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चौबीस तीर्थंकरों के बिना कुछ ना मिले

शासन मिले ना ऋषभनाथ के बिना ।
विनय मिले ना अजितनाथ के बिना ।
संभव हो ना संभवनाथ के बिना ।
वन्दन मिले ना अभिनन्दन के बिना ।
समृद्धि मिले ना सुमतिनाथ के बिना ।
पदवी मिले ना पद्मनाथ के बिना ।
दया मिले ना सुपार्श्वनाथ के बिना ।
उजाला मिले ना चन्द्रप्रभ के बिना ।
सुविधि मिले ना सुविधिनाथ के बिना ।
ठंडक मिले ना शीतलनाथ के बिना ।
यश मिले ना श्रेयांसनाथ के बिना ।
पूजनीय बने ना वासुपूज्य के बिना ।
निर्मल बने ना विमलनाथ के बिना ।
शक्ति मिले ना अनंतनाथ के बिना ।
धर्म होवे ना धर्मनाथ के बिना ।
शांति मिले ना शान्तिनाथ के बिना ।
करुणा मिले ना कुंथुनाथ के बिना ।
आश्रय मिले ना अरनाथ के बिना ।
ममता मिले ना मल्लिनाथ के बिना ।
मुक्ति मिले ना मुनिसुव्रत के बिना ।
नरक मिटे ना नमिनाथ के बिना।
आनंद मिले ना अरिष्टनेमि के बिना ।
कमठ हारे ना पारसनाथ के बिना ।
चन्दना तिरे ना महावीर के बिना ।

साभार: बहन रेखा जैन
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शरद पूर्णिमा चन्दा उतरा श्रीमती माँ के द्वारे

शरद पूर्णिमा चन्दा उतरा
श्रीमती माँ के द्वारे
पिता मल्ल्प्पा ऐसे हर्षे
दुख भूल गये सारे
सारे गगन में खुशियाँ छाई
नर नारी मंगल गायें
श्रीमती माँ का राजदुलारा सबको खूब सुहाए
बोलो जय जय जय बोलो जय जय जय
ज्ञान गुरु ने विद्याधर को विद्यासागर बना दिया
नीर बूँद को सिन्धु बनाकर आगम का रस पिला दिया
ज्ञान सूर्य के तेज़ प्रकाश में आत्म तत्व को जान लिया
जिनवाणी की छाया में निश दिन आतम ध्यान किया
उनके तप को देख़ सभी ने अपने शीश झुकाए
श्रीमती माँ का राजदुलारा सबको खूब सुहाए
बोलो जय जय जय बोलो जय जय जय
चेहरे पर उनके, मुस्कान सदा ही रहती
उनके दर्शन पाके मुरझाई कली खिल जाती
तप की इतनी गर्मी, सर्दी न छू पाती
मन है इतना शीतल, गर्मी पास न अाती
अपने आशीष वचनों की माला हमें पहनाएं
श्रीमती माँ का राजदुलारा सबको खूब सुहाए
बोलो जय जय जय बोलो जय जय जय
चहुँ दिशाओं का बाना ओढे रहते सदा दिगम्बर
सीधे सरल विद्या गुरु है, न रखते कोई आडम्बर
वीर झलकते है उनमें, जब करते आतम चिंतन
दर्शन मूलाचार के, है समयसार के अद्भुत दर्शन
विद्या गुरु सा एक सितारा नील गगन में छाए
श्रीमती माँ का राजदुलारा सबको खूब सुहाए
अपनी मधुर वाणी से जिनवाणी रसपान कराएँ
श्रीमती माँ का राजदुलारा सबको खूब सुहाए
बोलो जय जय जय बोलो जय जय जय
हम सब मिलकर नमन करे, गुरुवर का आशीष पायें।

रचना: डाली जैन 
साभार: आयुषी जैन
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रामटेक की जागी आशा विद्यागुरु का मिला चौमासा

रामटेक की जागी आशा
विद्यागुरु का मिला चौमासा
मैं मूक माटी हूँ,
माटी हूँ एक पवित्र भूमि की
मैं भूमि हूँ,
पावन भूमि हूँ रामटेक की
जहाँ भगवान राम ने
वनवास में टेक ली
जहाँ इस युग के भगवन
की विशेष अनुकम्पा रही
जहाँ संत शिरोमणि ने
चार चार चातुर्मास किये हों
24 मुनि और 2 अर्यिका
ऐसे 26 महाव्रती दिए हों
नि:शब्द हुए सब, नि... शब्द से
निस्वार्थ सहित सब मुनि बने
निर्वाण के पथ चलने वाले से
24 बालयति मुनि बने
और जो इतिहास बना हो
गुरु शिष्य मिलन का
और ऐसा मिलन
जो सारी कल्पनाओं से परे था
ऐसा मिलन जहाँ एक शिष्य
गुरु चरणों से ऐसे लिपटा
जैसे एक नन्हा का बालक
वर्षो बाद अपने पिता से मिला
जहाँ एक शिष्य के नयन सुधा
गुरु पग प्रक्षालन कर रहे थे
तो गुरु चरण से निकले
गंधोदक को शिरोधार्य कर रहे थे
ऐसे से संत शिरोमणि
गुरु पग तले गर्व से आते हैं
तभी तो हम
पावन भूमि कहलाते हैं
रामटेक के गौरव शाली क्षण
पुनः सौभाग्य से आ रहे है
पंचम युग के भगवन
पंचम चौमासा करने आ रहे हैं। 
अनियत विहारी गुरुदेव विद्यासागर जी महाराज
के पावन चरण युगल में बारम्बार नमोस्तु

शब्दांकन: एक गुरु भक्त
साभार: राहुल जैन

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