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आरोग्य (अमृतादि) काषायम चूर्ण, संशमनी वटी टेबलेट घर पर मंगवाने हेतु।

कोरोना संक्रमण का आयुर्वेदिक उपचार वर्तमान मे फैल रहे कोरोना विषाणु के संक्रमण को रोकने एवं प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के आशीर्वाद से संचालित पूर्णायु आयुर्वेदिक चिकित्सालय एवं अनुसंधान विद्यापीठ जबलपुर, मध्य प्रदेश द्वारा आयुर्वेदिक औषधियाँ तैयार की गई हैं

1. आरोग्य (अमृतादि) कषायम चूर्ण 100 ग्राम पैक मूल्य 150/- रुपया
2. संशमनी वटी 40 टेबलेट पैक मूल्य 120/- रुपया
कोरियर चार्ज अलग से

नोट :- एक सेट में एक व्यक्ति के लिए करीब 20 दिन की औषधि अनुमानित आती है

ये औषधियाँ आप कोरियर द्वारा घर पर मंगा सकते हैं
1.👉 1 सेट 270 ₹ प्लस 90 ₹ कोरियर चार्ज सहित 360 ₹)
2.👉 2 सेट 540 ₹ प्लस 100 ₹ कोरियर चार्ज सहित 640 ₹)
3.👉 3 सेट 810 ₹ प्लस 100 ₹ कोरियर चार्ज सहित 919 ₹)
4.👉 4 सेट 1080 ₹ प्लस 140 ₹ कोरियर चार्ज सहित 1220 ₹)
5.👉 5 सेट 1350 ₹ प्लस 140 कोरियर चार्ज सहित 1490 ₹)

1. सर्व प्रथम नीचे दिए गये अकाउंट नंबर पर अपने सेट के अनुसार भुगतान करे 
2. भुगतान हो जाने के बाद भुगतान की रसीद या स्कीन शॉट नीचे दिए गए व्हाट्सएप्प नंबर पर भेजे 
3. अपना पूरा नाम व पता पिन कोड सहित एवं सेट की संख्या भेजे

NAME: PURNAYU AYURVED CHIKITSALAYA AVAM ANUSANDHAN VIDYA PEETH
A/C NUMBER: 50100288112583
IFSCCODE: HDFC0000224


व्हाट्सएप्प नंबर: +91-95752- 24466


संपर्क
पूर्णायु आयुर्वेद चिकित्सालय एवम् अनुसंधान विद्यापीठ
श्री दिगंबर जैन संरक्षिणी सभा 657 जवाहर गंज, जबलपुर मध्य प्रदेश – भारत
+91 9575 224466 (General Info.)
poornayuayurved@gmail.com

अच्छे संस्कार

1. लगातार दो बार से अधिक किसी को कॉल न करें। यदि वे आपकी कॉल नहीं उठाते हैं, तो मान लें कि इस वक्त उनके पास कुछ महत्वपूर्ण कार्य है।
2. वह धन पहले लौटाएँ जो दूसरे व्यक्ति के याद दिलाने या माँगने से पहले ही लिया हो। यह आपकी ईमानदारी और चरित्र को दर्शाता है।
3. जब कोई आपको लंच / डिनर दे रहा हो तो कभी भी मेनू पर महंगे पकवान का ऑर्डर न करें। यदि संभव हो तो उन्हें ही आपके लिए अपनी पसंद का ऑर्डर करने के लिए कहें।
4. ओह! 'तो आपने अभी तक शादी नहीं की है'? या अरे! 'क्या आपके बच्चे नहीं हैं’ जैसे अजीबो गरीब सवाल नहीं पूछें।
'आपने घर क्यों नहीं खरीदा'? या 'आप कार क्यों नहीं खरीदते'? यह आपकी समस्या नहीं है।
5. अपने पीछे आने वाले व्यक्ति के लिए हमेशा दरवाजा खोलें। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह लड़का है या लड़की, सीनियर है या जूनियर। आप सार्वजनिक रूप से किसी के भी साथ अच्छा व्यवहार करें।
6. यदि आप किसी दोस्त के साथ टैक्सी लेते हैं, और वह अभी भुगतान करता है, तो अगली बार आप भुगतान करने का प्रयास करें।
7. विभिन्न प्रकार के विचारों का सम्मान करें। याद रखें कि आपके लिए जो 6 दिख रहा है वो सामने से आने वाले लोगों को 9 दिखाई देगा।
8. लोगों से बात करते समय बीच में कभी बाधा न डालें। उन्हें अपनी बात कहने की अनुमति दें।
9. यदि आप किसी को चिढ़ाते हैं, और वे इसका आनंद नहीं लेते हैं, तो इसे रोकें और फिर कभी ऐसा न करें।
10. जब कोई आपकी मदद कर रहा हो तो "धन्यवाद" जरूर कहें।
11. सार्वजनिक रूप से प्रशंसा करें! जरूरी हो तभी निजी तौर पर आलोचना करें।
12. किसी के वजन पर टिप्पणी करने का कभी कोई मतलब नहीं है। बस कहें, "आप शानदार दिखते हैं।"
13. जब कोई आपको अपने मोबाईल पर एक फोटो दिखाता है, तो स्वयं उसके मोबाइल पर बाएं या दाएं स्वाइप न करें। आपको नहीं पता कि आगे उसका निजी फोटो है।
14. यदि कोई सहकर्मी आपको बताता है कि उसे डॉक्टर से मिलना है, तो यह न पूछें कि किस लिये मिलना है? बस कहें "मुझे आशा है कि आप ठीक हैं"। अपनी व्यक्तिगत बीमारी बताने के लिए उन्हें असहज स्थिति में न डालें।
15. अगर आप अपने से नीचे के लोगों के साथ सम्मान के साथ व्यवहार करते हैं तो लोग नोटिस करेंगे।
16. यदि कोई व्यक्ति आपसे सीधे बात कर रहा है, तो अपने फोन को देखना अशिष्टता है।
17. जब तक आप से नहीं पूछा जाये तब तक कभी भी बिन मांगे सलाह न दें।
18. जब किसी से लंबे समय के बाद मिल रहे हो तो, जब तक वे इसके बारे में बात न करें, तब तक उनसे उनकी उम्र और वेतन न पूछें।
19. अपने काम से काम रखें।
20. अपने धूप के चश्मे को हटा दें जिस समय आप किसी से सड़क पर बात कर रहे हैं। यह सम्मान की निशानी है। नेत्र संपर्क आपके भाषण में महत्वपूर्ण है।
21. गरीबों के बीच में अपने धन के बारे में कभी बात न करें।
22. और अंत में ऐसी पोस्ट साझा करें। जिससे कि आपने जो कुछ सीखा है उससे दूसरों को भी सीखने में मदद मिले।

आचार्य श्री विद्यासागरजी महामुनिराज (ससंघ) इस समय अतिशय क्षेत्र खजुराहो जी में विराजमान हैं।

विश्व वंदनीय आचार्यश्री १०८ विद्यासागरजी महामुनिराज (ससंघ) इस समय अतिशय क्षेत्र खजुराहो जी में विराजमान हैं। इस अवसर पर आप सभी सादर आमंत्रित है। अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें -
श्री विनोद जैन : +91-9425342180,
श्री दिलीप जैन : +91-9893717820,
श्री शांत जैन : +91-9425146054,
श्री अनूप जैन : +91-9425143679,
श्री राकेश जैन : +91-9165816035,
श्री योगेश जैन : +91-9584284298
निकटतम रेल्वे स्टेशन : खजुराहो (KURJ)
निकटतम बस स्टैंड : खजुराहो बस स्टैंड
निकटतम हवाई अड्डा : खजुराहो हवाई अड्डा
निकटतम स्थान : छतरपुर लगभग ४० किलो मीटर
भोपाल से खजुराहो के लिए ट्रेन
22163 - BHOPAL - KHAJURAHO


सबसे ज्यादा दीक्षाएं प्रदान करने के लिए

गोल्डन बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स ने प्रदान किया सर्टिफिकेट ऑफ़ एक्सीलेंस
मोस्ट जैन मनेस्टसिज़म बिस्टोड बाय अ मुनि

साभार: सौरभ मोदी, सागर 

विद्योदय



महापुरुष प्रकाश में नहीं आते, आना भी नहीं चाहते प्रकाश प्रदान में ही उन्हें रस आता हैं उनका कथन किसी श्लोक से कम नहीं उनका लेखन किसी दर्शन से कम नहीं और उनका जीवन किसी शास्त्र से कम नहीं उनका हाथ ही पवित्र पात्र हैं पृथ्वी ही जिनकी सैय्या हैं जिन्हें अप्राप्त की चाह नहीं और प्राप्त का मोह नहीं जो दिगम्बर हैं रोम-रोम में पुरुषार्थ वो परोपकार का सागर लिये अनंत यात्री महापुरुष आचार्य श्री विद्यासागर जी 
आनंदमयो ज्ञानमयो विज्ञानमयो आदित्या

आचार्य श्री की उपस्थिति ही विद्या का उदय हैं विद्योदय हैं !

स्त्रोत : विद्योदय 

सुधासागर महाराज के ससंघ सानिध्य में 71 फीट ऊंचे कीर्ति स्तंभ का लोकार्पण

अजमेर!उल्लेखनीय है कि इस कीर्ति स्तंभ को तैयार करने में करीब 4 माह लगे। स्तंभ के आसपास पत्थर दीवारों पर विद्यासागर महाराज से जुड़ी सजीव कहानी व्यक्त करती प्रतिमाएं उकेरी गई हैं। कीर्ति स्तंभ को लोकार्पण से पूर्व आकर्षक रोशनी से सजाया गया है। लगभग 50 वर्ष पूर्व अजमेर की धरा पर महाकवि आचार्य ज्ञान सागर महाराज ने ब्रह्मचारी विद्याधर को दिगंबरी दीक्षा प्रदान की थी, जो आज विश्व में आचार्य विद्यासागर महाराज के नाम से जाने जाते हैं। 

महोत्सव के उपलक्ष्य में प्रसादी वितरण आज


विद्यासागर जी महाराज के 50वें संयम स्वर्ण जयंती महोत्सव के उपलक्ष्य में शनिवार को प्रसादी वितरण कार्यक्रम होगा। राजकुमार पाण्ड्या ने बताया कि अजमेर ओल्ड आयरन एंड मोटर पार्ट्स व्यापार संघ अजमेर एवं जैन व्यापारियों द्वारा प्रसादी वितरण शनिवार सुबह 11.15 बजे लाल कोठी आदिनाथ मार्ग केसरगंज में होगा। 

बुराई तभी मिटती है, जब पिटती है।


जब कोई शिष्य गुरू के प्रति समर्पण करता है तो वह मिटने पिटने के लिए तैयार हो जाता है। जिस पात्र में खट्टी-छाछ भरी रही, उसमें शुद्ध दूध रखोगे तो वह भी खराब हो जाएगा। सुधासागर महाराज ससंघ ने शुक्रवार को धर्म सभा में कहा कि कुसंस्कारों की भूमि पर सुसंस्कारों का भवन तैयार नहीं होता। कुसंस्कारों की बंजर भूमि पर सुसंस्कारों का बीजारोपण फलीभूत नहीं होता। तुम्हें शक्कर का स्वाद तभी आएगा, जब अपने मुख से नमक की डेली निकाल दो। महाराज ने कहा कि मिटो वहीं, जहां तुम्हें सुंदर नया आकार मिले और पिटो वहीं, जहां जीवन साकार बने। अज्ञानी व्यक्ति का कल्याण उनकी अपेक्षा जल्द हो सकता है, जिन्होंने ज्ञान के नाम पर अज्ञान को बटोर लिया है। बुराई तभी मिटती है जब पिटती है।

साभार: अजय जैन

34 साल के बाद दिगौड़ा की धरती पर पड़े आचार्य श्री विद्यासागर जी के चरण

जैन समाज में उमड़ा आस्था का सैलाब


दिगौड़ा पपौराजी से विहार करते हुए आचार्य विद्यासागरजी महाराज शुक्रवार को सुबह दिगौड़ा पहुंचे, जहां जैन समाज के लोगों ने उनकी भव्य अगवानी की।  आचार्यश्री मुख्य बाजार होते हुए जैन मंदिर पहुंचे, जहां उन्होंने सभी समाज के लोगों को मानवता की सीख देते हुए प्रवचन दिए। स्थानीय निवासी अभय जैन ने बताया कि 34 साल पहले गुरुवर दिगौड़ा में आये थे। अब एक लंबे अरसे के बाद उन्होंने दिगौड़ा पर कृपा की और धन्य कर दिया। आचार्य ने महेंद्र कुमार जैन के घर पर भोजन ग्रहण किया। दिगौड़ा में बहुत दूर दूर से जैन समाज के लोगों ने पहुंचकर आचार्य के दर्शन किए।  शिक्षक सुखनंदन जैन ने बताया कि आचार्य टीकमगढ़ से बंधाजी के लिए विहार पर निकले थे, परंतु दिगौड़ा वालों का सौभाग्य है कि गुरुवर दिगौड़ा होते हुए निकले। ग्रामवासियों को दर्शन और सेवा का अवसर प्रदान किया।  समाज के लोगों में आस्था देखते ही बनती थी। हर कोई गुरुवर के दर्शनों को लालायित देखा जा रहा था। वो जिस गली से भी गुज़रे सभी आस्था से नतमस्तक हो गए। जैन समाज के अलावा सभी धर्मों के मानने वाले गुरुवर के दर्शन को दौड़ पड़े। इस अवसर पर पुलिस की चाकचौबंद व्यवस्था रही। लगभग दस हज़ार से भी अधिक की संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे। 
दिगौड़ा| आचार्य विद्यासागर महाराज की शनिवार सुबह बंधाजी में आगवानी होगी। प्रात:कालीन आगवानी में ब्र. सुनील भैया के सानिध्य में विभिन्न कार्यक्रम होंगे। पूरे बंधाजी को दुल्हन की तरह सजाया गया है। जगह-जगह तोरणद्वार लगाए गए हैं। बंधाजी क्षेत्र कमेटी के अध्यक्ष मुरली मनोहर जैन ने बताया कि 1008 कलशों से अजितनाथ भगवान का महा मस्तकाभिषेक हाेगा। आचार्यश्री का संयम स्वर्ण महोत्सव, आचार्य भगवंत कि दिव्य देशना एवं विद्योदय फिल्म का प्रदर्शन होगा।

साभार: भास्कर

अक्षय तृतीया पर्व की महिमा

भव्यात्माओं! भगवान ऋषभदेव का जब छह माह का योग पूर्ण हो गया वे यतियों-मुनियों की आहार विधि बतलाने के उद्देश्य से शरीर की स्थिति के लिये निर्दोष आहार हेतु निकल पड़े। महामेरू भगवान ऋषभदेव ईर्यापथ से गमन कर रहे हैं, अनेकों ग्राम नगर शहर आदि में पहुँच रहे हैं। उन्हें देखकर मुनियों की चर्या को न जानने वाली प्रजा बड़े उमंग से साथ सन्मुख आकर उन्हें प्रणाम करती है। उनमें से कितने ही लोग कहने लगते हैं कि हे देव! प्रसन्न होइये और कहिये क्या काम है ? हम सब आपके किंकर हैं, कितने ही भगवान के पीछे-पीछे हो लेते हैं। अन्य कितने ही लोग बहुमूल्य रत्न लाकर भगवान् के सामने रख देते हैं और कहते हैं कि हे नाथ! प्रसन्न होइये, तुच्छ भेंट स्वीकार कीजिये, कितने ही सुन्दरी और तरुणी कन्याओं को सामने करके कहते हैं प्रभो! आप इन्हें स्वीकार कीजिये, कितने ही लोग वस्त्र, भोजन, माला आदि अलंकार ले-लेकर उपस्थित हो जाते हैं, कितने ही लोग प्रार्थना करते हैं कि प्रभो! आप आसन पर विराजिये, भोजन कीजिये इत्यादि इन सभी निमित्तों से प्रभु की चर्या में क्षण भर के लिए विघ्न पड़ जाता है पुनः वे आगे बढ़ जाते हैं। इस प्रकार से जगत को आश्चर्य में डालने वाली गूढ़ चर्या से विहार करते हुए भगवान के छह माह व्यतीत हो जाते हैं।

राजा श्रेयांस के सात स्वप्न: एक दिन रात्रि के पिछले भाग में हस्तिनापुर के युवराज श्रेयांसकुमार सात स्वप्न देखते हैं। प्रसन्नचित्त होते हुए प्रात: राजासोमप्रभ के पास पहुंचकर निवेदन करते हैं कि हे भाई! आज मैंने उत्तम-उत्तम सात स्वप्न देखे हैं सो आप सुनें-

प्रथम ही सुवर्णमय सुमेरूपर्वत देखा है, 
दूसरे स्वप्न में जिनकी शाखाओं पर आभूषण लटक रहे हैं ऐसा कल्पवृक्ष देखा है, 
तृतीय स्वप्न में ग्रीवा को उत्पन्न करता हुआ सिंह देखा है, 
चतुर्थ स्वप्न में अपने सींग से किनारे को उखाड़ता हुआ बैल देखा है, 
पंचम स्वप्न में सूर्य और चंद्रमा देखे हैं, 
छठे स्वप्न में लहरों से लहराता हुआ और रत्नों से शोभायमान समुद्र देखा है और 
राजा सातवें स्वप्न में अष्ट मंगल द्रव्य को हाथ में लेकर खड़ी हुई ऐसी व्यंतर देवों की मूर्तियां देखी हैं । सो इनका फल जानने की मुझे अतिशय उत्कंठा हो रहाजा सोमप्रभ द्वारा स्वप्नों का फलबताना?

भाई के स्वप्नों को सुनते हुए राजा सोमप्रभ कुछ अकल्पित ही श्रेष्ठ फलों की कल्पना करते हुए पुरोहित की तरफ देखते हैं कि पुरोहित निवेदन करता है- हे राजकुमार! स्वप्न में मेरूपर्वत के देखने से यह स्पष्ट ही प्रकट हो रहा है कि जिसका मेरूपर्वत पर अभिषेक हुआ है ऐसा कोई देव आज अवश्य ही अपने घर आयेगा और ये अन्य स्वप्न भी उन्हीं के गुणों की उन्नति को सूचित कर रहे हैं। आज उन भगवान के प्रति की गई विनय के द्वारा हम लोग अतिशय पुण्य को प्राप्त करेंगे। आज हम लोग जगत में बड़ी भारी प्रशंसा, प्रसिद्धि और संपदा के लाभ को प्राप्त करेंगे इस विषय में कुछ भी संदेह नहीं है और कुमार श्रेयांस तो स्वयं ही इन स्वप्नों के रहस्य को जानने वाले हैं। इस तरह से पुरोहित के वचनों से प्रसन्न हुए दोनों भाई स्वप्न की और भगवान की कथा करते हुए बैठे ही थे कि इतने में योगिराज भगवान ऋषभदेव ने हस्तिनापुर नगर में प्रवेश किया।
भगवान ॠषभदेव का हस्तिनापुर में प्रवेश उस समय भगवान के दर्शनों की इच्छा से चारों तरफ अतीव भीड़ इकट्ठी हो गई। कोई कहने लगे-देखो-देखो, आदिकर्ताभगवान ऋषभदेव हम लोगों का पालन करने के लिए यहां आए हैं, चलो जल्दी चलकर उनके दर्शन करें और भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करें। कोई कह रहे थे कि संसार का कोई एक पितामह है ऐसा हम लोग मात्र कानों से सुनते थे सो आज प्रत्यक्ष में उनके दर्शन हो रहे हैं। अहो! इन भगवान के दर्शन करने से नेत्र सफल हो जाते हैं, इनका नाम सुनने से कान सफल हो जाते हैं और इनका स्मरण करने से अज्ञानी जीवों के भी अन्तःकरण पवित्र हो जाते हैं। कोई कहने लगे ओहो! ये भगवान् तीन लोक के स्वामी होकर भी सब कुछ छोड़तेकर इस तरह अकेले ही क्यों विहार कर रहे हैं ?

कोई स्त्री बच्चे को दूध पिलाते हुए भी अपने से अलग कर धाय की गोद में छोड़कर भगवान के दर्शन के लिए दौड़ पड़ी, कोई स्त्री कहने लगी सखी! भोजन करना बन्द कर, जल्दी उठ और यह अर्घ्य हाथ में ले, अपन चलकर जगतगुरु भगवान की पूजा करेंगे। इत्यादि कोलाहल के बीच से निकलते हुए भगवान मनुष्यों से भरे हुए नगर को सूने वन के समान जानते हुए निराकुल छोड़ कर वाँद्री चर्या का आश्रय लेकर विहार कर रहे हैं। इसी बीच सिद्धार्थ नाम का द्वारपाल आकर गदगद् वाणी से बोलता है-

राजा सोमप्रभ और राजा श्रेयांस द्वारा भगवान का नवधा भक्ति पूर्वक आहार कराना 

महाराज! तीन जगत् के गुरू भगवान ऋषभदेव स्वयं ही अकेले इधर आ रहे हैं।’ इतना सुनते ही राजा सोमप्रभ और राजकुमार श्रेयांस दोनों ही भाई अन्तःपुर सेनापति और मंत्रियों के साथ तत्क्षण ही उठ पड़े और राजमहल के आंगन तक बाहर आ गए। दोनो भाइयों ने दूर से ही भगवान को नमस्कार किया। उनके चरणों में अर्घ्य सहित जल समर्पित किया। भगवान के मुखकमल को देखते ही कुमार श्रेयांस को अपने कई भवों का जातिस्मरण हो आया, उनको रोमांच हो गया। ऐसा प्रतीत हुआ कि मानो मेरे घर में तीन लोक की सम्पदा ही आ गई है-उन्हें आहार देने की सारी विधि याद आ गई। शीघ्र ही पड़गाहन विधि को करते हुए भगवान की तीन प्रदक्षिणायें दीं। अन्दर ले गये, उन्हें उच्च आसन पर बैठने के लिए निवेदन किया-

भगवान! उच्च आसन पर विराजमान होइये। पुन: प्रभु के चरणों का प्रक्षालन करके मस्तक पर गंधोदक चढ़ाकर अपना जीवन धन्य माना और अष्ट द्रव्य से पूजा की। पुन: पुन: प्रणाम करके मन, वचन, काय की शुद्धि का निवेदन किया, पुनः आहार जल की शुद्धि का निवेदन करके भक्ति से हाथ जोड़कर बोल

सर्वप्रथम इक्षुरस का आहार

नाथ! यह प्रासुक इक्षुरस है इसे ग्रहण कर मुझे कृतार्थ कीजिए। भगवान् ने उस समय खड़े होकर अपने दोनों हाथों की अंजुली बनाई और उसमें आहार लेना शुरू किया।

राजकुमार श्रेयांस भगवान के हाथ की अंजुली में इक्षुरस दे रहे हैं। राजासोमप्रभ और रानी लक्ष्मीमती भी प्रभु के करपात्र में इक्षुरस देते हुए अपने आप को धन्य समझ रहे हैं। इसी बीच गगनांगण में देवों का समूह एकत्रित हो गया और रत्नों की वर्षा करने लगा, मंदार पुष्पों को बरसाने लगा, मंद सुगंध पवन चलने लगी, दुंदभि बाजे-बजने लगे और अहोदान, महादान, आदि ध्वनि से आकाशमंडल शब्दायमान हो गया।

आहार दान देकर अपने आपको कृतकृत्य मानना

इस समय दोनों भाइयों ने अपने आपको बहुत ही कृतकृत्य माना क्योंकि कृतकृत्य हुए भगवान ऋषभदेव स्वयं ही उनके घर को पवित्र करने वाले हैं। उस समय दान की अनुमोदना करने वाले बहुत से लोगों ने भी परम पुण्य को प्राप्त किया था। भगवान ऋषभदेव आहार ग्रहण कर वन की ओर प्रस्थान कर गये। राजा सोमप्रभ और श्रेयांस भी कुछ दूर तक भगवान् के पीछे-पीछे गये पुन: भगवान् को हृदय में धारण किये हुए ही वापस लौटते समय उन्हीं के गुणों की चर्चा करते हुए और प्रभु के पद से चिन्हित पृथ्वी को भी नमस्कार करते हुए आ गये। उस समय पूरे हस्तिनापुर में एक ही चर्चा थी कि राजकुमार श्रेयांस को प्रभु को आहार देने की विधि कैैसे मालूम हुई। यह आश्चर्यमयी दृश्य देवों के हृदय को भी आश्चर्यचकित कर रहा था। देवों ने भी मिलकर राजाश्रेयांस की बड़े आदर से पूजा की। 

भरत महाराज भी वहाँ आ गये और आदर सहित राजकुमार श्रेयांस से बोले-

हे महादानपते! कहो तो सही तुमने भगवान के अभिप्राय को कैसे जाना ? हे कुरुराज! आज तुम हमारे लिए भगवान के समान ही पूज्य हुए हो, तुम दानतीर्थ की प्रवृत्ति करने वाले हो और महापुण्यवान हो, इसलिये मैं तुमसे यह सब पूछ रहा हूँ कि जो सत्य हो वह अब मुझसे कहो।

इस प्रकार सम्राट के पूछने पर श्रेयांस कुमार बोलते हैं- राजन्! जिस प्रकार प्यासा मनुष्य सुगंधित स्वच्छ शीतल जल के सरोवर को देखकर प्रसन्न हो उठता है वैसे ही भगवान् के अतिशय रूप को देखकर मेरी प्रसन्नता का पार नहीं रहा कि मुझे उसी निमित्त से जातिस्मरण हो आया जिससे मैंने भगवान् का अभिप्राय जान लिया।

राजा श्रेयांस द्वारा अपना पूर्व भव बताना वह क्या ? मुझे भी सुनाओ। महाराज! आज से आठवें भव पूर्व विदेह क्षेत्र की पुंडरीकिणी नगरी के राजा वज्रजंघ और रानी श्रीमती ने बड़े ही प्रेम से वन में चारणऋद्धिधारी युगल मुनियों को आहारदान दिया था। उस समय राजा के मंत्री, सेनापति, पुरोहित और सेठ भीआहारदान की अनुमोदना कर रहे थे और पास में कुछ ही दूर से देखते हुए नेवला, वानर, व्याघ्र और सूकर ये चार पशु भी आहार देखकर प्रसन्नमन होते हुए उसकी अनुमोदना कर रहे थे। आहार होने के अनंतर कंचुकी ने कहा- राजन् ! ये दोनो ही मुनि आपके ही युगलिया पुत्र हैं। महाराज वज्रजंघ को अतीव हर्ष हुआ। वे उनके चरणों के निकट बैठकर अपनी रानी श्रीमती के, अपने मंत्री आदि चारों के तथा नेवला आदि चारों के भी पूर्व भव पूछने लगे। मुनिराज ने भी अपने दिव्य अवधिज्ञान के द्वारा क्रम-क्रम से सभी के पूर्व भव सुना दिये; 

अनंतर बतलाया कि-

आप इस भव से आठवें भव में जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र की अयोध्यानगरी में राजा नाभिराय की महारानी मरूदेवी की कुक्षि से प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के रूप में अवतार लेंगे। आपकी रानी श्रीमती का जीव हस्तिनापुर के राजा सोमप्रभ का भाई श्रेयांस कुमार होगा। आपके ये मंत्री आदि आठों जीव भी अब से लेकर आठ भव तक आपके साथ सम्बन्ध स्थापित करते हुए आपके तीर्थंकर के भव में आपके ही पुत्र होवेंगे और उसी भव से मोक्ष की प्राप्ति करेंगे।

हे चक्रवर्तिन्! आप उस समय राजा वज्रजंघ के मतिवर नाम के महामंत्री थे, सो इस भव में भगवान् के ही पुत्र होकर चक्रवर्ती हुए हो। उस समय के राजा वज्रजंघ के जो आनंद नाम के पुरोहित थे; उन्हीं का ही जीव आज आपके भाई बाहुबली हुए हैं जो कि कामदेव हैं। अकंपन सेनापति का जीव ही आपका भाई ऋषभसेन हुआ है जो कि आज पुरिमतालपुर नगर का अधीश्वर है, धनमित्र सेठ का जीव आपका अनंतविजय नाम का भाई है। दान की अनुमोदना से ही उन्नति करने वाले व्याघ्र का जीव आपका अनंतवीर्य नाम का भाई है, शूकर का जीव अच्युत नाम का भाई है, वानर का जीव वीर नाम का भाई है और नेवला का जीव वरवीर नाम का भाई है अर्थात् राजा वज्रजंघ के आहारदान के समय जो मतिवर मंत्री आदि चार लोग दान की अनुमोदना कर रहे थे और जो व्याघ्र आदि चारों जीव अनुमोदना कर रहे थे वे दान की अनुमोदना के पुण्य से ही क्रम -क्रम से मनुष्य के और देवों के सुखों का अनुभव करके अब इस भव में तीर्थंकर के पुत्र होकर महापुरूष के रूप में अवतीर्ण हुए हैं और सब इसी भव से प्रभु के तीर्थ से ही मोक्षधाम को प्राप्त करेंगे। मैं भी भगवान का गणधर होकर अंत में मोक्षधाम को प्राप्त करूंगा।

दान की महिमा

सम्राट भरत! यह दान की महिमा अचिन्त्य है, अद्भुत है और अवर्णनीय है। देव भी इसकी महिमा को नहीं कह सकते हैं पुनः साधारण मनुष्यों की तो बात ही क्या है? राजन! जो दाता, दान, देय और पात्र इनके लक्षणों को समझकर सत्पात्र में दान देता है वह निश्चित ही मोक्ष का अधिकारी हो जाता है। देखो! इस आहारदान के बिना मोक्षमार्ग चल नहीं सकता है; अतः आहार, औषधि, शास्त्र और अभय इन चारों दानों में भी आहारदान ही सर्वश्रेष्ठ है और वही शेष दानों की भी पूर्ति कर सकता है।’ इस प्रकार से विस्तृत भवावली और अपना या भगवान ऋषभदेव का व राजकुमार श्रेयांस के कई भवों तक पारस्परिक सम्बन्ध सुनकर भरत चक्रवर्ती अत्यधिक प्रसन्न हुए और बोले-

कुरूवंशशिरोमणे! भगवान ऋषभदेव जैसा ना तो कोई उत्तम सत्पात्र होगा और न आप जैसा महान दातार होगा, न आप जैसी नवधाभक्तिकी विधि ही होगी, न आपके जैसा उत्तम फल को प्राप्त करने का अधिकारी ही हर कोई बन सकेगा। आप इस युग में दानतीर्थ के प्रथम प्रर्वतक कहलाओगे। युग-युग तक आपकी अमर कीर्ति यह भारत वसुन्धरा गाती ही रहेगी। इत्यादि प्रकार से राजकुमार श्रेयांस का सत्कार करके राजा भरत अयोध्या नगरी की तरफ प्रस्थान कर गये।

अक्षय तृतीया नाम क्यों पड़ा

जिस दिन भगवान का आहार हुआ था उस दिन वैशाख सुदी तृतीया थी। अतः उस दान के प्रभाव से ही वह अक्षय तृतीया इस नाम से आज तक इस भारत भूमि में प्रचलित है क्योंकि जहां पर भगवान का आहार होता है वहां पर उस दिन भोजनशाला में सभी वस्तु अक्षय हो जाती है अत: इसका यह नाम सार्थक हो गया है तथा वह दिन इतना पवित्र हो गया कि आज तक भी बिना मुहूर्त देखे शोधे भी बड़े से बड़े मांगलिक कार्य इस अक्षय तृतीया के दिन प्रारम्भ कर दिये जाते हैं। सभी सम्प्रदाय के लोग भी इस दिन को सर्वोत्तम मुहूर्त मानते हैं। इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है। यह है आहार दान का माहात्म्य जो कि सभी की श्रद्धा करने योग्य है। हे चिर सनातन, हे पुरुष प्रधान ,हे पुरातन , विश्व क्षितीज के गौरव ,अमल श्रद्धा भावना से ,कर रहे अभिवदंन , माता मरुदेवा की कुक्षि से मिला जगत को नव स्पंदन। अंबर की आभा न्यारी ,वसुधा की विभुता अपार , प्रथम प्रणेता,ऋषभ नाथ का मान रहा आभार । जिदंगी का राज देकर ,करा सृष्टी कल्याण , बाँध सुदंर नीतियो सब,मनुज जीवन को दिया वरदान। संयम पथ पर राही बनकर,धर्म मे लाये नव निखार नव सूत्र से इतिहास बना, साधना से फैला नव्य निखार। वर्षीतप में घूम रहे थे ,माता मरूदेवा के लाल , जनता हरपल लाकर देती ,नीतनये उपहारो के थाल, हाथी घोडे़ लाते रहे सब,जो प्रभु को न थे स्वीकार, राजमार्ग पर चलते रहे,कर अनशन स्वीकार ।

स्वप्न श्रेयांश का हुआ साकार, ईक्षु कलश बहराने का , अहोदानम् अहोदानम् की गुजिंत हुयी झंकार। वर्षीतप का हुआ समापन,और फिर से प्रारंभ , तेज साधना से तेजोमय ,धर्म में कीर्ती स्तंभ । पात्रदान की महीमा विश्रुत , सब शास्त्रो ने हे गायी , प्रभु के पारणे से जग में खुशियॉ छाई,आखातीज ये पर्व मनाये ।। जय आदिनाथ भगवान

अक्षय तृतीया एवं वर्षीतप का इतिहास

प्रथम युगादिदेव परमात्मा श्री ऋषभदेव प्रभु (आदिनाथ) का जन्म क्रोडा-क्रोड़ी वर्ष पूर्व अवसर्पिणी काल यानी तीसरे आरे के समय में हुआ था ! प्रभु की आयु ८४ लाख वर्ष पूर्व, देह की ऊंचाई ५०० धनुष थी, एवं वर्ण स्वर्णमयी था। संसार के समग्र प्राणियों एवं मानव को सभी प्रकार का ज्ञान, जीवन जीने की कला, सही-गलत कार्य के द्वारा कर्मो का बंधन एवं उससे मुक्ति के उपाय भी प्रभु ने ही मार्गदर्शित किये थे। स्वयं प्रभु के द्वारा पिछले जन्म में एक बैल का मुँह बांधने की सलाह दी थी क्योकिं वह बैल खेतों की फसल को खा रहा था, खेत के मालिक द्वारा बैल को निर्दयता से मारता देख, प्रभु ने करुणावश यह सलाह दे दी कि इससे बैल को मार भी न पड़ेगी, और किसान को फसल का नुकसान भी नही होगा ! बैल ३६० पलोपल तक तडपता रहा, उसे वेदना हुई, प्रभु के करुणामय भाव होते हुए...भी अंतरायकर्म का बंध हुआ, इसी कर्म के निवारणार्थ प्रभुजी को ४०० दिन तक भिक्षा में आहार नही मिला..उपवास से रहना पड़ा। यही से तप के द्वारा कर्म-बंधन की मुक्ति का विधान शुरू हुआ । युगादिदेव दादा श्री आदिनाथ भगवान दीक्षा पशचात निर्जल व् निराहार विचरण करते हुए ४०० दिनों के बाद वैशाख शुक्ला ३ के शुभ दिन इस पावन भूमि पर पधारे। भोली भाली जनता दर्शनाथ उमड़ पड़ी। कोई प्रभु को हाथी तो कोई सोना तो कोई क्या, अपनी इच्छा से भेट कर रहा हे। लेकिन प्रभु को तो पारने में काल्पिक आहार चाहिए था। जिसे हर कोई समझ नहीं पा रहा था । राज कुमार श्री श्रेयांसकुमार कुमार को अपने प्रपितामह के दर्शन पाते ही जाती - समरण ज्ञान हुवा जिस से आहार देने की विधि को जानकर इक्षु रस को ग्रहण करने के लिए भक्ति भाव पूर्वक प्रभु से आग्रह करने लगा। प्रभु ने काल्पिक आहार समजकर श्री श्रेयांस कुमार के हाथो पारना किया। देवदुंदुभिया बजने लगी । जनता में हर्ष का पार ना रहा । उसी दिन से यहाँ से वर्शितप के पारने की प्रथा चालू हुई । कहा जाता हे की भगवान के इक्षु रस से पारना होने के कारण उस दिन को पुरे शासन में अक्षयत्रतिया के नाम से जाना लगा। जो आज तक प्रचलित हे।


साभार: इन्टरनेट

जाप्य मंत्र सूची

35 अक्षरों का मंत्र :-
णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं।
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।।

16 अक्षरों का मंत्र :-
अरहंत सिद्ध आइरिया उवज्झाया साहू

6 अक्षरों का मंत्र :-
(1) अरहन्त सिद्ध (2) अरहन्त सि सा
(3) ॐ नमः सिद्धेभ्य (4) नमोऽर्हत्सिद्धेभ्यः

5 अक्षरों का मंत्र :-
अ सि आ उ सा

4 अक्षरों का मंत्र :-
(1) अरहन्त (2) अ सि साहू

2 अक्षरों का मंत्र :-
(1) सिद्ध (2) ॐ ह्रीं

1 अक्षरों का मंत्र :-
ॐ (ओम्) यह ध्वनि पांचो परमेष्ठी नामों के पहले अक्षर मिलाने पर बनती है। यथा अरहन्त का पहिला अक्षर 'अ', अशरीरी (सिद्ध) का 'अ', आचार्य का 'आ', उपाध्याय का 'उ', तथा मुनि (साधु) का 'म्', इस प्रकार अ+अ+आ+उ+म् = ॐ (यह 'ओ3म्' इस प्रकार भी लिखा पाया जाता है जो कि अशुद्ध है)

रत्नत्रय जाप्य मंत्र :-
ॐ ह्रीं श्रीसम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रेभ्योनमः

श्रावक संस्कार शिविर: उदयपुर (राज.)

मान्यवर,

संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य मुनिश्री 108 प्रमाणसागर जी महाराज एवं मुनिश्री 108विराटसागर जी महाराज ससंघ के पावन सानिध्य में पर्यूषण महापर्व के पावन अवसर पर श्रावक संस्कार शिविर का भव्य आयोजन होने जा रहा है.आपसे विनम्र आग्रह है कि मुनि श्री के सानिध्य में इस शिविर के मणिकांचन योग का लाभ उठा कर अपने आत्म-कल्याण का मार्ग प्रशस्त करें।
पंजीकरण शुल्क:-1100/-
पंजीकरण की अंतिम दिनांक:-05 अगस्त, 2017
शिविर स्थल:- श्री नेमीनाथ दिगम्बर जैन मन्दिर, नेमीनाथ जैन काॅलोनी, नोखा रोड, हिरण मगरी,सेक्टर-3,उदयपुर (राज.)
श्रावक संस्कार शिविर 26 अगस्त 2017 से 05 सितम्बर, 2017
संपर्क सूत्र
98291 53802,
94141 60174,
94609 01075,
94143 85504


शिविर के दैनिक कार्यक्रम
प्रात:

5.00 बजे ---- ध्यान एवं योग
5.45 बजे ---- सामूहिक अभिषेक एवं शांतिधारा
6.30 बजे---- सामूहिक पूजन
8.30 बजे---- मुनिश्री के प्रवचन (दशलक्षण धर्म)
09.30 बजे----दशलक्षण पूजन विधान
10.00 बजे---- मुनिश्री की आहार चर्या
11.00 बजे ----भोजन

मध्यान्ह
02.30 बजे---- "तत्वार्थ-सूत्र" वाचन
03.00 बजे---- मुनिश्री के प्रवचन (तत्वार्थ सूत्र)
04.00 बजे---- स्वल्पाहार
05.00 बजे---- प्रतिक्रमण एवं सामायिक

सायं
06.00 बजे----आचार्य भक्ति/शंका समाधान
07.00बजे ---- महाआरती/सांस्कृतिक कार्यक्रम

रात्रि 
8.00 बजे----विश्राम 

शिविर नियमावली

(1)- शिविर में 15 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के भाई/बहिन भाग ले सकेंगे। 
(2)- शिविर के सभी कार्यक्रम में शिविरार्थी निर्धारित वेशभूषा में उपस्थित रहेंगे। 
(3)- प्रत्येक शिविरार्थी का शिविर के 11 दिनों का सूर्यास्त पश्चात् चारों प्रकार के आहार का त्याग होगा। 
(4)- शिविरार्थी को 11 दिन तक चटाई पर शयन करना होगा एवं पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना होगा।
(5)- भोजन दिन में एक बार मौन सहित करना होगा एवं शक्ति न हो तो स्वल्पाहार ले सकेंगे। 
(6)- शिविरार्थी रात्रि 9 बजे से प्रातः 4 बजे तक मौन रख सकते हैं। 
(7)- शिविर में निर्देशक के निर्देशों की पूर्णतः पालना करनी होगी। 

विशेष: प्रत्येक शिविरार्थी के लिये शुद्व भोजन,धोती-दुपट्टा,साड़ी सफेद(एक नग) तथा पुस्तक आदि की व्यवस्था समिति की ओर से की गई है। 

शिविरार्थी एक सफेद धोती-दुप्पट्टा,कुर्ता पायजामा /सफेद साड़ी अपने घर से साथ में जरूर लावें।

जो श्रावक-श्रविकाएँ सिर्फ पूजन- विधान में बैठना चाहते हैं उनके लिए शिविर के नियम अनिवार्य नहीं है।

आयोजक: श्री दिगंबर जैन धर्म प्रभावना समिति(रजि.),उदयपुर (राजस्थान) 


निवेदक: समस्त दिगम्बर जैन समाज, उदयपुर

परम पूज्य आचार्य भगवन एवं उनके शिष्यों के आगामी कार्यक्रम, आहार एवं विहार कि जानकारी के लिए निरंतर पढ़ते रहिये 👉 आईसपोर्टजैनिज़्मडॉटब्लॉगस्पॉटडॉटकॉम

दुनिया की सबसे बडी क्वार्ट्ज क्रिस्टल (स्फटिक) की प्रतिमा जी


सागर। बुंदेलखंड के संभागीय मुख्यालय सागर में सिद्धायतन की सिद्ध भगवान की प्रतिमा गिनीज वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज कर ली गई है। गिनीज वर्ल्ड रिकार्ड द्वारा जारी प्रमाण पत्र में दुनिया की सबसे बडी क्वार्ट्ज क्रिस्टल (स्फटिक) की प्रतिमा की उंचाई 32.5 इंच एवं चौड़ाई 24 इंच है। प्रमाण-पत्र प्राप्त होने के बाद आज सिद्धायतन में ब्रह्मचारी डी. राकेश भैया की उपस्थिति में डाॅ. हरीसिंह गौर विद्यालय के भूगर्भ शास्त्र के प्रोफेसर्स द्वारा पत्रकारों से चर्चा के दौरान उपलब्धि को सांझा किया। प्रो. अरुण कुमार शांडिल्य ने बताया कि सिंगल क्रिस्टल से बनी दुनिया की एकमात्र प्रतिमा है। जो पाषाण से प्रतिमा बनने के बाद 130 किलो वजनी है। जिसके मूर्ति प्रदाता सागर के ही प्रमोद वारदाना है। लगभग 18 माह में प्रतिमा तैयार हुई। जिसके बाद सागर में पिछले वर्ष अप्रैल माह में पंचकल्याणक महापूजन का आयोजन किया गया था। राकेश भैया ने बताया कि सिद्ध भगवान के बारे में बताया कि सिद्ध भगवान निर्विकल्प होते हैं। निराकार जैसा कोई आकार नहीं। जैन आगम में अभिषेक बिंब का होता है। मूलनायक के रूप में सिद्ध भगवान का स्वतंत्र दुनिया का प्रथम मंदिर है। सिद्ध भगवान के सामने बैठकर ध्यान लगाने से कार्य की सिद्धि होती है। उन्होंने बताया कि अभी तक सिद्ध भगवान की इंदौर में 14 इंच की, चमत्कारजी में 5 इंच की, फिरोजाबाद में 10 इंच, गौराबाई दिगंबर जैन मंदिर सागर में 17 इंच की स्फटिक मूर्तियां विराजमान की गई हैं। जबकि गिनीज वर्ल्ड रिकार्ड में 12 बाई 12 इंच की दर्ज है।
11 क्विंटल की स्फटिक शिला 18 माह तराशी गई तब बनी सिद्ध भगवान की प्रतिमा, 51 इंच लंबे एवं ढाई मीटर व्यास वाले पत्थर को जयपुर में तराश गया, पिछले साल हुई थी प्रतिष्ठित, एक साथ 5 रंगों में दिखेगी।

स्ट्रांग रूम जैसी सुरक्षा, दर्शनों का समय फिक्स 
स्फटिक की प्रतिमा की सुरक्षा के मद्देनजर मंदिर में दर्शन के लिए सुबह 7 से 11 बजे और शाम 6 से 8.30 बजे तक का समय निर्धारित किया गया है। साथ ही बैंकों में स्ट्रांग रूम जैसी सुरक्षा व्यवस्था मंदिर में है। भूगर्भ शास्त्री प्रो. एच थामस ने बताया कि स्फटिक नाम का पत्थर करोड़ों वर्ष में तैयार होता है। वहीं विभागाध्यक्ष प्रो. आर के रावत ने स्फटिक की विशेषताएं बताते हुए कहा कि यह कांच के समान पारदर्शी होता है। 
पांच सदस्यीय समिति  ने भेजी थी रिपोर्ट 
प्रो. एल पी चौरसिया ने बताया कि गिनीज बुक रिकार्ड में दर्ज होने के पहले पांच सदस्यीय समिति गठित की गई थी। जिसके द्वारा क्रिस्टल का सूक्ष्मता से परीक्षण के बाद रिपोर्ट भेजी गई थी। ब्रह्मचारी राकेश भैया ने बताया कि आंध्रप्रदेश के गुंटूर जिले में स्थित नेल्लूर की खदान से 51 इंच लंबा 2.5 मीटर व्यास वाला लगभग 1100 किलोग्राम वजन का सफेद स्फटिक पाषाण प्राप्त हुआ था। जहां से लंबी दूरी तय कर लगभग 6 माह में यह पाषाण शिला जयपुर पहुंची थी। जयपुर की अधिकृत जेम टेस्टिंग लेब भारत जेम्स टेस्टिंग लेब के द्वारा परीक्षण किया गया था। इसके साथ ही विवि के भू-गर्भ शास्त्रियों ने व्यवहारिक परीक्षण के बाद पाषाण से बिंब निर्माण का निर्णय लिया गया था।

दान अमीरों का लक्षण है- मुनि सुधासागर जी

किशनगढ़। 31 जुलाई, 2017 सोमवार, दिगम्‍बर जैनाचार्य 108 श्री विद्यासागर महाराज के सुयोग्‍य शिष्‍य मुनि सुधासागर महाराज ने किशनगढ़-मदनगंज में चल रहे चातुर्मास के दौरान आज धर्मोपदेश देते हुए कहा कि सभी पापों का विनाश धर्म से होता है। पाप में सफल होने के लिए देव, शास्त्र, गुरू व माता-पिता का सहारा नहीं लेना चाहिए। गुरू व बड़े परिजनों की पहचान व अंहकार का उपयोग जीवन में करने पर विनाश निश्चित होगा। भगवान गलत कार्य की सफलता के लिए नहीं, सही कार्य की सफलता के लिए है। भगवान की भक्ति, शक्ति का उपयोग घर बनाने के लिए नहीं, मंदिर बनाने के लिए करना चाहिए। धर्म व सही कार्य के लिए देव, शास्त्र गुरू की सहायता लेनी चाहिए। मुनिश्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि माचिस दीप जलाने के लिए बनी परन्तु उसका उपयोग घर जलाने के काम में लिया जा रहा है जो पतन की ओर इशारा कर रहा है। सम्यक दृष्टि व ज्ञानी मंदिर में धर्म की सफलता के लिए जाता है। असमर्थ व्यक्ति दूसरों की सहायता लेता है। मुनि श्री ने उदाहरण देेते हुए कहा कि व्यक्ति कभी अकेला भोजन नहीं करता है यह भारतीय संस्कृति के साथ हमारा धर्म भी है। दान अमीरों का लक्षण है। मुनिश्री ने कहा कि कथा सुनाना लक्ष्य नहीं है, तुम्हें सुधारना मेरा लक्ष्य है। मंदिर निर्माण में दान चलकर आए वह मंदिर अतिशयकारी होता है।_

ये रहे श्रावक श्रेष्ठी
श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पंचायत के प्रचार-प्रसार मंत्री विकास छाबड़ा व धर्म प्रभावना समिति के प्रचार मंत्री संजय जैन के अनुसार प्रात: श्रीजी का अभिषेक एवं शांतिधारा, पूजन, धर्मसभा में चित्र अनावरण, दीप प्रज्जवलन, शास्त्र भेंट, मुनिश्री के पाद प्रक्षालन का सौभाग्य प्रवीण कुमार, नवीन, मनीष, अरूण, निशांत, बीना, पलक, जानवी जैन सूरत के साथ शैलेन्द्र कुमार, विजयकुमार व नानूलाल, श्रीपाल, दीपक जैन उदयपुर को मिला।

प्रस्तावित मंदिर के चित्र का अनावरण
मुनिश्री ने सिटी रोड स्थित श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर के निर्माण कार्य योजना की घोषण करते हुए कहा कि मंदिर में पांच वेदियों का निर्माण किया जाएगा। मंदिर का निर्माण पाषाण से होगा। कार्यक्रम में प्रस्तावित मंदिर के चित्र का अनावरण दिनेश गंगवाल व प्रवीण जैन द्वारा किया गया। मंदिर निर्माण हेतु मूलचंद, अशोककुमार, अनिलकुमार, अतुलकुमार लुहाडिया परिवार, ताराचंद, प्रकाशचंद, प्रवीण, मुकेश, संजय, राजीव, राकेश गंगवाल परिवार, निहालचंद, राकेशमोहन, चन्द्रमोहन, गणेशचंद, लीलाकांत, प्रशांत, मंयक पहाडि़या परिवार, दिलीपकुमार, प्रेमकुमार, निरजंन बैद परिवार ने सहयोग देने की घोषणा की।

साभार:  मोनू जैन कोटा

हाइकू – मुनिश्री योगसागर महाराज जी

हाइकू जापानी छंद की कविता है इसमें पहली पंक्ति में 5 अक्षर, दूसरी पंक्ति में 7 अक्षर, तीसरी पंक्ति में 5 अक्षर है। यह संक्षेप में सार गर्भित बहु अर्थ को प्रकट करने वाली है। मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने 400 से ज्यादा हाइको लिखे हैं। आपका जन्म: १३ सितम्बर १९५६ दिन: गुरूवार, को ग्राम सदलगा कर्नाटक में हुआ था। ब्रह्मचर्य व्रत: २ मई १९७५, क्षुल्लक दीक्षा: १८ दिसंबर १९७५, ऐलक दीक्षा: १८ अप्रैल १९७७, मुनि दीक्षा: १५ अप्रैल १९८० (सागर मध्यप्रदेश) आप आचार्य भगवन जी के गृहस्थ जीवन के छोटे भाई हैं। 

1 – मृत्यु अमर, यहाँ कौन दिखेगा, अमर यहाँ।
2 – तू ना समझा, नश्वर के शरण, में अशरण।
3 – विकृत वस्तु, के परिणमन का, नाम संसार।
4 – तू है चिद्रूप, पर क्यों रूप बना, तेरा विद्रूप।
5 – रूप कुरूप, से परे अरूप है, तेरा स्वरुप।
6 – भग्न घट सी, काया निशदिन ही, मॉल झराये।
7 – योगों की क्रिया, जिसकी प्रतिक्रिया, कर्मास्रव है।
8 – बाहर नहीं, भीतर निहारना, निरास्रव है।
9 – अनगार की, ध्यान की चिनगारी, कर्म जलाये।
10 – कहीं निहाल, तो कहीं है बेहाल, जग का हाल।
11 – कारागार को, जिनालय बनाना, अतिदुर्लभ।
12 – वही है धर्म, विष को सुधामय, परिणमाये।
13 – पुष्प महके, अलिदल दौड़ते, ना ही बुलाते।
14 – काँटों के बीच, गुलाब का जीवन, कैसी ग़ुलामी।
15 – अमल करो समल विमल हो ज्यों कमल सा।
16 – क्षणभंगुर, अंगुर पे झूमते, ज्यों लंगुर से।
17 – भीतर नहीं, बाहर निहारना, पापास्रव है।
18 – प्रदर्शन तो, मृगमरीचिका है, केवल धोका।
19 – वैराग्य पुष्प, जीवन उद्यानों को, महकता है।
20 – जिन्हें जाप से, ताप सा प्रतीत हो, उन्हें क्या कहें।
21 – मंगलमय, देव गुरु शास्त्र को, मम प्रणाम।
22 – जिसके तुम, हवाला दे उनके, क्या हवाला हो।
23 – शांत चित्त ही, सा शास्त्रों का ज्ञाता, चेतन कृति।
24 – कांच सा प्याला, तेरी सुन्दर काया, कब क्या होगा।
25 – जिसे जिनसे, शल्य हो उनसे क्या, प्रयोजन है।
26 – ये सुख दुःख, तेरे परिणामों का, परिपाक है।
27 – पुरुषार्थ की, चमक झलकती है, भाग्योदय में।
28 – चिंता न करो, सफलता मिलती, चिंतन से ही।
29 – असुंदर में, सुन्दर का निवास, मोह की नशा।
30 – तेरा स्वरुप, सुख दुःख से परे, ज्ञाता दृष्टा है।
31 – पूजनीय वे, कर्ता भोक्ता औ स्वामी, पन से परे।
32 – वक्त पर जो, भक्त बनता वह, विभक्त होता।
33 – भेद विज्ञान, अंतर जगत का, दिवाकर है।
34 – पुण्योदय में, गाफिल, पापोदय, होश हवास।
35 – मल पिटारा, में बहुमूल्य हीरा, कब से गिरा।
36 – जात पात से, परे यथा जात जो, पारिजात सा।
37 – त्रैलोक्य में है, जीवों का प्रिय यार, शुद्ध बयार।
38 – कविता गायें, ह्रदय की गंथियाँ, हम गलाये।
39 – सुनो हायको, कर्मों की चमत्कार, तुम परखो।
40 – प्रभावित हो, उपादान निमित्त, प्रभाव डाले।
41 – एक दिन तो, मरना है कल्याण, मेरा कैसे हो।
42 – प्रत्येक श्वास, , यमपुर की ओर, बढे कदम।
43 – कर्तव्यता में, दक्षता ही शिष्य की, गुरु दक्षिणा।
44 – एक क्षण भी, संत संग अनंते, पाप नशाये।
45 – शीतलमयी, क्षमोत्तम नीर से, क्रोधाग्नि बुझे ,।
46 – मार्दव फल, विनय द्रुम पर, ‘ ही फलता है।
47 – औपचारिक, निर्गंध पुष्प, निज को छलता है।
48 – तन तिनका, समझेगा तभी तो, हीरा दिखेगा।
49 – असुंदर क्या, असुंदर से कभी, सुन्दर होगा।
50 – अहंकार के, अलंकार से प्राणी, अलंकृत है।

श्री पार्श्वनाथ मोक्ष कल्याणक दिवस

मोक्ष सप्तमी के दिन भगवान पार्श्वनाथ के मोक्ष कल्याणक दिवस मनाया जाएगा। दिगंबर एवं श्वेतांबर जैन मंदिरों में भगवान पार्श्वनाथ की विशेष पूजा-अर्चना, शांतिधारा कर निर्वाण लाडू चढ़ाने की प्रथा है। जैन धर्म के अनुसार जिसका मोक्ष हो जाता है उसका मनुष्य भव में जन्म लेना सार्थक हो जाता है। जब तक संसार है तब तक चिंता रहती है जहां मोक्ष का पूर्णरूपेण क्षय हो जाता है वहीं मोक्ष हो जाता है। हमें अपनी आत्मा को परमात्मा बनाने के लिए मोहरूपी शत्रु का नाश करना पड़ता है। अत: हमें सभी का सम्मान करना चाहिए। सब बड़ों के प्रति विनय भाव रखना चाहिए, क्योंकि विनय ही मोक्ष का द्वार है। इसीलिए सभी को चैतन्य प्रभु से रिश्ता जोड़ना चाहिए, क्योंकि पुण्यात्मा जहां भी चरण रखते हैं वहां से दुख, अंधकार, कषाय, क्लेश स्वमेव ही प्रकाश व सुखों में परिवर्तित हो जाते हैं। प्रभु का स्पर्श तो हमें स्वर्ण ही नहीं पारस बना देता है। हम भी पार्श्व प्रभु की तरह अपने भवों को कम करके निर्वाण प्राप्ति की ओर बढ़ें। अत: भगवान पार्श्वनाथ के मोक्ष कल्याण पर शिखरजी क्षेत्र की पूजा व निर्वाण कांड का पाठ करने पश्चात निर्वाण लाडू चढ़ाया जाता है। इस दिन खास तौर पर बालिकाएं निर्जला उपवास करती है।


आज २९ जुलाई, दिन शनिवार, श्रवण शुक्ल सप्तमी की शुभ तिथि को २३ वें तीर्थंकर देवादिदेव श्री १००८ पार्श्वनाथ भगवान का मोक्षकल्याणक पर्व है।

दीक्षा दिवस २८/०७/२०१९

आज पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज द्वारा दीक्षित 25 मुनिराजों व 8 आर्यिका माताओं का दीक्षा दिवस है,पूज्य आचार्य श्री ने बड़े बाबा की छाँव में सिद्धक्षेत्र कुंडलपुर जी में पूज्य ज्ञानसागर महाराज के परम आशीर्वाद से संघ को गुरुकुल बनाने के निमित्त 7 अगस्त  1989,श्रावण शुक्ला षष्ठी के दिन अपने वरद् हस्तों से द्वितीय बार 8 मेधावी बाल ब्रह्मचारिणी बहनों को आर्यिका दीक्षा प्रदान की जिनमें ज्येष्ठ आर्यिका प्रशांतमति माताजी आर्यिका पूर्णमति माताजी आर्यिका अनंतमति माताजी आदि प्रमुख है। पूज्य आचार्य श्री द्वारा दीक्षित सभी 8 आर्यिका माताएँ वर्तमान में विभिन्न स्थानों पर चातुर्मासरत है। पूज्य आचार्य देव ने 21 अगस्त 2004 श्रावण शुक्ला षष्ठी के दिन ही दयोदय तिलवारा घाट,जबलपुर में 25 उच्च शिक्षित बाल ब्रह्मचारी भाईयों को मुनि दीक्षा प्रदान की एवं शिवालय का मार्ग बताया आज उनमें से 19 मुनि भारत के विभिन्न प्रान्तों में चातुर्मासरत है।
14 वाँ दीक्षा दिवस
०१.मुनिश्री वीरसागर जी
०२.मुनिश्री क्षीरसागर जी
०३.मुनिश्री धीरसागर जी
०४.मुनिश्री उपशमसागर जी
०५.मुनिश्री प्रशमसागर जी
०६.मुनिश्री आगमसागर जी
०७.मुनिश्री महासागर जी
०८.मुनिश्री विराटसागर जी
०९.मुनिश्री विशालसागर जी
१०.मुनिश्री शैलसागर जी
११.मुनिश्री अचलसागर जी
१२.मुनिश्री पुनीतसागर जी
१३.मुनिश्री वैराग्यसागर जी
१४.मुनिश्री अविचलसागर जी
१५.मुनिश्री विसदसागर जी
१६.मुनिश्री धवलसागर जी
१७.मुनिश्री सौम्यसागर जी
१८.मुनिश्री अनुभवसागर जी
१९.मुनिश्री दुर्लभसागर जी
२०.मुनिश्री विनम्रसागर जी
२१.मुनिश्री अतुलसागर जी
२२.मुनिश्री भावसागर जी
२३.मुनिश्री आनंदसागर जी
२४.मुनिश्री अगम्यसागर जी
२५.मुनिश्री सहजसागर जी

29 वाँ दीक्षा दिवस
०१.आर्यिका प्रशांतमति जी
०२.आर्यिका पूर्णमति जी
०३.आर्यिका अनंतमति जी
०४.आर्यिका विमलमति जी
०५.आर्यिका शुभ्रमति जी
०६.आर्यिका कुशलमति जी
०७.आर्यिका निर्मलमति जी
०८.आर्यिका साधुमति जी

दीक्षा दिवस की पावन बेला पर पूज्य मुनिराजों व पूज्या आर्यिका माताओं के चरणों में नमोस्तु व वन्दामि ।

दशलक्षण (पर्युषण) पर्व परीक्षा न रखे जाने के लिए आवेदन पत्र

आप जैन है तो स्वाभाविक होगा आपका बच्चा किसी अच्छे स्कूल में पड़ रहा होगा । एक समय था जब गुरुकुल पद्दति से रहते हुए बालक पढ़ाई करता था जहां शिक्षा के साथ साथ संस्कार भी विशेष महत्वपूर्ण थे समय परिवर्तन हुआ गुरुकुल कम होकर विद्या के मंदिर जैसे संस्थान खुल गए जहां शिक्षा पँर अधिक लेकिन संस्कारो पर भी ध्यान दिया जाता था जैसे महावीर बाल विद्या मंदिर, सरस्वती शिशु मंदिर आदि आदि। समय परिवर्तन के साथ साथ शिक्षा पद्दति में आये बदलाव ने तो जैसे संस्कारो की नींव ही हिला कर रख दी है।
           वर्तमान में चल रही शिक्षा पद्दति में हमे बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिये दी जाने वाली शिक्षा पर तो ध्यान दिया जाता है मगर अति व्यस्तता की बात कह कर संस्कारो से समझौता कर लिया जाता है इसलिये आज के समय मे बच्चे धर्म को नजदीक से नही जान पा रहे है और धर्म से मिलने वाले संस्कारो से विमुख होते जा रहे है यह बात परिवारों के साथ साथ समाज के लिये भी चिंतनीय है। 
           पूज्य मुनि श्री अभय सागर जी महाराज ने अत्यंत करुणा भाव से समाज के गिरते हुए संस्कारिक स्तर को ऊपर उठाने के लिये पर्युषण पर्व को सहायक बताया है । प्रभु आराधना ओर गुरु भक्ति वचनामृत का लाभ लेकर हम पर्युषण पर्व के दिनों में संस्कारों का सृजन कर सकते है चूंकि उन्ही दिनों में कुछ स्कूलों में बच्चों की परीक्षाएं भी पड़ रही है सो बच्चों को संस्कारो को देने वाली माता भी बच्चों के साथ साथ परीक्षा की चिंता से ग्रषित होकर धर्म से मिलने वाले संस्कारो को ग्रहण नही कर पाती। 
              इसलिये मुनि श्री की मौजूदगी में जैन समुदाय की एक समिति ने ललितपुर नगर की सभी शिक्षण संस्थानों में जाकर संपर्क किया और उनसे निवेदन किया कि पर्युषण पर्व के दौरान अपने अपने संस्थानों में परीक्षा ना कराये जिसे सभी संस्थानों ने एक राय होकर सहमति दी और आस्वाशन भी दिया कि इन दिनों में हम अपने स्कूलों में परीक्षाएं नही करवाएंगे ताकि  प्रथम संस्कार प्रदात्री माता अपने धर्म को बखूबी करते हुए पात्र को मिलने वाले संस्कारो से ओत प्रोत कर सके। 
               हमे आशा है ललितपुर समाज की ही तरह आप भी अपने गाँव, नगर, कस्बा, शहर आदि में चल रहे स्कूलों में संपर्क कर पर्युषण के दिनों में होने वाली परीक्षाओं को आगे पीछे करा कर सम्पन्न करावे ताकि बच्चों की माता बगैर किसी चिंता के धर्माराधना कर सके। 
               आप की सुबिधा के लिये हम आपको पत्र का प्रारूप साथ मे दे रहे है जिसे पड़ कर आप फोटो प्रिंट करा कर स्कूलों में देकर अपने बच्चों को धर्म द्वारा मिलने वाले संस्कारो में सहायक बने। 

         मुनि श्री अभय सागर जी महाराज ससंघ के श्री चरणों मे सादर नमन। 

चौबीस तीर्थंकरों के बिना कुछ ना मिले

शासन मिले ना ऋषभनाथ के बिना ।
विनय मिले ना अजितनाथ के बिना ।
संभव हो ना संभवनाथ के बिना ।
वन्दन मिले ना अभिनन्दन के बिना ।
समृद्धि मिले ना सुमतिनाथ के बिना ।
पदवी मिले ना पद्मनाथ के बिना ।
दया मिले ना सुपार्श्वनाथ के बिना ।
उजाला मिले ना चन्द्रप्रभ के बिना ।
सुविधि मिले ना सुविधिनाथ के बिना ।
ठंडक मिले ना शीतलनाथ के बिना ।
यश मिले ना श्रेयांसनाथ के बिना ।
पूजनीय बने ना वासुपूज्य के बिना ।
निर्मल बने ना विमलनाथ के बिना ।
शक्ति मिले ना अनंतनाथ के बिना ।
धर्म होवे ना धर्मनाथ के बिना ।
शांति मिले ना शान्तिनाथ के बिना ।
करुणा मिले ना कुंथुनाथ के बिना ।
आश्रय मिले ना अरनाथ के बिना ।
ममता मिले ना मल्लिनाथ के बिना ।
मुक्ति मिले ना मुनिसुव्रत के बिना ।
नरक मिटे ना नमिनाथ के बिना।
आनंद मिले ना अरिष्टनेमि के बिना ।
कमठ हारे ना पारसनाथ के बिना ।
चन्दना तिरे ना महावीर के बिना ।

साभार: बहन रेखा जैन
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देवलोक से धरती पर आया मंदिर

इंदौर। मंदिर में स्थापित मूिर्तयों के चमत्कारों की गाथाएं तो आपने कई बार सुनी होगी लेकिन क्या आप मध्यप्रदेश के इस प्राचीन मंदिर की दिव्यता के बारे में जानते हैं? 1000 से ज्यादा वर्ष पुराने इस मंदिर की विशेषता है कि इस मंदिर को कभी किसी ने बनवाया नहीं, बल्कि ये देवलोक से उड़कर यहां पहुंचा है। वैज्ञानिक भी आज तक इस बात का राज नहीं तलाश सके हैं कि बिना नींव के भारी दीवारों वाला यह मंदिर यहां कैसे स्थापित हुआ। 

मध्यप्रदेश के इंदौर शहर की देपालपुर तहसील के बनेडिय़ा गांव में स्थित श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र बनेडिय़ा जी, जैनियों के प्रमुख तीर्थस्थल में शामिल है। इस मंदिर से जुड़ी प्राचीन कथा इसे बेहद चमत्कारी बनाती है। कहा जाता है कि ये मंदिर यहां प्रकट हुआ है इसे बनवाया नहीं गया। इस बात की सच्चाई जानने के लिए मंदिर की खुदाई करवाई गई तो लोग चौंक गए। खुदाई में कहीं भी पक्की नींव का पता नहीं चला। बिना किसी ठोस नींव के यहां स्थापित इस अष्टकोणी भव्य मंदिर में एक भी खंभा नहीं है और मंदिर की दीवारें 6 से 8 फीट चौड़ी है ।
चौथे काल की प्राचीन पाषाण प्रतिमाएं
मंदिर के निकट रहने वाले संजय जैन ने बताया कि हम छ: पीढिय़ों से इस मंदिर की सेवा में जुटे हैं। पूर्वजों से यही सुना है कि एक तपस्वी मुनिराज इस मंदिर को लेकर कहीं जा रहे थे, किसी कारणवश उन्होंने मंदिर को यहां रखा और तपस्या करने लगे, शाम हो गई तो मंदिर यहीं स्थापित हो गया। तब से ये मंदिर यहीं है। मंदिर में भगवान अजीतनाथ जी की प्रतिमा स्थापित है। इसके अलावा मणिभद्र बाबा का क्षेत्रकाल भी यहां है। यहां सफेद पाषाण की कई प्राचीन मूर्तियां भी हैं जिन पर 1248 संवत विक्रम का समय लिखित में अंकित है। ये मूर्तियां चौैथे काल की बताई जाती हैं।
पूर्णिमा की पूजा का है महत्व 
मंदिर को संभाल रहे गंगवाल परिवार के अनिल गंगवाल ने बताया कि ये भारत का एकमात्र अतिशय क्षेत्र है जिसकी नींव नहीं है। पुजारी ने बताया कि यहां हर पूर्णिमा को विशेष पूजा होती है और मेला लगता है जिसमें देश के कोने-कोने से श्रद्धालु शामिल होते हैं। मान्यता है पूर्णिमा को यहां पूजा में शामिल होने से हर मनोकामना पूरी होती है। इसी मान्यता के चलते कई श्रद्धालु लगातार 7,8 या 15 पूर्णिमा तक यहां आते हैं। 
4 फीट ऊंची भगवान अजीतनाथजी की प्रतिमा 
इस भव्य प्राचीन मंदिर के पास एक बड़ा तालाब है। मुख्य मंदिर गोलाकार है जिसमें भगवान अजीतनाथ जी की लगभग 4 फीट ऊंची प्रतिमा स्थित है। इस मूर्ति के अलावा भी मंदिर में कई प्राचीन मूर्तियां मौजूद है। जिनमें भगवान आदिनाथ, चंदप्रभु ,पाश्र्वनाथ और शांतिनाथ जी की मूर्तियां शामिल है। मूल प्राचीन मंदिर को श्रद्धालुओं ने भव्य मंदिर का रूप दे दिया है। मंदिर तक पहुंचने के लिए इंदौर से बस या कार या बाइक किसी को भी चुना जा सकता है। इंदौर से 45 किमी दूर देपालपुर है और देपालपुर से 4 किमी की दूरी पर स्थित है ये दिव्य चमत्कारिक मंदिर।

साभार: पीयूष जैन, इंदौर
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णमोकार मंत्र का क्या प्रभाव है ?

प्रश्न : णमोकार मंत्र के पर्यायवाची नाम बताईये ?
उत्तर - अनादिनिधन मंत्र - यह मंत्र शाश्वत है, न इसका आदि है और न ही अंत है। 

अपराजित मंत्र - यह मंत्र किसी से पराजित नहीं हो सकता है ।
महामंत्र - सभी मंत्रों में महान् अर्थात् श्रेष्ठ है । 
मूलमंत्र - सभी मंत्रों का मूल मंत्र अर्थात् जड़ है, जड़ के बिना वृक्ष नहीं रहता है, इसी प्रकार इस मंत्र के अभाव में कोई भी मंत्र टिक नहीं सकता है । 
मृत्युंजयी मंत्र - इस मंत्र से मृत्यु को जीत सकते हैं अर्थात् इस मंत्र के ध्यान से मोक्ष को भी प्राप्त कर सकते हैं । 
सर्वसिद्धिदायक मंत्र - इस मंत्र के जपने से सभी ऋद्धि सिद्धि प्राप्त हो जाती है । 
तरणतारण मंत्र - इस मंत्र से स्वयं भी तर जाते हैं और दूसरे भी तर जाते हैं । 
आदि मंत्र - सर्व मंत्रों का आदि अर्थात् प्रारम्भ का मंत्र है । 
पंच नमस्कार मंत्र - इसमें पाँचों परमेष्ठियों को नमस्कार किया जाता है । 
मंगल मंत्र - यह मंत्र सभी मंगलों में प्रथम मंगल है । 
केवलज्ञान मंत्र - इस मंत्र के माध्यम से केवलज्ञान भी प्राप्त कर सकते हैं । 

प्रश्न : णमोकार मंत्र कहाँ कहाँ पढ़ना चाहिए ? 

उत्तर - दुःख में, सुख में, डर के स्थान, मार्ग में, भयानक स्थान में, युद्ध के मैदान में एवं कदम कदम पर णमोकार मंत्र का जाप करना चाहिए । यथा - दुःखे - सुखे भयस्थाने, पथि दुर्गे - रणेSपि वा । 
श्री पंचगुरु मंत्रस्य , पाठ : कार्य : पदे पदे ॥

प्रश्न : क्या अपवित्र स्थान में णमोकार मंत्र का जाप कर सकते हैं ?
उत्तर - यह मंत्र हमेशा सभी जगह स्मरण कर सकते हैं, पवित्र व अपवित्र स्थान में भी, किंतु जोर से उच्चारण पवित्र स्थानों में ही करना चाहिए । अपवित्र स्थानों में मात्र मन से ही पढ़ना चाहिए । 

प्रश्न : णमोकार मंत्र ९ या १०८ बार क्यों जपते हैं ?

उत्तर - ९ का अंक शाश्वत है उसमें कितनी भी संख्या का गुणा करें और गुणनफल को आपस में जोड़ने पर ९ ही रहता है । 
जैसे ९*३ =२७ , २ + ७ = ९ कर्मों का आस्रव १०८ द्वारों से होता है , उसको रोकने हेतु १०८ बार णमोकार मंत्र जपते हैं । प्रायश्चित में २७ या १०८ , श्वासोच्छवास के विकल्प में ९ या २७ बार णमोकार मंत्र पढ़ सकते हैं । 

प्रश्न : आचार्यों ने उच्चारण के आधार पर मंत्र जाप कितने प्रकार से कहा है ?
उत्तर - वैखरी - जोर जोर से बोलकर मंत्र का जाप करना चाहिए जिसे दूसरे लोग भी सुन सकें । 
मध्यमा - इसमें होंठ नहीं हिलते किंतु अंदर जीभ हिलती रहती है । 
पश्यन्ति - इसमें न होंठ हिलते हैं और न जीभ हिलती है इसमें मात्र मन में ही चिंतन करते हैं । 
सूक्ष्म - मन में जो णमोकार मंत्र का चिंतन था वह भी छोड़ देना सूक्ष्म जाप है । जहाँ उपास्य उपासक का भेद समाप्त हो जाता है । अर्थात् जहाँ मंत्र का अवलंबन छूट जाये वो ही सूक्ष्म जाप है । 

प्रश्न : इस मंत्र का क्या प्रभाव है ?
उत्तर - यह पंच नमस्कार मंत्र सभी पापों का नाश करने वाला है । तथा सभी मंगलों में प्रथम मंगल है । यथा - 
एसो पंच णमोयारो सव्वपावप्पणासणो । 
मंगलाणं च सव्वेसिं पढमं होई मंगलं । ।
मंगल शब्द का अर्थ दो प्रकार से किया जाता है । 
मंङ्ग = सुख । ल = ददाति , जो सुख को देता है , उसे मंगल कहते हैं । 
मंगल - मम् = पापं । गल = गालयतीति = जो पापों को गलाता है , नाश करता है उसे मंगल कहते हैं । 

मंत्र के प्रभाव से - 
पद्मरुचि सेठ ने बैल को मंत्र सुनाया तो वह सुग्रीव हुआ । 
रामचंद्र जी ने जटायु पक्षी को सुनाया तो वह स्वर्ग में देव हुआ । 
जीवंधर कुमार ने कुत्ते को सुनाया तो वह यक्षेन्द्र हुआ । 
अंजन चोर ने मंत्र पर श्रद्धा रखकर आकाश गामिनी विद्या को प्राप्त किया ।

 साभार: श्रीमति सुमन जैन सुरखी