैं रोम-रोम में पुरुषार्थ वो परोपकार का सागर लिये अनंत यात्री महापुरुष आचार्य श्री विद्यासागर जी 
आनंदमयो ज्ञानमयो विज्ञानमयो आदित्या

आचार्य श्री की उपस्थिति ही विद्या का उदय हैं विद्योदय हैं !

स्त्रोत : विद्योदय 

संयम स्वर्ण महोत्सव

आचार्य भगवन ऐसे संत है जिनका जीवन एक सम्पूर्ण दर्शन है जिनके आचरण में जीवों के लिए करुणा पलती है जिनके विचारों में प्राणी मात्र का कल्याण आकर लेता है जिनकी देशना में जगत अपने सदविकास का मार्ग प्रशस्त करता है आप निरीह निस्पृह वीतरागी है फिर भी आपके विचार भारतीयता के प्रति अगाध निष्ठा राष्ट्रभक्ति और कर्तव्यपरायणता से ओतप्रोत है आपका चिंतन प्राचीन भारतीय हितचिंतको दार्शनिको एवं संतो का अनुकरण करते हुए भी मौलिक है आचार्य महाराज तो ज्ञानवारिधी है और उनके विचारों को संकलित करना छोटी सी अंजुली में सागर को भरने का असंभव प्रयास करना है।




।। नमोस्तु भगवन नमोस्तु ।।
आईसपोर्टजैनिज़्म परिवार की ओर से आप सभी को संयम स्वर्ण महोत्सव की ढेरों शुभकामनाएं।

मंदिर तो बहुत बन रहे हैं : आचार्य श्री

मंदिर तो बहुत बन रहे हैं, और बनते रहेंगे, लेकिन हम अव सरस्वती मंदिर की ओर आगे बढ़ रहे है ! आचार्यश्री ने वर्तमान शिक्षा प्रणाली पर प्रहार करते हुये कहा कि आजकल जो शिक्षण दिया जा रहा हैं, वह किसी काम का नहीं हैं , पढ़े लिखे होने के उपरांत भी वह अपने जीवन को उन्नत नहीं बना पाते! उपरोक्त उद्गार संत शिरोमणी आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने रामटेक महाराष्ट्र में चातुर्मास कलश स्थापना के दौरान अपने आशीष वचन में कहे उन्होंने कहा कि वर्तमान में पढ़े-लिखे होकर के भी लाखों की संख्या में बेरोजगारी की ओर नौजवान बढ़ रहे हैं ! पढ़ लिखने के पश्चात भी प्रबंधन सही नहीं होने से श्रम का सही उपयोग नहीं कर पा रहे है! "पहले के लोग अपने बच्चों को दायित्व सिखाते थे, लेकिन वर्तमान शिक्षा प्रणाली में दायित्व का अभाव हैं," आचार्य श्री ने कहा कि अच्छे संस्कारों के लिये अपने धन का सदुपयोग करना आपका कर्तव्य हैं, यदि व्यवस्थित कार्य करोगे तो आपके यहाँ दान दातारों की कमी नहीं है,जब तक कार्य पूरा नहीं होता तब तक भरोसा नहीं होता इसलिये जिन लोगों ने आज बोलियाँ ली हैं वह ११ माह में इस ओर ध्यान दें,उन्होंने कहा कि जीवित धन और जीवित चेतना की ओर हमारी दृष्टि हैं !  जबलपुर हो या रामटेक या चंद्रगिरी। प्रतिभा स्थली तो  हमारी सभी एक ही हैं, बच्चे संस्कारित हों यही आशीर्वाद हमारा प्रतिभा स्थली की ओर हैं।  यहाँ पर ऐसी नींव और परंपरा शुरु हो रही हैं, जो  वर्षों-बरस तक चलती रहे!उन्होंने कहा कि चाहे चंद्रगिरी हो या जबलपुर या रामटेक  प्रतिभा मंडल तो एक ही होता हैं, इसमें हजारों बहनें प्रवेश  पा जाएंगी! उन्होंने कहा विशेष दक्षता प्राप्त आदर्शमति माताजी और बहनों सहित जैन कालोंनी , #इंदौर के लोग प्रबंध कर रहे है! इसमें मेरा कुछ भी नहीं है,गुरू महाराज जी का कहना था कि संघ को गुरूकुल बना देना, सो हम तो उनके उन आदेशों का  ही पालन कर रहे है।गुरुकुल की उस परंपरा की ओर हम जा रहे है आचार्य श्री ने वर्तमान में सरकार द्वारा लागू G S T के बारे में बताते हुये कहा कि यहाँ पर जी एस टी से घबराने की जरूरत नहीं है, हमारे यहाँ की जी एस टी अलग हैं, G मतलब गोमटसार S मतलव समयसार एवं T मतलव तत्वार्थसूत्र। इन तीनों को जो अपने ज्ञान में उतार लेगा उसका संपूर्ण कल्याण हो जाऐगा!उपरोक्त जानकारी अविनाश जैन विदिशा ने जिनवाणी चैनल के माध्यम से देते हुए बताया कि रामटेक में चातुर्मास कलश स्थापना का शानदार एवं जानदार कार्यक्रम संपन्न हुआ। भारतीय विद्यावाणी परिवार की ओर से भारत वर्ष के सभी भामाशाह एवं श्रेष्ठी वर्ग श्री अशोक जी पाटनी, श्री तरूण जी काला, श्री संतोष जी नागपुर, एवं सभी श्रेष्ठी वर्ग को बहुत बहुत बधाई एवं अनुमोदना। कार्यक्रम का सफल संचालन श्री अमित जी पड़रिया जबलपुर ने किया इस अवसर पर लाखों की संख्या में विभिन्न नगरों से आए भक्त जन उपस्थित थे वंही जिनवाणी चैनल के माध्यम से लाखों भक्तों ने इसे लाईव देखा!

रामटेक में एेतिहासिक चातुर्मास कलश स्थापना

नागपुर|रविवार का दिन रामटेक के धार्मिक इतिहास में स्वर्णाक्षरों से लिखा जाएगा। रविवार को राष्ट्रसंत आचार्यश्री विद्यासागर महाराज व संघस्थ 37 मुनि की चातुर्मास कलश स्थापना 25 हजार से अधिक जैन व जैनेत्तर अनुयायियों की उपस्थिति में की गई। अपने प्रथम उद्बोधन में आचार्यश्री ने कहा कि मंदिर बहुत हैं, लेकिन संस्कार देने के लिए प्रतिभास्थली खोलना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि नागपुर जैन समाज ने रामटेक में प्रतिभास्थली खोलने का आशीर्वाद मांगा था। मेरी भी यही इच्छा थी कि महाराष्ट्र के रामटेक में ही प्रतिभास्थली का निर्माण हो। वर्तमान में 250 बहनें ब्रह्मचर्य व्रत लेकर प्रतिभास्थली में शिक्षा को मूर्त रूप दे रही हैं। खुशी की बात है ये बहनें छात्राओं को अन्य सांसारिक शिक्षा के साथ संस्कार भी दे रही हैं।

प्रवचन के पूर्व दानदाताओं का चयन किया गया। प्रथम दानदाता का सौभाग्य राजस्थान से पधारे उद्योगपति अशोक पाटनी को प्राप्त हुआ। महेंद्र जैन रूपाली ने मोर पंख से निर्मित 50 वें संयम स्वर्ण महोत्सव का प्रतीक चिह्म अशोक पाटनी को भेंट किया। दानदाताओं ने आचार्यश्री को श्रीफल अर्पित कर आशीर्वाद लिया। मंदिर से कलशों की शोभायात्रा निकाली गई। प्रतिभास्थली की बच्चियों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए। रूपाली द्वारा मंच सज्जा की गई। प्रमुख दानदाताओं में अशोक पाटनी, काला परिवार मुंबई, प्रमोद जैन गुडलक, दिनेश अर्पित जोगानी, संतोष ठेकेदार, सुनतानगंज परिवार, मिल्टन परिवार, डा. सुभाष मुंबई, नवीन जैन दिल्ली आदि को मंगल कलश स्थापना का सौभाग्य प्राप्त हुआ। संचालन श्री दिगंबर परवार जैन मंदिर ट्रस्ट के मंत्री सत्येंद्र जैन, एड. अजीत जैन भोपाल व अजय अहिंसक, प्रकाश बैसाखिया, जिनेंद्र जैन लालाजी, राजेंद्र जैन, महेंद्र जैन, दिलीप भारिल ने किया। ज्ञानोदय सेवा संघ ने भोजन व्यवस्था तथा जैन वीर सेवा मंडल ने यातायात व्यवस्था संभाली। यह जानकारी प्रचार समिति के महेंद्र जैन रूपाली, राजू जैन वर्धावाले तथा अतुल मोदी ने दी।

आचार्य श्री द्वारा रचित: सूक्तियाँ

1. सावधान ज्ञान का नाम ही ध्यान है। 
2. जो मानता स्वयं कोसबसे बड़ा है , वह धर्म से अभी बहुत दूर खड़ा है। 

3. अर्थ की तुला से परमार्थ को मत तौलो। 
4. अर्थ के पीछे अनर्थ मत करो। 
5. उद्योग में हिंसा समझ में आती है, हिंसा का उद्योग समझ से परे है। 
6. धन की प्राप्ति कदाचित पुण्य का फल हो सकता है, पर उसका सदुपयोग तपस्या का फल है। 
7. जीवन का उपयोग करो, उपभोग नहीं।
8. अभिमान पतन का कारण है।
9. संसार से मोक्ष की ओर जाना है तो बस इतना करो कि जिधर मुख है, उधर पीठ कर लो और जिधर पीठ है उधर मुख कर लो।
10. गुरु की आज्ञा में चलना ही गुरु की सच्ची विनय हैं।
11. आवेग में विवेक मत खोओ।
12. बहुत नहीं बहुत बार पढ़ो।
13. पेट भरने की चिंता करो, पेटी भरने की नहीं।
14. अपने धन को द्रव्य बनाओ और उसे वहां पहुंचाओ जहां उसकी आवश्यकता है।
15. जिस व्यक्ति का हृदय दया से भीगा नहीं है, उस हृदय में धर्म का अंकुर नहीं फूट सकता।
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16. वासना का सम्बन्ध न तो तन से हैं और न वसन से है, अपितु माया से प्रभावित मन से है।

17. किसी के दुख को देख कर दुखी होना ही सच्ची सहानुभूति है। 
18. मरहम पट्टी बांधकर व्रण का कर उपचार, ऐसा यदि ना बन सके डंडा तो मत मार।
19. लायक बन नायक नहीं, करना है कुछ काम, ज्ञायक बन गायक नहीं, पाना है शिवधाम।
20. उस पथिक की क्या परीक्षा पथ में शूल नहीं, उस नाविक की क्या परीक्षा धारा प्रतिकूल नहीं।
21. प्रतिभा देश की सबसे बड़ी संपत्ति है इसका पलायन नहीं होना चाहिए।
22. धन का संग्रह अनुग्रह के लिए करो परिग्रह के लिए नहीं।
23. तुम भीतर जाओ,तुम्बी सम, तुम भीतर जाओ।
24. जो दिख रहा है वह मैं नहीं हूँ, जो देख रहा है वह मैं हूं।
25. मन की मलिनता धर्म की तेजस्विता को नष्ट कर देती है।
26. यदि तुम समर्थ हो तो असमर्थो को समर्थ बनाओ,यही समर्थ होने का सच्चा लाभ है।
27. सत्य केवल शाब्दिक अभिव्यक्ति का साधन नहीं, अनुभूति की साधना है।
28. जैसे पानी के प्रवाह के बिना नदी की शोभा नहीं होती, वैसे ही नैतिकता के अभाव में मनुष्य की शोभा नहीं।
29. मनुष्य के अज्ञान से भी ज्यादा खतरनाक है उसका प्रमाद।
30. दूसरों की निंदा करना सबसे निंदनीय कार्य है।
31. अपनी वासना का शमन ही सच्ची उपासना है।
32. संघर्षमय में जीवन का उपसंहार हमेशा हर्षमय होता है।
33. जीवन के उतार चढ़ाव में ठहराव बनाए रखना ही जीने की कला है।
34. आदेश नहीं अनुरोध की भाषा का प्रयोग करो।
35. वीतरागी बनने का ध्येय रखे, वित्त रागी नहीं।
36. अच्छे लोग दूसरों के लिए जीते हैं जबकि दुष्ट लोग दूसरों पर जीते हैं।
37. नम्रता से देवता भी मनुष्य के वश में हो जाते हैं।
38. जिस तरह कीड़ा कपड़ों को कुतर देता है, उसी तरह ईर्ष्या मनुष्य को।
39. जिन्हें सुंदर वार्तालाप करना नहीं आता, वही सबसे अधिक बोलते हैं।
40. दूसरों के हित के लिए अपने सुख का त्याग करना ही सच्ची सेवा है।
41. धर्म पंथ नहीं पथ देता है।
42. चार पर विजय प्राप्त करो- १. इंद्रियों पर २. मन पर ३. वाणी पर ४. शरीर पर।
43. यश त्याग से मिलता है, धोखाधड़ी से नहीं।
44. डरना और डराना दोनों पाप है।
45. चरित्रहीन ज्ञान जीवन का बोझ है।
46. सच्चा प्रयास कभी निष्फल नहीं होता।
47. अहिंसा की ध्वजा जहाँ लहराती है, वहाँ सदा मंगलमय वातावरण रहता है।
48. उस ओर कभी मत जाओ, जिस ओर तुम्हारे चरित्र में पतन होने का खतरा हो।
49. देशवासी का प्रथम कर्तव्य अपने देश के स्वाभिमान की रक्षा करना हैं।
50. क्रोध रुपी अग्नि, पूण्य रूपी रत्नों को जल देती हैं।
51. क्रोध अपने स्वभाव की कमजोरी है।

52. क्रोध में बोध नहीं होता और क्षमा में विरोध नहीं होता।
53. क्रोध मनुष्य के जीवन को एकाकी बनाता है।
54. गुरू ही परमात्मा तक पहुँचाते हैं।
55. गुरू की आज्ञा और वचन, सूत्र के सामान होते हैं।
56. जिसका हदय दया से द्रवीभूत नहीं हैं, उसमें धर्म के अंकुर संभव ही नहीं हैं।
57. दीन-दु:खी जीवों की पीड़ा देखकर जिनकी आँखों में पानी नहीं आता, वह आँख, आँख नहीं छेद है, फिर छेद तो नारियल में भी होता हैं।
58. नम्रता के आगे कठोरता सदैव पिघलती है।
59. दया धर्म से ही धर्म की रक्षा संभव है।
60. दया और करुणा के अभाव में मानवता का प्रकाश प्राप्त होना संभव नहीं।
61. दयाधर्म की रक्षा करना ही मानवता की रक्षा करना है।
62. हम किसी को जीवन नहीं दे सकते, किन्तु जीवन बचा तो सकते हैं।
63. महत्वपूर्ण जन्म नहीँ, जीवन है।
64. सरलता, सादगी और सदभावना ही जीवन का सही धर्म है।
65. धन से सुविधायें मिल सकती है, सुख नहीं।
66. परिश्रम से अर्जित धन सौभाग्य का दाता होता है।
67. परलोक गमन के समय पैसा नहीं पुण्य काम आता है।
68. ज्ञान एक ऐसा धन हैं, जो मन को भी अपने वश में कर लेता है।
69. जोड़ने का प्रयत्न करो, तोड़ने का नहीं, क्योंकि तोड़ना सरल है पर जोड़ना काफी कठिन है।
70. सबके कल्याण की भावना रखने वाला अपने कल्याण का बीजारोपण कराता हैं।
71. दूसरे का हित करके अपने हित का साधन करना चाहिए।
72. सत्य परेशांन हो सकता है, परंतु पराजित नहीं।
73. समय देना महत्वपूर्ण नहीं, समय के अनुरूप कार्य करना महत्वपूर्ण है।
74. अवसर आने पर जो उपकार किया जाता है, वह देखने में भले ही छोटा हो पर वास्तव में सबसे बड़ा होता है।
75. आपकी अपनी असफलता में ही सफलता का रहस्य छुपा होता है।
76. आधुनिकता की होड़ में अपनी मूल संस्कृति को नहीं भूलना चाहिए।
77. दीपक के तरह की जलना नहीं, सूर्य के तरह चमकना सीखो।
78. पथिक को पहले पथ नहीं प्रकाश चाहिए।
79. कत्लखाने भारतीय इतिहास के लिये कलंक हैं।
80. क़त्लखानों का आधुनिकीकरण दुर्भाग्यपूर्ण है।
81. आस्था मस्तिष्क में नहीं हृदय में जन्मती है, अत: हमारी आस्था का केन्द्र ज्ञान सम्पन्न मस्तिष्क नहीं, बल्कि भावना सम्पन्न हृदय होता है।
82. “ही” एकान्त का प्रतीक है और "भी" अनेकान्त का “ही” में किसी की अपेक्षा नहीं है जबकि "भी" पर के अस्तित्व को स्वीकार करता है।
83. हमें दूसरों की बात बिना पूर्वाग्रह के सुनना चाहिए, यही तो अनेकान्त का मूल मन्त्र है।

- प.पू आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज
साभार: डॉ. नीलम जैन

आचार्य श्री विद्यासागर जी का बचपन का घर

आचार्य श्री विद्यासागर जी का बचपन का घर जिसमे बाल्यकाल के समय उनको घर मे सभी इस नाम से बुलाते थे विद्याधर (पीलू, तोता) इसी घर मे उन्होंने अपना बचपन बिताया जिस साईकिल को वो चलाते थे आज भी उस घर मे वैसी ही रखी है जिन बर्तन में भोजन करते थे वो भी उस घर में आज तक सही सलामत रखे है जैसे किसी म्यूजियम में हर चीज पुरातत्व विभाग संभालकर रखता है वैसे ही आचार्यश्री के गृहस्त जीवन के भाई आज तक संभालकर रखे हुए है इस युग के भगवान स्वरूप आचार्य श्री से जुड़ी सभी चीजें देखकर मन प्रफुल्लित हो गया।
























साभार: आकांक्षा जैन, कलकत्ता
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रामटेक की जागी आशा विद्यागुरु का मिला चौमासा

रामटेक की जागी आशा
विद्यागुरु का मिला चौमासा
मैं मूक माटी हूँ,
माटी हूँ एक पवित्र भूमि की
मैं भूमि हूँ,
पावन भूमि हूँ रामटेक की
जहाँ भगवान राम ने
वनवास में टेक ली
जहाँ इस युग के भगवन
की विशेष अनुकम्पा रही
जहाँ संत शिरोमणि ने
चार चार चातुर्मास किये हों
24 मुनि और 2 अर्यिका
ऐसे 26 महाव्रती दिए हों
नि:शब्द हुए सब, नि... शब्द से
निस्वार्थ सहित सब मुनि बने
निर्वाण के पथ चलने वाले से
24 बालयति मुनि बने
और जो इतिहास बना हो
गुरु शिष्य मिलन का
और ऐसा मिलन
जो सारी कल्पनाओं से परे था
ऐसा मिलन जहाँ एक शिष्य
गुरु चरणों से ऐसे लिपटा
जैसे एक नन्हा का बालक
वर्षो बाद अपने पिता से मिला
जहाँ एक शिष्य के नयन सुधा
गुरु पग प्रक्षालन कर रहे थे
तो गुरु चरण से निकले
गंधोदक को शिरोधार्य कर रहे थे
ऐसे से संत शिरोमणि
गुरु पग तले गर्व से आते हैं
तभी तो हम
पावन भूमि कहलाते हैं
रामटेक के गौरव शाली क्षण
पुनः सौभाग्य से आ रहे है
पंचम युग के भगवन
पंचम चौमासा करने आ रहे हैं। 
अनियत विहारी गुरुदेव विद्यासागर जी महाराज
के पावन चरण युगल में बारम्बार नमोस्तु

शब्दांकन: एक गुरु भक्त
साभार: राहुल जैन

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ब्रह्मचर्य अवस्था से अब तक की चातुर्मास सूची: मुनि श्री नियमसागर जी महाराज

प.पू. संत शिरोमणि आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज के तृतीय दीक्षित शिष्य अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी मुनि श्री नियमसागर जी महाराज।

परम पूज्य मुनि श्री नियमसागर जी महाराज का जन्म सदलगा में हुआ था,आप आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज के संघ के प्रथम ब्रह्मचारी है, सबसे पहले किशनगढ़ (राज.) में आचार्य श्री ने आपको ब्रह्मचर्य व्रत प्रदान किया, आपकी क्षुल्लक दीक्षा 1975 में सिद्धक्षेत्र सोनागिरि में, ऐलक दीक्षा 1978 में सिद्धक्षेत्र नैनागिरि में व मुनि दीक्षा 1980 में मोराजी सागर में हुई, आपने विद्याष्टक, जिनवाणी स्तुति सहित कई उपयोगी व कालजयी कृतियों की रचना की है, आपको संस्कृत, प्राकृत, हिन्दी, कन्नड़, मराठी आदि भाषाओं का ज्ञान है। संस्कृत भाषा का आपको विशेष ज्ञान है, आपने ब्रह्मचारी अवस्था से अब तक कुल 42 चातुर्मास किए है, जिसमें 9 चातुर्मास आचार्य श्री के साथ व बाकी उपसंघ के रुप में पूर्ण किए है, आपके चातुर्मास उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, झारखंड, राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक प्रांतों में हुए है। 


ब्रह्मचर्य अवस्था से अब तक की चातुर्मास सूची
1975-फिरोजाबाद (उ.प्र.)【आचार्यश्री के साथ】
1976-सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर (म.प्र.)【आचार्यश्री के साथ】
1977-सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर (म.प्र.)【आचार्यश्री के साथ】
1978-सिद्धक्षेत्र नैनागिरि जी (म.प्र.)【आचार्यश्री के साथ】
1979-अतिशय क्षेत्र थूबोन जी,अशोकनगर (म.प्र.)【आचार्यश्री के साथ】
1980-सिद्धक्षेत्र मुक्तागिरि जी, बैतुल (म.प्र.)【आचार्यश्री के साथ】
1981-सिद्धक्षेत्र नैनागिरि जी (म.प्र.)【आचार्यश्री के साथ】
1982-सिद्धक्षेत्र नैनागिरि जी (म.प्र.)【आचार्यश्री के साथ】
1983-ईशरी,गिरिडीह (झारखण्ड)【आचार्यश्री के साथ】
1984-कोतमा,अनूपपुर (म.प्र.)
1985-आलगुर, कर्नाटक
1986-हासन, कर्नाटक
1987-सालिग्राम, कर्नाटक
1988-सालिग्राम, कर्नाटक
1989-तुमकुर, कर्नाटक
1990-सालिग्राम, कर्नाटक
1991- सिरगुप्पी, कर्नाटक
1992-कोपरगाँव, महाराष्ट्र
1993-छत्रपति नगर, इन्दौर, म.प्र.
1994-आरोन, म.प्र.
1995-मुंगावली, म.प्र.
1996-खजुराहो, म.प्र.
1997-मंडलेश्वर, म.प्र.
1998-आष्टा, म.प्र.
1999-बड़वाह, म.प्र.
2000-खान्दूँ कॉलोनी, राजस्थान
2001-कोपरगाँव, महाराष्ट्र
2002-बारामती, महाराष्ट्र
2003-तेरदाल, कर्नाटक
2004-हुपरी, महाराष्ट्र
2005-जन्मभूमि सदलगा, कर्नाटक
2006-बोरगांव, कर्नाटक
2007-पेठ वडगाँव, महाराष्ट्र
2008-मजगाँव, कर्नाटक
2009-जुगूल, कर्नाटक
2010-सदलगा, कर्नाटक
2011-कोल्हापुर, महाराष्ट्र
2012-निगड़ी पुणे, महाराष्ट्र
2013-गुलबर्गा, कर्नाटक
2014-पुसद, महाराष्ट्र
2015-एलोरा,औरंगाबाद, महाराष्ट्र
2016-दहीगाँव, महाराष्ट्र
2017-जयसिंगपूर, जिला-कोल्हापुर, महाराष्ट्र*

मुनि श्री का 43 वाँ चातुर्मास जयसिंगपूर जिला-कोल्हापुर में 4 अनुज मुनिराजों के साथ सम्पन्न हो रहा है,हम सब ऐसे ज्ञान के भण्डार महामुनि के दर्शन कर अपने जीवन को कृतार्थ करे। 

।। जैनम् जयतु शासनम्, वन्दे विद्यानियमसागरम् ।।
साभार: अमोल भय्याजी पुसद
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दीक्षा समारोह: आचार्य श्री


'एक दिन पारस पारखी, गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज ने चुपके से अपनी पिच्छी के पंख बिखेर दिये और सहज हो कर बोले- विद्याधर! इस पिच्छिका को पुनः बना सकते हो? न शब्द वहाँ था ही नहीं, सो हाँ कह दिया और विद्याधर ने शास्त्रों में वर्णित विद्याधरों की तरह शीघ्र पीछी बना डाली। गुरु जी ने पीछी देखी और देखते ही कह दिया- ब्रह्मचारी, आपका ज्ञान सही में पीछी लेने योग्य हो चुका है।


और आज ही के दिन महागुरु आचार्य श्री ज्ञान सागर जी महामुनिराज ने 

आषाढ़ सुदी ५ वि.सं. २०२५, तदनुसार ३० जून १९६८ का दिन। स्थान सोनीजी की नसिया। शहर अमजेर । 
दीक्षा समारोह प्रारंभ होता है। ब्र. विद्याधर खड़े होकर गुरुवर की वंदना करते हैं, हाथ जोड़कर दीक्षा प्रदान करने की प्रार्थना करते हैं। गुरुवर का आदेश पाकर विद्याधर वैराग्यमयी, सारगर्भित वचनों से जनता को उद्‍बोधन देते हैं तदुपरान्त विद्याधर ने हवा में उड़ने वाले केशों का लुन्चा करना प्रारंभ कर दिया। अपनी ही मुष्टिका में सिर से इतने सारे बाल खींच ले जाते कि देखने वाले आह भर पड़ते हैं। फिर दूसरी मुष्टिका। तीसरी। फिर सिर के बाल निकालते हुए कुछ स्थानों से रक्त निकल आया है। विद्याधर के चेहरे पर आनंद खेल रहा है। हाथ आ गए दाढ़ी पर। दाढ़ी की खिंचाई और अधिक कष्टकारी होती है। वे दाढ़ी के बाल भी उसी नैर्मम्य से खींचते हैं। हाथ चलता जाता है, बाल निकलते जाते हैं, पूरा चेहरा लहूलुहान हो गया है। श्रावक सफेद वस्त्र ले उनकी तरफ दौड़ पड़ते हैं। वे अपने चेहरे को छूने नहीं देते। बाल खींचते जाते हैं। रक्त बहता जा रहा है। विद्याधर जहाँ के तहाँ / अविचलित खुश हैं। आनन्दमय हैं। केश लुन्च पूर्ण होते ही पंडितों-श्रावकों और अपार जनसमूह के समक्ष गुरु ज्ञानसागरजी संस्कारित कर उन्हें दीक्षा प्रदान करते हैं। विद्याधर वस्त्र छोड़ देते हैं दिगम्बरत्व धारण कर लेते हैं। तभी एक आश्चर्यकारी घटना घटी। राजस्थान की जून माह की गर्मी और खचाखच भरे पांडाल में २०-२५ हजार नर-नारी। समूचे प्रक्षेत्र पर तेज उमस हावी थी। लोग पसीने से नहा रहे थे। वातावरण ही जैसे भट्टी हो गया हो। जैसे ही विद्याधर ने वस्त्र छोड़े, पता नहीं कैसे कहाँ से बादल आ गए और पानी की भीनी-भीनी बौछार होने लगी, हवाएँ ठंडी हो पड़ी, वातास शांति एवं ठंडक अनुभव करने लगा। ऐसा लगा कि प्रकृति साक्षात् गोमटेश्वरी दिगम्बर मुद्रा का महामस्तकाभिषेक कर कर रही हो अथवा देवों सहित इन्द्र ने ही आकर प्रथम अभिषेक का लाभ लिया हो। कुछ समय बाद पानी रुक गया। सूर्य ने पुनः किरणें बिखेर दीं। सभी दंग रह गए, कहने लगे यह तो महान पुण्यशाली विद्यासागरजी की ही महिमा है। सभी अपने-अपने मनगढ़ंत भाव लगाकर विद्याधर के पुण्य का बखान कर रहे थे। वहीं छोटे बालक कह रहे थे विद्याधर ने जैसे ही धोती खोली वैसे ही इन्द्र का आसन काँप गया सो उसने खुशी जताने के लिए नाच-नाचकर यह वर्षा की है। ज्ञानसागरजी पिच्छी कमण्डल सौंपते हैं और मुनिपद को संबंधित निर्देश देते हैं। दीक्षा संपन्न।
संयम स्वर्ण महोत्सव डोंगरगढ़ २८/०६/२०१७ 

आईसपोर्टजैनिज़्म परिवार की ओर से गुरुचरणों में शत् शत् नमन।

!! नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु भगवन !!

डोंगरगढ़ विशेष

साभार: भास्कर

आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी गुरु महाराज के जीवन से जुडी कुछ बातें:


  • आचार्य श्री ब्र. अवस्था में रोज साइकल चला कर चूलगिरि से 5 की. मी. दूर एक गाव में देश्भूषण जी महाराज के संघ की आहार चर्या हेतु दूध लेने जाते थे।
  • आचार्य श्री की तराह संघ में सभी साधू और आर्यिका बाल ब्रह्मचारी है।
  • विधासागरजी के दीक्षा संस्कार में हुकुमचंद जीलु हाडिया और उनकी पत्नी जतन कँवर बाई माता पिता बने थे। 
  • उन्होने इस हेतु उस समय (30 जून,1968) 25000/- की बोली ली थी।
  • मुनि बन जाने के बाद विद्यासागर जी का प्रथम आहार भाग चंदसोनी (जैन), अजमेर के यहाँ हुआ।
  • मुनि विद्यासागर जी का प्रथम चातुर्मास केसरगंज(अजमेर) में हुआ था।
  • https://isupportjainism.blogspot.in
  • 30-6-1973 को नसीराबाद मेंआचार्य ज्ञानसागर जी कीसमाधी हुई।
  • आचार्य बनने के उपरांत विद्यासागर जी का प्रथम चतुर्मास व्यावर में हुआ।
  • आचार्य श्री ने प्रथम दीक्षा छु. समयसागर, छु. योगसागर, छु. नियमसागर जी को 18 dec-1975 को सोनागिर में दी।
  • माघ शुक्ल पंचमी, वि.सं.2032 को आचार्य धर्मसागर जी के हस्तकमलो से मुज्जफरनगर की पवन धरा पर मल्लपाजी, श्रीमतीजी, शांताजी, स्वर्णाजीकीदीक्षाहुइ (मल्लिसागरजी, समयमतिजी, नियममतिजी, प्रवचनमति जी)
  • जैन गीता (समंसुत्तम) का पद्या नुवाद कुण्डलपुर चातुर्मास(1976) में आचार्य महाराज के कर कमलो द्वारा हुआ।
  • आचार्य श्रीद्वारा प्रथम मुनि दीक्षा मुनि श्री समयसागर जी को दी गई, द्रोणगिरीतीर्थ में 7 मार्च 1980 को। एवं दूसरी और तीसरी दीक्षा मुनि योगसागर जी औरमुनि नियमसागरजी को मिली, 15 अप्रैल 1980 को सागर में।
..................क्रमशः
नोट: अगर आपके पास भी गुरुदेव से जुडी कोई भी जानकारियाँ हो तो हमसे जरुर साँझा करे। 📧 ईमेल: infoissupport@gmail.com

बहुत ही अलग अंदाज में


आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज के ५०वे दीक्षा दिवस के पावन अवसर पर एक महिला आर्टिस्ट द्वारा बहुत ही अलग अंदाज में अपनी भक्ति अर्पण की। 
जैनिज़्म परिवार की ओर से बधाई एवं आपका आभार।

डोंगरगढ़ विशेष


साभार: भास्कर

आचार्य श्री १०८ निर्मल सागर जी महाराज

 

जन्म: मार्गशीर्ष कृष्णा २ विक्रम संवत २००३ सन १९४६
जन्म स्थान : पहाड़ीपुर जिला एटा अब फिरोजाबाद (उ.प्र.)
जन्म का नाम श्री रमेश चन्द्र,
माता का नाम : श्रीमती गोमावती,
पिता का नाम : श्री सेठ बिहारीलाल,
क्षुल्लक दीक्षा : वैशाख शुक्ल १४ सन १९६५
दीक्षा का स्थान : गिरनार पर्वत की चोथी टोंक पर,
क्षुल्लक दीक्षा गुरु : आचार्य श्री १०८ सीमंधर जी महाराज,
मुनि दीक्षा : आषाढ़ शुक्ल पंचमी रविवार सन १९६७,
मुनि दीक्षा का स्थान : आगरा,
मुनि दीक्षा गुरु : आचार्य श्री १०८ विमल सागर जी महाराज (भिंड वाले)
आचार्य पद : सन १९७३ विक्रम संवत २०३०
आचार्य पद का स्थान : सांगोद (कोटा , राजस्थान )
विशेष : गिरनार पर्वत सत्व संकट निवारक।
आचार्य श्री १०८ निर्मल सागर जी महाराज मुनिराज के श्री चरणों में आई.एस.जे परिवार की ओर से शत शत नमन। नमोस्तु भगवन नमोस्तु 


त्याग, तपस्या और तरुणाई के 'सागर'


आचार्य श्री विद्यासागर जी महा-मुनिराज के श्री चरणों में आई.एस.जे परिवार की ओर से शत शत नमन। नमोस्तु भगवन नमोस्तु 

  • १९७१ से मीठा व फल त्याग। 
  • १९७६ से रस, फल, मेवा का त्याग। 
  • १९८३ से पूर्ण थूकना बंद। 
  • १९८५ से चटाई पर सोना त्याग।
  • १९९० से नौ दिन का निर्जला व्रत।
  • १९९२ से दिन से दिन में सोना आजीवन त्याग।
  • दीक्षा लेने के बाद से रात्रि में मौन व्रत।
  • दीक्षा लेने के बाद हर दो माह में केस-लोच।
धन्य हैं ऐसे महान संत धन्य हैं इनकी चर्या..........!!!

राजनांदगांव, डोगरगढ़ से सीधा प्रसारण

राजनांदगांव, डोगरगढ़ संयम स्वर्ण महोत्सव से सीधा प्रसारण 

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डोंगरगढ़ में आज से संयम स्वर्ण महोत्सव शुरू

चंद्रगिरी डोंगरगढ़ आयोजन | डोंगरगढ़ में आज से संयम स्वर्ण महोत्सव, तीन दिन तक चलने वाले समारोह में देशभर से जुटेंगे लाखों श्रद्धालु, प. पू आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी की दीक्षा के 49 वर्ष पूरे और इसी के 50वां वर्ष प्रारंभ हुआ 

चंद्रगिरी जैन तीर्थ क्षेत्र डोंगरगढ़ में तीन दिवसीय श्री संयम स्वर्ण महोत्सव की शुरुआत बुधवार को होगी। दिगंबर जैनाचार्य विद्यासागर महाराज की दीक्षा के 49 वर्ष पूरे होने पर एवं 50वां वर्ष प्रारंभ होने पर इस कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। पहले दिन सीएम डॉ. रमन सिंह और केंद्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूडी मुख्य अतिथि होंगे। सुबह साढ़े पांच बजे कार्यक्रम शुरू होगा। आचार्य श्री का वंदन व पूजन के साथ ही प्रवचन सुबह 9 बजे होगा। शाम सवा तीन बजे सीएम और केंद्रीय मंत्री भी आयोजन स्थल पर अपनी बातें कहेंगे। मंगलवार को आयोजित पत्रकार वार्ता में इसकी जानकारी दी गई। दिगंबर जैन चंद्रगिरी तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट संयम स्वर्ण महोत्सव समिति के सुरेंद्र पाटनी और अरविंद जैन ने बताया कि इस कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों से करीब 1 लाख श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। तीनदिवसीय आयोजन की जिम्मेदारी ट्रस्ट के अलावा डोंगरगढ़ एवं राष्ट्रीय संयम स्वर्ण महोत्सव समिति के हाथों में है। पहले दिन विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल, पीडब्ल्यूडी मंत्री राजेश मूणत, भाजपा की राष्ट्रीय महामंत्री सरोज पाण्डेय सहित विभिन्न नेता महोत्सव में शामिल होंगे। 
दूसरे दिन एमपी के सीएम आैर समापन पर राज्यपाल होंगे शामिल: गुरुवार को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान यहां मुख्य अतिथि होंगे। सुबह नौ बजे एवं शाम सवा चार बजे आचार्यश्री का अमृत वचन होगा। शाम साढ़े पांच बजे आचार्य भक्ति होगी। इसके बाद शाम छह बजे संगीतमय आरती एवं सात बजे विद्वतजनों का प्रवचन होगा। कार्यक्रम में एमपी के वित्त मंत्री जयंत मलैया के साथ छत्तीसगढ़ प्रदेश भाजपा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक, कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल एवं सांसद अभिषेक सिंह भी शामिल होंगेे। शुक्रवार को महोत्सव का अंतिम दिन होगा। इसमें राज्यपाल बलरामजी दास टंडन के अलावा उद्योग मंत्री अमर अग्रवाल, पूर्व सीएम अजीत जोगी, पीसीसी अध्यक्ष भूपेश बघेल, नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव शामिल होंगे। 
करोड़ों रुपए की लागत से सोने व चांदी से बना स्वर्ण रथ मंगलवार को डोंगरगढ़ के चंद्रगिरी पहुंचा। अजमेर के श्रावक राजेंद्र कुमार व अजय कुमार दनगसिया ने सोने व चांदी से निर्मित यह रथ बनवाया है। दोनों आचार्य विद्यासागर महाराज के परम शिष्य है। स्वर्ण रथ धर्मनगरी से नगर भ्रमण कर भारत भ्रमण के लिए निकलेगी। इस रथ की विशेषता यह है कि यह रथ स्वर्गलोक में पाए जाने वाले विमान की तरह है। आचार्य विद्यासागर विश्व के पहले संत बनने जा रहे हैं, जिन्होंने 22 वर्ष की उम्र में दीक्षा लेकर 49  साल पूरे किए और इसी के 50वां वर्ष प्रारंभ हुआ। इस अवसर के लिए चंद्रगिरी में तैयारी हो चुकी है। 
स्टेशन व बस स्टैंड से आने-जाने की व्यवस्था मुफ्त: रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, धर्मशाला व लॉज से चंद्रगिरि तक जाने के लिए 20 ई-रिक्शा व ऑटो की नि:शुल्क व्यवस्था की गई है। इन तीन दिनों तक रिक्शा व ऑटो में चंद्रगिरि तक लाने व जाने दोनों की सुविधा रहेगी। भव्य आयोजन के लिए नए-नए सामानों की दुकानों सज रही है।



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चंद्रगिरि। कल की व्यवस्था

चंद्रगिरि।संयम स्वर्ण महोत्सव में शामिल होंगे एक लाख से अधिक लोग, 5 डोम में रहेगी बैठक व्यवस्था, आयोजन संयम स्वर्ण महोत्सव में शामिल होने देश व विदेशों से भी आएंगे आचार्य के शिष्यगण डोंगरगढ़।

आचार्य विद्यासागर महाराज की दीक्षा का 28 जून को 50 वर्ष पूरा होगा। इस अवसर पर 28 से 30 जून तीन दिनों तक संयम स्वर्ण महोत्सव चंद्रगिरी प्रांगण में मनाया जा रहा है। इसको लेकर तैयारी शुरू हो गई है। इसमें देशभर से जैन समाज के एक लाख लोगों के पहुंचने का अनुमान है। आयोजन समिति ने बैठक व्यवस्था पर अधिक फोकस किया है। बारिश को देखते हुए डोम लगाने के पहले पॉलीथिन लगाया जा रहा है।