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हाइकू – मुनिश्री योगसागर महाराज जी

हाइकू जापानी छंद की कविता है इसमें पहली पंक्ति में 5 अक्षर, दूसरी पंक्ति में 7 अक्षर, तीसरी पंक्ति में 5 अक्षर है। यह संक्षेप में सार गर्भित बहु अर्थ को प्रकट करने वाली है। मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने 400 से ज्यादा हाइको लिखे हैं। आपका जन्म: १३ सितम्बर १९५६ दिन: गुरूवार, को ग्राम सदलगा कर्नाटक में हुआ था। ब्रह्मचर्य व्रत: २ मई १९७५, क्षुल्लक दीक्षा: १८ दिसंबर १९७५, ऐलक दीक्षा: १८ अप्रैल १९७७, मुनि दीक्षा: १५ अप्रैल १९८० (सागर मध्यप्रदेश) आप आचार्य भगवन जी के गृहस्थ जीवन के छोटे भाई हैं। 

1 – मृत्यु अमर, यहाँ कौन दिखेगा, अमर यहाँ।
2 – तू ना समझा, नश्वर के शरण, में अशरण।
3 – विकृत वस्तु, के परिणमन का, नाम संसार।
4 – तू है चिद्रूप, पर क्यों रूप बना, तेरा विद्रूप।
5 – रूप कुरूप, से परे अरूप है, तेरा स्वरुप।
6 – भग्न घट सी, काया निशदिन ही, मॉल झराये।
7 – योगों की क्रिया, जिसकी प्रतिक्रिया, कर्मास्रव है।
8 – बाहर नहीं, भीतर निहारना, निरास्रव है।
9 – अनगार की, ध्यान की चिनगारी, कर्म जलाये।
10 – कहीं निहाल, तो कहीं है बेहाल, जग का हाल।
11 – कारागार को, जिनालय बनाना, अतिदुर्लभ।
12 – वही है धर्म, विष को सुधामय, परिणमाये।
13 – पुष्प महके, अलिदल दौड़ते, ना ही बुलाते।
14 – काँटों के बीच, गुलाब का जीवन, कैसी ग़ुलामी।
15 – अमल करो समल विमल हो ज्यों कमल सा।
16 – क्षणभंगुर, अंगुर पे झूमते, ज्यों लंगुर से।
17 – भीतर नहीं, बाहर निहारना, पापास्रव है।
18 – प्रदर्शन तो, मृगमरीचिका है, केवल धोका।
19 – वैराग्य पुष्प, जीवन उद्यानों को, महकता है।
20 – जिन्हें जाप से, ताप सा प्रतीत हो, उन्हें क्या कहें।
21 – मंगलमय, देव गुरु शास्त्र को, मम प्रणाम।
22 – जिसके तुम, हवाला दे उनके, क्या हवाला हो।
23 – शांत चित्त ही, सा शास्त्रों का ज्ञाता, चेतन कृति।
24 – कांच सा प्याला, तेरी सुन्दर काया, कब क्या होगा।
25 – जिसे जिनसे, शल्य हो उनसे क्या, प्रयोजन है।
26 – ये सुख दुःख, तेरे परिणामों का, परिपाक है।
27 – पुरुषार्थ की, चमक झलकती है, भाग्योदय में।
28 – चिंता न करो, सफलता मिलती, चिंतन से ही।
29 – असुंदर में, सुन्दर का निवास, मोह की नशा।
30 – तेरा स्वरुप, सुख दुःख से परे, ज्ञाता दृष्टा है।
31 – पूजनीय वे, कर्ता भोक्ता औ स्वामी, पन से परे।
32 – वक्त पर जो, भक्त बनता वह, विभक्त होता।
33 – भेद विज्ञान, अंतर जगत का, दिवाकर है।
34 – पुण्योदय में, गाफिल, पापोदय, होश हवास।
35 – मल पिटारा, में बहुमूल्य हीरा, कब से गिरा।
36 – जात पात से, परे यथा जात जो, पारिजात सा।
37 – त्रैलोक्य में है, जीवों का प्रिय यार, शुद्ध बयार।
38 – कविता गायें, ह्रदय की गंथियाँ, हम गलाये।
39 – सुनो हायको, कर्मों की चमत्कार, तुम परखो।
40 – प्रभावित हो, उपादान निमित्त, प्रभाव डाले।
41 – एक दिन तो, मरना है कल्याण, मेरा कैसे हो।
42 – प्रत्येक श्वास, , यमपुर की ओर, बढे कदम।
43 – कर्तव्यता में, दक्षता ही शिष्य की, गुरु दक्षिणा।
44 – एक क्षण भी, संत संग अनंते, पाप नशाये।
45 – शीतलमयी, क्षमोत्तम नीर से, क्रोधाग्नि बुझे ,।
46 – मार्दव फल, विनय द्रुम पर, ‘ ही फलता है।
47 – औपचारिक, निर्गंध पुष्प, निज को छलता है।
48 – तन तिनका, समझेगा तभी तो, हीरा दिखेगा।
49 – असुंदर क्या, असुंदर से कभी, सुन्दर होगा।
50 – अहंकार के, अलंकार से प्राणी, अलंकृत है।

आचार्य श्री १०८ निर्मल सागर जी महाराज

 

जन्म: मार्गशीर्ष कृष्णा २ विक्रम संवत २००३ सन १९४६
जन्म स्थान : पहाड़ीपुर जिला एटा अब फिरोजाबाद (उ.प्र.)
जन्म का नाम श्री रमेश चन्द्र,
माता का नाम : श्रीमती गोमावती,
पिता का नाम : श्री सेठ बिहारीलाल,
क्षुल्लक दीक्षा : वैशाख शुक्ल १४ सन १९६५
दीक्षा का स्थान : गिरनार पर्वत की चोथी टोंक पर,
क्षुल्लक दीक्षा गुरु : आचार्य श्री १०८ सीमंधर जी महाराज,
मुनि दीक्षा : आषाढ़ शुक्ल पंचमी रविवार सन १९६७,
मुनि दीक्षा का स्थान : आगरा,
मुनि दीक्षा गुरु : आचार्य श्री १०८ विमल सागर जी महाराज (भिंड वाले)
आचार्य पद : सन १९७३ विक्रम संवत २०३०
आचार्य पद का स्थान : सांगोद (कोटा , राजस्थान )
विशेष : गिरनार पर्वत सत्व संकट निवारक।
आचार्य श्री १०८ निर्मल सागर जी महाराज मुनिराज के श्री चरणों में आई.एस.जे परिवार की ओर से शत शत नमन। नमोस्तु भगवन नमोस्तु 


संतकवि दिगम्बर जैनाचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

भारत-भू पर सुधारस की वर्षा करने वाले अनेक महापुरुष और संत कवि जन्म ले चुके हैं। उनकी साधना और कथनी-करनी की एकता ने सारे विश्व को ज्ञान रूपी आलोक से आलोकित किया है। इन स्थितप्रज्ञ पुरुषों ने अपनी जीवनानुभव की वाणी से त्रस्त और विघटित समाज को एक नवीन संबल प्रदान किया है। जिसने राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक और संस्कृतिक क्षेत्रों में क्रांतिक परिवर्तन किये हैं। भगवान राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध, ईसा, हजरत मुहम्मदौर आध्यत्मिक साधना के शिखर पुरुष आचार्य कुन्दकुन्द, पूज्यपाद्, मुनि योगिन्दु, शंकराचार्य, संत कबीर, दादू, नानक, बनारसीदास, द्यानतराय तथा महात्मा गाँधी जैसे महामना साधकों की अपनी आत्म-साधना के बल पर स्वतंत्रता और समता के जीवन-मूल्य प्रस्तुत करके सम्पूर्ण मानवता को एक सूत्र में बाँधा है। उनके त्याग और संयम में, सिद्धांतों और वाणियों से आज भी सुख शांति की सुगन्ध सुवासित हो रही है। जीवन में आस्था और विश्वास, चरित्र और निर्मल ज्ञान तथा अहिंसा एवं निर्बैर की भावना को बल देने वाले इन महापुरुषों, साधकों, संत कवियों के क्रम में संतकवि दिगम्बर जैनाचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज वर्तमान में शिखर पुरुष हैं, जिनकी ओज और माधुर्यपूर्ण वाणी में ऋजुता, व्यक्तित्व में समता, जीने में संयम की त्रिवेणी है। जीवन-मूल्यों को प्रतिस्ठित करने वाले बाल ब्रह्मचारी श्री विद्यासागर जी स्वभाव से सरल और सब जीवों के प्रति मित्रवत व्यवहार के संपोषक हैं, इसी के कारण उनके व्यक्तित्व में विश्व-बन्धुत्व की, मानवता की सौंधी-सुगन्ध विद्यमान है।

मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी

पूर्व नाम: श्री जय कुमार जैन
पिता: श्री रूपचन्द्र जैन
माता: श्रीमती शन्तिबाई जैन
जन्म स्थान: ईशुरवारा (जिला सागर म०प्र०)
जन्म तिथि: मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी (मोक्ष सप्तमी), सम्वत २०१५ तदनुसार दिनांक: २१ अगस्त १९५८ दिन गुरुवार
शिक्षा: बी.कॉम। 
भ्राता: २ (ज्येष्ठ श्री ऋषभ कुमार जैन, कनिष्ठ श्री ज्ञान चन्द्र जैन)
भगिनी: २ (निरंजना, कंचनमाला)
विवाह: नहीं किया (आजन्म बाल ब्रम्हचारी)
ब्रम्हचर्य व्रत आचार्य श्री १०८ विद्यासगर जी महाराज से श्री दिगम्बर जैन सिद्ध क्षेत्र नैनागिर जी में १९ अक्तूबर १९७८
क्षुल्लक दीक्षा: १० जनवरी १९८० को नैनागिर में आचार्य श्री १०८ विद्यासागर जी महाराज जी से और नाम पाया क्षुल्लक श्री परमसागर।
एलक दीक्षा: १५ अप्रेल १९८२ को सागर म०प्र० में भगवान महावीर जयन्ती के पावन दिन आचार्य श्री १०८ विद्यासागर जी महाराज से।
मुनि दीक्षा: अश्विन क्रष्ण त्रतीया तदनुसार दिनाँक २५ सितम्बर १९८३ को ईसरी (जिला गिरिडीह बिहार) में आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से परम जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण की और नाम पाया मुनि श्री सुधासागर जी महाराज।

राष्ट्रसंत मुनि श्री पुलक सागरजी

पूर्व नाम : श्री पारस जैन

जन्म दिनांक : ११ मई १९७०
जन्म स्थल : धाम्त्री, छत्तीसगढ़ 
पिताजी का नाम : श्री भिकमचंद जैन 
माताजी का नाम : श्रीमती गोपी बाई जैन 
शिक्षण : बेचलर ऑफ़ आर्ट्स (जबलपुर) 
ब्रह्मचर्य व्रत (ग्रह त्याग) : २७ जनवरी १९९३ 
ब्रह्मचर्य : आचार्य श्री विद्या सागरजी महाराज
ऐलक दीक्षा : २७ जनवरी १९९४ दीक्षा स्थल : ग्वालियर म.प्र
मुनि दीक्षा : 11 दिसंबर १९९५ दीक्षा स्थल : कानपूर यू.पी


दीक्षा गुरु : आचार्य श्री पुष्पदंत सागरजी महाराज 
चातुर्मास :  मेरठ, भोलानाथ नगर, सहारनपुर, नविन शाहदरा,
आगरा, ग्वालियर, जयपुर, इंदौर, नागपुर, मुंबई, मध्यप्रदेश।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

पूर्व नाम:श्री विद्याधरजी
पिता श्री:श्री मल्लप्पाजी अष्टगे (मुनिश्री मल्लिसागरजी)
माता श्री:श्रीमती श्रीमंतीजी (आर्यिकाश्री समयमतिजी)
भाई/बहन:चार भाई, दो बहन
जन्म स्थान:चिक्कोड़ी (ग्राम-सदलगा के पास), बेलगाँव (कर्नाटक)
जन्म तिथि:आश्विन शुक्ल पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा) वि.सं. २००३, १०-१०-१९४६, गुरुवार, रात्रि में १२:३० बजे
जन्म नक्षत्र:उत्तरा भाद्र
शिक्षा:९वीं मैट्रिक (कन्नड़ भाषा में)
ब्रह्मचर्य व्रत:श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र, चूलगिरि (खानियाजी), जयपुर (राजस्थान)
प्रतिमा:सात (आचार्यश्री देशभूषणजी महाराज से)
स्थल:१९६६ में श्रवण बेलगोला, हासन (कर्नाटक)
मुनि दीक्षा स्थल:अजमेर (राजस्थान)
मुनि दीक्षा तिथि:आषाढ़, शुक्ल पंचमी वि.सं., २०२५, ३०-०६-१९६८, रविवार
आचार्य पद तिथि:मार्गशीर्ष कृष्ण द्वितीया-वि.सं. २०२९, दिनांक २२-११-१९७२, बुधवार
आचार्य पद स्थल:नसीराबाद (राजस्थान) में, आचार्यश्री ज्ञानसागरजी ने अपना आचार्य पद प्रदान किया।
मातृभाषा:कन्नड़

आचार्यश्री विशुद्ध सागर जी

जन्म : १८ दिसम्बर १९७१,
जन्म नाम : राजेन्द्र कुमार जैन,
जन्मस्थान : भिडं (म.प्र.),
माता का नाम : श्री मति रत्तीबाई जैन,
पिता का नाम : राम नारायण जी जैन (मुनि श्री विश्वजीत सागर जी), क्षुल्लक दीक्षा : ११ अक्टुबर १९८९ (भिन्ड),
ऐलक दीक्षा तिथि : १९ जून १९९१ (पन्ना),
ऐलक दीक्षा गुरू : प.पू.गणाचार्य श्री विराग सागर जी महाराज,
मुनि दीक्षा: २१ नवंबर १९९१ (श्रेयासं गिरि),
दीक्षा नाम : पूज्य मुनि श्री १०८ विशुद्ध सागर जी महाराज
मुनि दीक्षा गुरू : प.पू.गणाचार्य श्री विराग सागर जी महाराज,
आचार्य पद प्रदाता : प.पू. मुनि श्री १०८ विशुद्ध सागर जी महाराज को परम पूज्य आचार्य श्री १०८ विराग सागर जी के कर कमलो से ३१ मार्च २००७ को मुनि दीक्षा के १५ वर्ष ६ माह बाद ३५ वर्ष की आयु में दिनांक ३१ मार्च २००७ को आचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया गया।
चैतन्य कृतियाँ: मुनिश्री १०८ मनोज्ञसागर जी, मुनिश्री १०८ प्रमेयसागर जी, मुनिश्री १०८ प्रशमसागर जी, मुनिश्री १०८ प्रत्यक्षसागर जी(समाधी ), मुनिश्री १०८ सुप्रभसागर जी, मुनिश्री १०८ सुव्रतसागर जी, मुनिश्री १०८ सुयशसागर जी, मुनिश्री १०८ अनुत्तर सागर जी, मुनिश्री १०८ अनुपम सागर जी, मुनिश्री १०८ अरिजित सागर जी, मुनिश्री १०८ आदित्य सागर जी, मुनिश्री १०८ अप्रमित सागर जी, मुनिश्री १०८ आस्तिक्य सागर जी, मुनिश्री १०८ आराध्य सागर जी, मुनिश्री १०८ प्रणेय सागर जी, मुनिश्री १०८ प्रणीत सागर जी, मुनिश्री १०८ प्रणव सागर जी, मुनिश्री १०८ प्रणत सागर जी, मुनिश्री १०८ प्रणुत सागर जी !

शुद्धात्म तरंगिणी, निजानुभव तरंगिणी,स्वानुभव तरंगिणी,पचंशील सिध्दान्त,आत्मबोध, प्रेक्ष  देशना,पुरुषार्थ देशना, तत्व देशना,अध्यात्म देशना,इष्टोपदेश भाष्य,समाधि शतक,स्वरूप-संबोधन परिशीलन,समय-देशना (समयसार).


परम पूज्य आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज के बचपन से प्रारंभिक क्रियायें उनके भविष्य में वैराग्य की और बढ़ते क़दमों का संकेत दे रही थी।उनका विवरण निम्न प्रकार से है।

बचपन से ही जिनालय जाना:- महाराज श्री अल्पायु से अपने पिता जी श्री रामनारायण जी एवं माता जी श्रीमती रत्ती देवी एवं अपने अग्रजों के साथ प्रतिदिन श्री जिन मंदिर जी दर्शनों के लिये जाने लगे थे।
रात्रि भोजन एवं अभक्ष्य वस्तुओं का त्याग:-लला राजेंद्र (आचार्य श्री का बचपन का नाम)ने ७ वर्ष की अल्पायु में श्री जिनालय में रात्रि भोजन का त्याग एवं अभक्ष्य वस्तुओं के त्याग का नियम ले लिया था और उसका पालन भली प्रकार से किया ।

सप्त व्यसनों का त्याग एवं अष्ट मूल गुणों का पालन:- लला राजेंद्र जब ८ वर्ष के थे तभी से उन्होंने सप्त व्यसन का त्याग एवं अष्ट मूल गुणों का पालन करना प्रारंभ कर दिया था।

बिना देव दर्शन भोजन न करने का नियम:- लला राजेंद्र ने १३ वर्ष की अल्पायु में तीर्थराज श्री दिग. जैन सिद्ध क्षेत्र शिखर जी में बिना देव दर्शन के भोजन न करने का नियम ले लिया था ।

स्वत: ब्रहमचर्य व्रत अंगीकार :- अल्पायु में लला राजेंद्र ने अपने ग्राम रुर के जिनालय में भगवान् के समीप स्वयं ही ब्रहमचर्य व्रत ले लिया था ।

अनेक तीर्थ क्षेत्रों की वंदना करने का सौभाग्य :- राजेंद्र लला ने अपने पिता जी माता जी एवं अनेक परिवार जनों के साथ बचपन से ही शिखर जी,सोनागिरी जी,एवं अनेक तीर्थ क्षेत्रों के दर्शन करने एवं वह विराजमान पूज्य महाराजों के दर्शन करना भी उनके वैराग्य का एक बिंदु है।

परमपूज्य गुरुवर १०८ मुनि श्री विराग सागर जी महाराज के प्रथम दर्शन अपनी बहन के यहाँ नगर भिंड में सन १९८८ में प्रथम बार किये ।उनके प्रवचन और दर्शन से राजेंद्र लला के मन में वैराग्य कके बीज अंकुरित होने लगे।

जैन धर्म की पुस्तकों का अध्ययन ,मनन ,चिंतन :- राजेंद्र भैया बचपन से ही ग्रथों का अध्ययन करके उन पर मनन एवं चिंतन करने लगे थे ,जो उनके वैराग्य की और बढ़ने का एक माध्यम बना।

भिंड में आदरणीय संयमी महानुभावों से भेंट :- जैन मंदिर भिंड में आदरणीय पं. मेरु चन्द्र जी(परमपूज्य मुनिश्री विश्व कीर्ति सागर जी महाराज) वर्तमान में समाधिस्थ एवं बाल ब्र. श्री रतन स्वरूप श्री जैन (वर्तमान में आचार्य श्री विनम्र सागर जी महाराज) से मुलाकात भी भैया राजेंद्र के पथ पर बढ़ने में सहायक हुई।
परम पूज्य गुरुवर श्री का वर्ष १९८८ का भिंड में वर्षा योग :- पूज्य मुनि श्री १०८ विराग सागर जी महाराज का १९८८ में पवन वर्षा योग भिंड नगर में हुआ ।भैया राजेंद्र उस अवधि में अपनी बहन के यहाँ भिंड में रहकर पूज्य गुरुवर के संघ में आते रहते थे।इस से लम्बे समय तक गुरुवर का सानिध्य मिला उनके प्रवचन का भी प्रभाव पड़ा ।जिस से उनका मन विराग सागरजी में चरणों में रम गया और वे संघ में ही रहने लगे और वह से विहार करने पर संघ के साथ विहार भी किया।

ब्रह्मचर्य व्रत अंगीकार करना:- श्री राजेंद्र भैया पूज्य गुरुवर मुनि श्री १०८ विराग सागर जी के साथ विहार करते हुए अतिशय क्षेत्र बारासों पधारे ।यद्यपि राजेंद्र ने रुर नगर में जिनालय के सामने दीपावली के दिन ब्रह्मचर्य व्रत के लिया था फिर भी यहाँ गुरुवर के समीप दिनांक १६ नवम्वर को १७ वर्षकी उम्र में ब्रहमचर्य व्रत पुन: अंगीकार किया।

ब्रह्मचर्य अवस्था में नग्न होकर अभिषेक करना:- १९८८ में एकांत मे ब्रह्मचर्य अवस्था में नग्न होकर भगवान् का अभिषेक किया था जो उनके भविष्य का संकेत दे रहा था।