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विद्योदय
महापुरुष प्रकाश में नहीं आते, आना भी नहीं चाहते प्रकाश प्रदान में ही उन्हें रस आता हैं उनका कथन किसी श्लोक से कम नहीं उनका लेखन किसी दर्शन से कम नहीं और उनका जीवन किसी शास्त्र से कम नहीं उनका हाथ ही पवित्र पात्र हैं पृथ्वी ही जिनकी सैय्या हैं जिन्हें अप्राप्त की चाह नहीं और प्राप्त का मोह नहीं जो दिगम्बर हैं रोम-रोम में पुरुषार्थ वो परोपकार का सागर लिये अनंत यात्री महापुरुष आचार्य श्री विद्यासागर जी
आनंदमयो ज्ञानमयो विज्ञानमयो आदित्या
आचार्य श्री की उपस्थिति ही विद्या का उदय हैं विद्योदय हैं !
स्त्रोत : विद्योदय
संयम स्वर्ण महोत्सव
आचार्य भगवन ऐसे संत है जिनका जीवन एक सम्पूर्ण दर्शन है जिनके आचरण में जीवों के लिए करुणा पलती है जिनके विचारों में प्राणी मात्र का कल्याण आकर लेता है जिनकी देशना में जगत अपने सदविकास का मार्ग प्रशस्त करता है आप निरीह निस्पृह वीतरागी है फिर भी आपके विचार भारतीयता के प्रति अगाध निष्ठा राष्ट्रभक्ति और कर्तव्यपरायणता से ओतप्रोत है आपका चिंतन प्राचीन भारतीय हितचिंतको दार्शनिको एवं संतो का अनुकरण करते हुए भी मौलिक है आचार्य महाराज तो ज्ञानवारिधी है और उनके विचारों को संकलित करना छोटी सी अंजुली में सागर को भरने का असंभव प्रयास करना है।

।। नमोस्तु भगवन नमोस्तु ।।
आईसपोर्टजैनिज़्म परिवार की ओर से आप सभी को संयम स्वर्ण महोत्सव की ढेरों शुभकामनाएं।
हाइकू – मुनिश्री योगसागर महाराज जी
हाइकू जापानी छंद की कविता है इसमें पहली पंक्ति में 5 अक्षर, दूसरी पंक्ति में 7 अक्षर, तीसरी पंक्ति में 5 अक्षर है। यह संक्षेप में सार गर्भित बहु अर्थ को प्रकट करने वाली है। मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने 400 से ज्यादा हाइको लिखे हैं। आपका जन्म: १३ सितम्बर १९५६ दिन: गुरूवार, को ग्राम सदलगा कर्नाटक में हुआ था। ब्रह्मचर्य व्रत: २ मई १९७५, क्षुल्लक दीक्षा: १८ दिसंबर १९७५, ऐलक दीक्षा: १८ अप्रैल १९७७, मुनि दीक्षा: १५ अप्रैल १९८० (सागर मध्यप्रदेश) आप आचार्य भगवन जी के गृहस्थ जीवन के छोटे भाई हैं।
1 – मृत्यु अमर, यहाँ कौन दिखेगा, अमर यहाँ।
2 – तू ना समझा, नश्वर के शरण, में अशरण।
3 – विकृत वस्तु, के परिणमन का, नाम संसार।
4 – तू है चिद्रूप, पर क्यों रूप बना, तेरा विद्रूप।
5 – रूप कुरूप, से परे अरूप है, तेरा स्वरुप।
6 – भग्न घट सी, काया निशदिन ही, मॉल झराये।
7 – योगों की क्रिया, जिसकी प्रतिक्रिया, कर्मास्रव है।
8 – बाहर नहीं, भीतर निहारना, निरास्रव है।
9 – अनगार की, ध्यान की चिनगारी, कर्म जलाये।
10 – कहीं निहाल, तो कहीं है बेहाल, जग का हाल।
11 – कारागार को, जिनालय बनाना, अतिदुर्लभ।
12 – वही है धर्म, विष को सुधामय, परिणमाये।
13 – पुष्प महके, अलिदल दौड़ते, ना ही बुलाते।
14 – काँटों के बीच, गुलाब का जीवन, कैसी ग़ुलामी।
15 – अमल करो समल विमल हो ज्यों कमल सा।
16 – क्षणभंगुर, अंगुर पे झूमते, ज्यों लंगुर से।
17 – भीतर नहीं, बाहर निहारना, पापास्रव है।
18 – प्रदर्शन तो, मृगमरीचिका है, केवल धोका।
19 – वैराग्य पुष्प, जीवन उद्यानों को, महकता है।
20 – जिन्हें जाप से, ताप सा प्रतीत हो, उन्हें क्या कहें।
21 – मंगलमय, देव गुरु शास्त्र को, मम प्रणाम।
22 – जिसके तुम, हवाला दे उनके, क्या हवाला हो।
23 – शांत चित्त ही, सा शास्त्रों का ज्ञाता, चेतन कृति।
24 – कांच सा प्याला, तेरी सुन्दर काया, कब क्या होगा।
25 – जिसे जिनसे, शल्य हो उनसे क्या, प्रयोजन है।
26 – ये सुख दुःख, तेरे परिणामों का, परिपाक है।
27 – पुरुषार्थ की, चमक झलकती है, भाग्योदय में।
28 – चिंता न करो, सफलता मिलती, चिंतन से ही।
29 – असुंदर में, सुन्दर का निवास, मोह की नशा।
30 – तेरा स्वरुप, सुख दुःख से परे, ज्ञाता दृष्टा है।
31 – पूजनीय वे, कर्ता भोक्ता औ स्वामी, पन से परे।
32 – वक्त पर जो, भक्त बनता वह, विभक्त होता।
33 – भेद विज्ञान, अंतर जगत का, दिवाकर है।
34 – पुण्योदय में, गाफिल, पापोदय, होश हवास।
35 – मल पिटारा, में बहुमूल्य हीरा, कब से गिरा।
36 – जात पात से, परे यथा जात जो, पारिजात सा।
37 – त्रैलोक्य में है, जीवों का प्रिय यार, शुद्ध बयार।
38 – कविता गायें, ह्रदय की गंथियाँ, हम गलाये।
39 – सुनो हायको, कर्मों की चमत्कार, तुम परखो।
40 – प्रभावित हो, उपादान निमित्त, प्रभाव डाले।
41 – एक दिन तो, मरना है कल्याण, मेरा कैसे हो।
42 – प्रत्येक श्वास, , यमपुर की ओर, बढे कदम।
43 – कर्तव्यता में, दक्षता ही शिष्य की, गुरु दक्षिणा।
44 – एक क्षण भी, संत संग अनंते, पाप नशाये।
45 – शीतलमयी, क्षमोत्तम नीर से, क्रोधाग्नि बुझे ,।
46 – मार्दव फल, विनय द्रुम पर, ‘ ही फलता है।
47 – औपचारिक, निर्गंध पुष्प, निज को छलता है।
48 – तन तिनका, समझेगा तभी तो, हीरा दिखेगा।
49 – असुंदर क्या, असुंदर से कभी, सुन्दर होगा।
50 – अहंकार के, अलंकार से प्राणी, अलंकृत है।
चाँदखेड़ीजी का जैन मन्दिर
औरंगजेब का नाम आते ही व्यक्ति के मानस पटल पर एक ऐसे शासक की तस्वीर उभर आती है जिसने भारत के कई देवालयों को क्रूरता से ध्वंस करवाया। लेकिन इसे आश्चर्य कहें या कुछ और कि राजस्थान में एक स्थान ऐसा भी है जहाँ मूर्ति भंजक औरंगजेब के समय में एक पूरे ही मन्दिर का निर्माण हुआ और वह स्थान है- दक्षिण-पूर्वी राजस्थान कोटा जंक्शन (कोटा) से ८ कि.मी. दक्षिण में स्थित झालावाड़ जिले के खानपुर कस्बे के निकट चाँदखेड़ी में। चाँदखेड़ी नामक यह स्थल व यहां का यह जैन मन्दिर मुख्यालय झालावाड़ से ३५ कि.मी.दूर पूर्व में बस मार्ग से सीधा जुड़ा हुआ है। जो रूपाली नदी के किनारे स्थित है।
इस मन्दिर के मूल गर्भगृह में एक विशाल तल-प्रकोष्ठ है जिसमें भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव) की लाल पाषाण की पद्मासनावस्था की प्रतिमा प्रतिष्ठित है। यह प्रतिमा इतनी अधिक मनोज्ञ है- मानो मुँह बोलती है। श्रवणबेलगोला के बाहुबली की प्रतिमा के उपरान्त भारत की दूसरी मनोज्ञ प्रतिमा है।
दीक्षा समारोह: आचार्य श्री
'एक दिन पारस पारखी, गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज ने चुपके से अपनी पिच्छी के पंख बिखेर दिये और सहज हो कर बोले- विद्याधर! इस पिच्छिका को पुनः बना सकते हो? न शब्द वहाँ था ही नहीं, सो हाँ कह दिया और विद्याधर ने शास्त्रों में वर्णित विद्याधरों की तरह शीघ्र पीछी बना डाली। गुरु जी ने पीछी देखी और देखते ही कह दिया- ब्रह्मचारी, आपका ज्ञान सही में पीछी लेने योग्य हो चुका है।
और आज ही के दिन महागुरु आचार्य श्री ज्ञान सागर जी महामुनिराज ने
आषाढ़ सुदी ५ वि.सं. २०२५, तदनुसार ३० जून १९६८ का दिन। स्थान सोनीजी की नसिया। शहर अमजेर ।
दीक्षा समारोह प्रारंभ होता है। ब्र. विद्याधर खड़े होकर गुरुवर की वंदना करते हैं, हाथ जोड़कर दीक्षा प्रदान करने की प्रार्थना करते हैं। गुरुवर का आदेश पाकर विद्याधर वैराग्यमयी, सारगर्भित वचनों से जनता को उद्बोधन देते हैं तदुपरान्त विद्याधर ने हवा में उड़ने वाले केशों का लुन्चा करना प्रारंभ कर दिया। अपनी ही मुष्टिका में सिर से इतने सारे बाल खींच ले जाते कि देखने वाले आह भर पड़ते हैं। फिर दूसरी मुष्टिका। तीसरी। फिर सिर के बाल निकालते हुए कुछ स्थानों से रक्त निकल आया है। विद्याधर के चेहरे पर आनंद खेल रहा है। हाथ आ गए दाढ़ी पर। दाढ़ी की खिंचाई और अधिक कष्टकारी होती है। वे दाढ़ी के बाल भी उसी नैर्मम्य से खींचते हैं। हाथ चलता जाता है, बाल निकलते जाते हैं, पूरा चेहरा लहूलुहान हो गया है। श्रावक सफेद वस्त्र ले उनकी तरफ दौड़ पड़ते हैं। वे अपने चेहरे को छूने नहीं देते। बाल खींचते जाते हैं। रक्त बहता जा रहा है। विद्याधर जहाँ के तहाँ / अविचलित खुश हैं। आनन्दमय हैं। केश लुन्च पूर्ण होते ही पंडितों-श्रावकों और अपार जनसमूह के समक्ष गुरु ज्ञानसागरजी संस्कारित कर उन्हें दीक्षा प्रदान करते हैं। विद्याधर वस्त्र छोड़ देते हैं दिगम्बरत्व धारण कर लेते हैं। तभी एक आश्चर्यकारी घटना घटी। राजस्थान की जून माह की गर्मी और खचाखच भरे पांडाल में २०-२५ हजार नर-नारी। समूचे प्रक्षेत्र पर तेज उमस हावी थी। लोग पसीने से नहा रहे थे। वातावरण ही जैसे भट्टी हो गया हो। जैसे ही विद्याधर ने वस्त्र छोड़े, पता नहीं कैसे कहाँ से बादल आ गए और पानी की भीनी-भीनी बौछार होने लगी, हवाएँ ठंडी हो पड़ी, वातास शांति एवं ठंडक अनुभव करने लगा। ऐसा लगा कि प्रकृति साक्षात् गोमटेश्वरी दिगम्बर मुद्रा का महामस्तकाभिषेक कर कर रही हो अथवा देवों सहित इन्द्र ने ही आकर प्रथम अभिषेक का लाभ लिया हो। कुछ समय बाद पानी रुक गया। सूर्य ने पुनः किरणें बिखेर दीं। सभी दंग रह गए, कहने लगे यह तो महान पुण्यशाली विद्यासागरजी की ही महिमा है। सभी अपने-अपने मनगढ़ंत भाव लगाकर विद्याधर के पुण्य का बखान कर रहे थे। वहीं छोटे बालक कह रहे थे विद्याधर ने जैसे ही धोती खोली वैसे ही इन्द्र का आसन काँप गया सो उसने खुशी जताने के लिए नाच-नाचकर यह वर्षा की है। ज्ञानसागरजी पिच्छी कमण्डल सौंपते हैं और मुनिपद को संबंधित निर्देश देते हैं। दीक्षा संपन्न।
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| संयम स्वर्ण महोत्सव डोंगरगढ़ २८/०६/२०१७ |
आईसपोर्टजैनिज़्म परिवार की ओर से गुरुचरणों में शत् शत् नमन।
!! नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु भगवन !!
त्याग, तपस्या और तरुणाई के 'सागर'
आचार्य श्री विद्यासागर जी महा-मुनिराज के श्री चरणों में आई.एस.जे परिवार की ओर से शत शत नमन। नमोस्तु भगवन नमोस्तु

- १९७१ से मीठा व फल त्याग।
- १९७६ से रस, फल, मेवा का त्याग।
- १९८३ से पूर्ण थूकना बंद।
- १९८५ से चटाई पर सोना त्याग।
- १९९० से नौ दिन का निर्जला व्रत।
- १९९२ से दिन से दिन में सोना आजीवन त्याग।
- दीक्षा लेने के बाद से रात्रि में मौन व्रत।
- दीक्षा लेने के बाद हर दो माह में केस-लोच।
धन्य हैं ऐसे महान संत धन्य हैं इनकी चर्या..........!!!
संतकवि दिगम्बर जैनाचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
भारत-भू पर सुधारस की वर्षा करने वाले अनेक महापुरुष और संत कवि जन्म ले चुके हैं। उनकी साधना और कथनी-करनी की एकता ने सारे विश्व को ज्ञान रूपी आलोक से आलोकित किया है। इन स्थितप्रज्ञ पुरुषों ने अपनी जीवनानुभव की वाणी से त्रस्त और विघटित समाज को एक नवीन संबल प्रदान किया है। जिसने राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक और संस्कृतिक क्षेत्रों में क्रांतिक परिवर्तन किये हैं। भगवान राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध, ईसा, हजरत मुहम्मदौर आध्यत्मिक साधना के शिखर पुरुष आचार्य कुन्दकुन्द, पूज्यपाद्, मुनि योगिन्दु, शंकराचार्य, संत कबीर, दादू, नानक, बनारसीदास, द्यानतराय तथा महात्मा गाँधी जैसे महामना साधकों की अपनी आत्म-साधना के बल पर स्वतंत्रता और समता के जीवन-मूल्य प्रस्तुत करके सम्पूर्ण मानवता को एक सूत्र में बाँधा है। उनके त्याग और संयम में, सिद्धांतों और वाणियों से आज भी सुख शांति की सुगन्ध सुवासित हो रही है। जीवन में आस्था और विश्वास, चरित्र और निर्मल ज्ञान तथा अहिंसा एवं निर्बैर की भावना को बल देने वाले इन महापुरुषों, साधकों, संत कवियों के क्रम में संतकवि दिगम्बर जैनाचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज वर्तमान में शिखर पुरुष हैं, जिनकी ओज और माधुर्यपूर्ण वाणी में ऋजुता, व्यक्तित्व में समता, जीने में संयम की त्रिवेणी है। जीवन-मूल्यों को प्रतिस्ठित करने वाले बाल ब्रह्मचारी श्री विद्यासागर जी स्वभाव से सरल और सब जीवों के प्रति मित्रवत व्यवहार के संपोषक हैं, इसी के कारण उनके व्यक्तित्व में विश्व-बन्धुत्व की, मानवता की सौंधी-सुगन्ध विद्यमान है।
आज की तस्वीरे
सांगानेर जी में अतिशय कारी भूगर्भ से निकली जिनबिम्ब प्रतिमाओं की आज की शांति धारा के गंधोदक को आज श्रीमान अशोक जी पाटनी (R.K. Marbles) ने प.पू आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज एवं संघ को दिया।
सांगानेरजी: आचार्य श्री एवं ससंघ के लिए विशेष विमान से आज का गंधोदक
सांगानेरजी। भूगर्भ से निकले यक्ष-रक्षित जिनविम्वों जिनालय का अभिषेक (गंधोदक) एवं आज की शांतिधारा आचार्य श्री एवं समस्त मुनि/ आर्यिका संघ एवं समस्त ब्रम्हचारी प्रतिभास्थली हथकरधा समस्त मानवजाति के नाम से हुई जिसका (गंधोदक) आचार्य श्री एवं ससंघ के लिए विशेष विमान से श्री अशोक जी पाटनी द्वारा चंदगिरि डोगरगढ़ जा रहा हैं , विमान सीधे डोंगरगढ़ में उतरेगा !
नोट: अगर आपके पास भी गुरुदेव से जुडी कोई भी जानकारियाँ हो तो हमसे जरुर साँझा करे। 📧 ईमेल: infoissupport@gmail.com
साभार : एल.एस.आर परिवार
कोटा में तैयार हुई आचार्य श्री की पेंटिंग
कोटा।आचार्य भगवंत श्री विद्यासागर जी महामुनिराज के 50 वें मुनिदीक्षा दिवस आषाढ़ शुक्ल पंचमी (28 जून 2017) के शुभावसर पर देश विदेशों में संयम स्वर्ण महोत्सव के रूप में मनाया जा रहा है इसी श्रंखला में कोटा शहर में आचार्य श्री का एक हस्तनिर्मित चित्र तैयार किया गया है जिसके निर्माण में चित्रकार को लगभग 25 दिन से भी अधिक समय लगा उक्त पेंटिंग डोंगरगढ़ के अलावा विभिन्न नगरों में विराजमान उपसंघो के समक्ष जाएगी। साथ ही देश के महानगरों में आयोजित आर्ट गैलरी में प्रदर्शित होगी।
पेंटिंग में जहाँ आचार्यश्री तप साधना में लीन दिख रहे है वही.उनके पीछे संयम कीर्ति स्तम्भ भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
पेंटिंग की विदाई के मौके पर चित्रकार की आंखों से छलके आँसु आचार्य श्री के चित्र को तैयार कर रहे सुरेंद्र वर्मा ने दिनरात लगन और श्रम से जब इसको तैयार किया तो लेने पहुंचे गुरुभक्तों को ये तस्वीर सौंपते समय चित्रकार की आंखे छलक गई।
मेरा अनुभव
पेंटिंग को तैयार होने के बाद मैं मनोज जैन आदिनाथ जब चित्रकार के पास पहुंचा और चित्रकार सुरेंद्र वर्मा ने मुझे चित्र सौंपा तो उनकी माता पिता एवं परिवारजनों ने चित्र के दर्शन कर अपने आप को सौभाग्यशाली माना और कहा कि इस चित्र को बनाते समय सदैव एक शुभ स्पंदन बना रहता था और जब मैं गुरुजी की तश्वीर बनाने में इतना आनंदित हूँ तो साक्षात दर्शन पाकर कितना आनंदित होऊंगा कह पाने के लिए भी शब्द कम पड़ते दिख रहें है।
सूचनाप्रदाता: मनोज जैन 'आदिनाथ' कोटा।
आज के ही दिन
आज से ३७ वर्ष पूर्व वैशाख कृष्ण अमावस्या दिनाँक १५ अप्रैल १९८० को "आज के ही दिन" परम पूज्य आचार्य गुरूवर श्री विद्यासागर जी महाराज के कर कमलों से आज के ही दिन म.प्र. प्रान्त के बुन्देलखंड की धरा- सागर नगर में मुनिश्री नियमसागरजी महाराज जी एवं मुनिश्री योगसागर जी महाराज जी की मुनि दीक्षा संपन्न हुयी थी।
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