Skip to main content

Posts

Recent posts

जैन दीपावली (मोक्ष कल्याणक) 2026: पूजन विधि, महत्व

जैन परंपरा में दीपावली का दिन 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के मोक्ष (निर्वाण) कल्याणक के रूप में अत्यंत श्रद्धा और पवित्रता के साथ मनाया जाता है। इस पावन अवसर पर जैन समाज भौतिक तड़क-भड़क और पटाखों के स्थान पर आत्म-कल्याण, जप और तप की आराधना करता है। मोक्ष कल्याणक (दीपावली) की जैन पूजन विधि जैन शास्त्रों के अनुसार, अमावस्या की सुबह (प्रत्युष बेला) में भगवान महावीर को पावापुरी नगरी से मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इसलिए जैन घरों और मंदिरों में सुबह के समय ही मुख्य पूजा संपन्न की जाती है: प्रातःकाल देव दर्शन और अभिषेक: श्रावक-श्राविकाएं सुबह जल्दी स्नानादि करके पवित्र व सादे वस्त्र (अथवा पूजन के धोती-दुपट्टा) पहनकर जिनालय (जैन मंदिर) जाते हैं। मंदिर जी में वेदी पर भगवान महावीर स्वामी की प्रतिमा का जल, चंदन और केसर से मंगल अभिषेक व शांतिधारा की जाती है। अष्टद्रव्य से पूजन: वेदी के समक्ष बैठकर भगवान महावीर स्वामी की विशेष देव-शास्त्र-गुरु पूजन और मोक्ष कल्याणक की जयमाला व अर्घ्य समर्पित किया जाता है। पूजा में जल, चंदन, अक्षत, पुष्प,...

जैन धर्म में निर्वाण लाडू क्यों, कैसे और कब चढ़ाया जाता है? जानिए इसके पीछे का आध्यात्मिक रहस्य

आइए शंका-समाधान (FAQ) के रूप में विस्तार से जानते हैं कि निर्वाण लाडू से जुड़ी परंपरा क्या कहती है: Q1: निर्वाण लाडू कब चढ़ाया जाता है? (When) जब कोई तीर्थंकर या महान मुनि अपने सभी कर्मों का क्षय करके मोक्ष (निर्वाण) प्राप्त करते हैं, तब उनके निर्वाण कल्याणक के दिन या वार्षिक निर्वाण दिवस पर निर्वाण लाडू चढ़ाया जाता है। विशेष अवसर: जैन धर्म में इसका सबसे प्रमुख अवसर दीपावली का दिन होता है, जिस दिन भगवान महावीर स्वामी को पावापुरी से मोक्ष प्राप्त हुआ था। इसके अलावा अन्य 23 तीर्थंकरों के मोक्ष कल्याणक के अवसरों पर भी यह विधिपूर्वक चढ़ाया जाता है। Q2: निर्वाण लाडू क्यों चढ़ाया जाता है? (Why) मोक्ष का उत्सव: जैन परंपरा में किसी की मृत्यु को साधारण अर्थों में अंत नहीं माना जाता। जब कोई आत्मा जन्म-मरण के चक्र से हमेशा के लिए मुक्त होकर सिद्ध क्षेत्र में विराजमान होती है, तो वह सबसे बड़ा आनंद का क...

शरद पूर्णिमा पर गुरुदेव के चरणों में शत् शत् नमोस्तु

चौबीस तीर्थंकर संपूर्ण सूची: प्रतीक चिन्ह, जन्म और मोक्ष कल्याणक भूमि | 24 Tirthankara List with Map Location

चौबीस तीर्थंकरों के नाम, प्रतीक चिन्ह, जन्म भूमि एवं निर्वाण स्थली की प्रामाणिक सूची "परस्परोपग्रहो जीवानाम्" चौबीस तीर्थंकर संपूर्ण विवरण 📌 निर्देश: नीचे दिए गए जन्म व मोक्ष तीर्थ स्थलों के नामों पर क्लिक करके आप सीधे गूगल मैप्स पर उस तीर्थ क्षेत्र की लोकेशन देख सकते हैं। क्र. तीर्थंकर नाम प्रतीक (लांछन) जन्म कल्याणक भूमि मोक्ष कल्याणक भूमि 1 भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) वृषभ (बैल) अयोध्या जी (उ.प्र.) अष्टापद जी (कैलाश) 2 भगवान अजितनाथ गज (हाथी) अयोध्या जी (उ.प्र.) सम्मेद शिखर जी (झारखंड) 3 भगवान सम्भवनाथ अश्व (घोड़ा) श्रावस्ती जी (उ.प्र.) सम्मेद ...

पूज्य मुनिश्री 108 अजितसागर जी महाराज: संक्षिप्त जीवन परिचय, दीक्षा यात्रा एवं प्रमुख साहित्य सृजन

संत शिरोमणि आचार्य भगवन श्री १०८ विद्यासागर जी महाराज के आज्ञानुवर्ती, प्रखर वक्ता, कुशल साहित्यकार एवं आगम-अध्यात्म के गंभीर अध्येता पूज्य मुनिश्री १०८ अजितसागर जी महाराज की जीवन यात्रा वैराग्य, गुरु-समर्पण और निरंतर ज्ञान-साधना का एक अनुपम उदाहरण है। संक्षिप्त जीवन-वृत्त (एक नज़र में) पूर्व नाम: बाल ब्रह्मचारी विनोद जी जैन जन्म दिवस: 17 अप्रैल 1968 (वैशाख कृष्ण पंचमी, विक्रम संवत 2025, बुधवार, प्रातः 4:30 बजे) जन्म स्थान: सिमरिया (गढ़ाकोटा), जिला-सागर (मध्य प्रदेश) माता-पिता: श्रीमती ताराबाई जी एवं श्री कोमलचन्द जी जैन परिवार: ज्येष्ठ भ्राता श्री भागचंद जी, अनुज श्री बालचंद जी; तीन बहनें (श्रीमती मालती जी, श्रीमती ममता जी, श्रीमती राजुल जी) लौकिक शिक्षा: आठवीं कक्षा तक धार्मिक शिक्षा: गुरु चरणों में आगम, न्याय, सिद्धांत एवं अध्यात्म का गहन स्वाध्याय आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत: 27 दिसम्बर 1987, क्षेत्रपाल जी (ललितपुर, उप्र) गृहत्याग: नवम्बर 1988 (आचार्यश्री के आशीर्वाद से) प्रतिमा व्रत: द्वितीय प्रतिमा: 15 जून 1989 (श्री धर्मनाथ मो...

श्री महावीर जी (करौली, राजस्थान): दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र का अलौकिक इतिहास और गौरवशाली गाथा

राजस्थान के करौली जिले में गंभीरी नदी के तट पर स्थित श्री महावीर जी देश के सबसे प्रमुख और श्रद्धा से परिपूर्ण दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्रों में से एक है। जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी को समर्पित यह पवित्र तीर्थ अपनी चमत्कारी घटनाओं, अनूठी परंपराओं और भव्य वास्तुकला के लिए देश-विदेश में विख्यात है। इतिहास और अलौकिक प्रकटीकरण (Divine Discovery) प्राचीन मूलनायक प्रतिमा: मुख्य मंदिर के गर्भ गृह में विराजमान मूलनायक प्रतिमा भगवान महावीर स्वामी की है। भूरे-तांबे (Copper-colored) रंग की यह सुंदर प्रतिमा पद्मासन मुद्रा में विराजमान है, जो ऐतिहासिक अनुमान के अनुसार 1000 वर्ष से अधिक प्राचीन और पाषाण (বালू पत्थर/Sandstone) से निर्मित है। सुरक्षा हेतु संरक्षण: इतिहास और मान्यताओं के अनुसार, विदेशी आक्रमणों और क्षेत्रीय अशांति के दौर में जैन प्रतिमाओं को खंडित होने से बचाने के लिए सुरक्षित रूप से भूमिगत या टीलों में संरक्षित किया जाता था। गाय के दूध का चमत्कार (17वीं शताब्दी): सदियों तक यह प्रतिमा चंदनपुर गाँव के पास ए...
फीडबैक दें