संत शिरोमणि आचार्यश्री विद्यासागरजी के विचार-सूत्र

  • सुख दुःख कर्माश्रित है किन्तु समता आत्माश्रित, जो कि कषाय विजय की प्रतीक है।
  • समता के साथ सुख का गठबंधन है।
  • समता के सांचे में ढला हुआ ज्ञान ही विपत्ति के समय काम आता है।
  • समता भाव ध्यान नही है, वह तो राग द्वेष से रहित एक परम पुरुषार्थ है।
  • बाह्य पदार्थों को ओझल कर अपने आप में आने का नाम ही अध्यात्म है।
  • अध्यात्म का अर्थ झुंड नही अकेला है,द्वैत नही अद्वैत है,वह तो एकाकी यात्रा है।
  • जहाँ पर अध्यात्म जीवित है, वहीँपर आत्मा जीवित है।
  • अध्यात्म के बिना जीवन में कोई रस नही रह जाता। चौबीसो घंटे बहिर्मुखी दृष्टि के साथ जीवन चला जा रहा है।
  • उसे छोड़कर अध्यात्म के साथ अंतर्मुखी साधना करनी चाहिये।
  • सुख-शांति बाहर नही अंदर है। अंदर आनंद का सरोवर लहरा रहा है उसमे कूद जाओ तो सारा जीवन शांत हो जाये।
  • एकांत में शांत चित्त से एकत्व का चिंतन जब तक नही चलता तब तक संसारी प्राणी की दीनता समाप्त नही हो सकती क्योकि एकत्व अनुप्रेक्षा में अपना सारा आत्म साम्राज्य सामने आता है फिर दीनता की कोई बात ही शेष नही रह जाती है।
  • आपके भोग का केंद्र भौतिक सामग्री है, किन्तु संतो की भोग सामग्री चैतन्य शक्ति है, जिसमे आत्मा के साथ सतत भोग चलता रहता है।
  • जहाँ पर तेरा-मेरा, यह-वह, सब विराम पा जाता है वस्तुतः वही अध्यात्म है।
साभार: मनीष जैन, विदिशा