श्री विशुद्ध वचन आत्म बोध से

आषाढ़ शुक्ल । 02.07.2017 रविवार आज नवमी है। 03.07.2017 सोमवार कल दसमी है। अष्टाह्निका पर्व 01से 09 जुलाई तक हे विशुद्वात्मन ! वर्द्वमान स्वामी के शासनकाल में हम सभी विराजते है। तीर्थंकर जिनेन्द्र की पीयूष देशना जिनेन्द्रवाणी जगतकल्याणी है। नमोस्तु शासन जयवंत हो। जयवंत हो वीतराग श्रमणसंस्कृति !
निमित्त बनों पर.....ये जीव अकेला ही कर्म करता है, अकेला ही कर्म फल भोगता है।क्या तू नहीँ जानता है ? सब कुछ जानकारी भी क्यों अज्ञानी बना है ? तू किसका सुधार कर सकता है ? क्या आदिनाथ भगवान मारीच के जीव को परिवर्तित कर सके ? ओह ! उपादान की योग्यता कितनी प्रबल होती है। यदि उपादान योग्य नहीँ है तो निमित्त बिचारा कुछ नहीँ कर पाता । लेकिन बिना निमित्त के कोरा उपादान भी कुछ नहीँ करता है। जब व्यक्ति को समझाया जाए फिर भी नहीँ स्वीकार करता है अपनी गलती को और सुधार नहीँ कर पा रहा है। तो हे आत्मन् ! इसमें आप उसके उपा-दान की ही हीनता समझ,व्यर्थ के तनाव में मत बैठ। अथवा यह सोच कि मेरे अशुभ कर्म का उदय है जो कि मेरे अंदर वह कला नहीँ आ पा रही है जिससे वह समझ सकता था। यह ज्ञानियों की सोच है, अज्ञानियों की नहीँ ज्ञान चक्षु से देखने की जरूरत है मात्र चक्षु से नहीँ। यदि बाहर-बाहर ही देखता रहा,तो कभी भी शांति का वेदन नहीँ कर सकता है। सब कुछ करो उपदेश भी दो, कोई बात नहीँ, पर इस दृष्टि से नहीँ कि हमारी बात सभी मानें। यदि ऐसी भावना रही तो तू स्वंय को आसक्त कर लेगा।निमित्त बनो पर।

ॐ नमः सिद्वेभ्यः विशुद्ध वचन आत्म बोध से पेज 21 से
विश्व वन्दनीय, वर्त्तमान के वर्धमान, धर्मप्रभाकर, आगम उपदेष्टा, प्रतिपल, प्रतिक्षण स्मरणीय, चर्या शिरोमणी, युग शिरोमणी आचार्य श्री १०८ विशुद्धसागर जी महामुनिराज सहित तीन कम नौ करोड़ मुनिराजो के में नमोस्तु, नमोस्तु, नमोस्तु ।

हे श्रावको स्वाध्याय करो "स्वाध्याय ही परम् तप है" !!!
जय जिनेन्द्र
नमोस्तु शासन सेवा समिति
मैत्री भाव जगत में मेरा, सब जीवों पर नित्य रहे ....।।
साभार: राजेश जैन झाँसी