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Showing posts from May, 2017

बड़े बाबा की खोज-कथा

बड़े बाबा की प्रतिमा की खोज की कथा काफी रोचक है। सत्रहवीं शती के अंतिम वर्षों की बात है। दिगम्बर जैन परम्परा के भट्टारक श्री सुरेंद्र कीर्ति कई दिनों से अपने शिष्यों सहित विहार कर रहे थे। वे निराहारी थे, भोजन के लिए नहीं, देव दर्शन के लिए, कि कहीं कोई मंदिर मिल जाए, जहां तीर्थंकर प्रतिमा प्रतिष्ठित हो, तो मन की क्षुधा मिटे और इस शरीर को चलाने के लिए आवश्यक ईंधन ग्रहण करें। वो तृषित भी थे किंतु उनके नेत्रों में प्यास थी, किसी जैन प्रतिमा की मनोहारी छवि नयनों में समा लेने की। देव दर्शन के बगैर आहार ग्रहण न करने का नियम जो लिया था उन्होंने। घूमते-घूमते एक दिन दमोह के पास स्थित हिंडोरिया ग्राम में आकर अपने साथियों के साथ ठहरे। हिंडोरिया ग्रामवासी अपने को धन्य अनुभव कर रहे थे किंतु सबके हृदय में एक कसक थी। कई दिनों से देवदर्शन न होने के कारण उन्होंने आहार ग्रहण नहीं किया था, यह समाचार गांव के घर-घर फैल चुका था और आसपास दूर तक कहीं कोई जिनालय न था। कैसे संभव होगा भट्टारकजी को आहार देना। भाव-विह्वल श्रावक चिंतित थे। उन्होंने अपना ज्ञानोपदेश दिया। जैन श्रावकों ने उनके आहार के लिए चौके लगा दि...

श्रुत पंचमी

आज श्रुतपंचमी महापर्व है आज 30 मई 2017, दिन मंगलवार को श्रुत पंचमी महापर्व है। ज्येष्ट शुक्ल पंचमी की शुभ तिथी को तीर्थंकर भगवान की वाणी लिपिबद्ध हुई थी। अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी से तो समस्त जीवों को कल्याण हेतु ज्ञान प्राप्त हुआ लेकिन बाद में काल के प्रभाव के कारण, मनुष्य की स्मरण शक्ति कम होने लगी अतः हमारे आचार्यों ने विचार किया कि भगवान की साक्षात दिव्यध्वनि के अभाव में भगवान द्वारा प्रतिपादित जीव के कल्याण हेतु ज्ञान क्षय को प्राप्त हो जायेगा इसीलिए उसे लिपिबद्ध करना चाहिए। ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी की शुभ तिथी को पूज्य आचार्य पुष्पदंत व भूतबली महराज द्वारा श्री षटखंडाग़म ग्रंथराज का लेखन कार्य पूर्ण हुआ था। वर्तमान में हम सभी जो भी धर्म के स्वरूप को जान पा रहे हैं वह तीर्थंकर भगवान् की वाणी ग्रंथों मे लिपिबद्ध है, उसको चारित्र रूप धारण करने वाले गुरुओं के माध्यम से प्राप्त कर रहे हैं। आगम ग्रंथ जिनमें भगवान की वाणी लिपि बद्ध है उनको माँ जिनवाणी की संज्ञा दी जाती है। माँ जिनवाणी की आराधना का यह पर्व हम सभी के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है- इस दिन अत्यंत भक्ति भाव के साथ माँ...

डोंगरगढ़

विश्व वंदनीय आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज (ससंघ) इस समय डोंगरगढ़ (छग.) में विराजमान हैं। डोंगरगढ़ नेशनल हाईवे से 22 किमी की दूरी पर हैं रायपुर से 135 किलोमीटर दूरी पर है। रेलवे स्टेशन डोंगरगढ़ है एवं दुर्ग रेलवे जंक्शन पर सभी ट्रेनों का स्टॉपेज है। और अधिक जानकारी हेतु संपर्क करें। निशांत जैन : +91-09301301540 किशोर जैन (अध्यक्ष) : +91-9425563160 सुभाषचंद जैन (कोषाध्यक्ष) : +91-9301001473 सप्रेम जैन (प्रतिभा स्थली प्रभारी) : +91-9300622051 कार्यालय: +91-7489087040 साभार: iSupportJainism

जैन समुदाय

जैन समुदाय के बारे में बातें करते हुए हम प्राय: इस बात को अनदेखा कर देते हैं कि जैन जाति नहीं, धर्म है। जाति की बात करें, तो जैन धर्म के अधिकांश अनुयायी जाति से बनिए होते हैं। इस प्रसंग में यह बात ध्यान देने की है कि जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों में से बड़ी संख्या क्षत्रिय राजपरिवारों के युवाओं की थी। जैन धर्म के सिद्धांतों में सर्वाधिक महत्व अहिंसा का माना जाता है। इस धर्म की आस्था का मूल सूत्र ही है : अहिंसा परमो धम:। यह स्वीकार करने के बाद स्वभावत: अपने से इतर प्राणियों के प्रति दया भाव या परोपकार वृत्ति को जीवन में चरितार्थ करने की अपेक्षा जैन धर्म में आस्था रखने वालों से की जाती है।  सिद्धांतत: जैन समुदाय को किसी जाति तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। किसी भी व्यक्ति को, जिसकी आस्था जैन धर्म के सिद्धांतों में हो, इस धर्म में दीक्षा लेने का अधिकार होना चाहिए। उसी तरह, जैसे बौद्ध धर्म में दीक्षित होने का विकल्प सामान्य जन के पास होता है, लेकिन जैन धर्म में अगर सिद्धांतत: यह स्वीकार्य भी हो, तो इसका चलन कम-से-कम मेरी जानकारी में तो नहीं है। इतना ही नहीं, इस समुदाय की अपनी वर्ग और...

8 वाँ दीक्षा दिवस

आज पूज्य बालयति मुनिश्री विद्यासागर जी महाराज का 8 वाँ दीक्षा दिवस है ज्येष्ठ कृष्णा १५ (28 मई 2009) के दिन पूज्य आचार्य सन्मतिसागर जी गुरुदेव (दक्षिण वाले) ने निमशरगाँव तह. हातकणंगले(महाराष्ट्र) में ब्र. विद्याधर जी को मात्र 19 वर्ष की उम्र में मुनि दीक्षा प्रदान की थी। आपका जन्म 23 अप्रैल 1990 को सांगली में हुआ था आपने संत शिरोमणि पूज्य आचार्य गुरुवर विद्यासागर जी महाराज से दयोदय तीर्थ, जबलपुर में ब्रह्मचर्य व्रत स्वीकार किया था,जिस समय आपकी मुनि दीक्षा हुई उस वक्त आप गुरुकुल में विद्याअध्ययन कर रहे थे,आप निस्पृही साधक व आगमानुकूल मुनिचर्या के धारक है, सदैव आत्मचिंतन में रत रहने वाले। मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज वर्तमान में मोराजी सागर म.प्र में विराजमान है वीरप्रभु से मंगल कामना कि आप सदैव मोक्षमार्ग पर अविरल बढ़ते रहे व सुशीघ्र सिद्धशिला के वासी बने। साभार: जय जिनेद्र ग्रुप ✂ सब पढ़ें सब बढ़ें कृप्या काट छांट न करें © ✂

आचार्यश्री

चन्द्रगिरि (डोंगरगढ़) में विराजमान संत शिरोमणि 108 आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज ने मांगलिक उपदेश देते हुए एक दृष्टांत के माध्यम से बताया कि एक संघ में मुनि महाराज ने संलेखना के कुछ दिनों पहले यम संलेखना का नियम ले लिया था, ऐसे मुनि महाराज के दर्शन के लिए चक्रवर्ती तक आए थे। मुनि महाराज के शरीर में कुछ भी ग्रहण करने की शक्ति नहीं बची थी। ऐसे परीक्षा के समय में उन्हें मन में विकल्प हो रहा था तो उन्होंने गुरु महाराज से कहा कि उन्हें मन में आहार लेने का विकल्प आ रहा है। इस बात को सुनकर समस्त मुनि संघ चिंतित हो गए कि ऐसी परीक्षा की घड़ी में मुनि महाराज क्या कह रहे हैं? उन्हें जब आहार करने कहा गया तो उनके हाथों की अंजलि से जल मुंह तक भी नहीं आया और सारा जल बाहर ही गिर गया, इसके बाद ग्रास (रोटी) दिया गया तो मुंह में चबाने की भी ताकत नहीं थी। गुरु महाराज ने मुनि महाराज को मन को संयमित करने को कहा कि मन की तरंगें मोक्ष मार्ग में बाधक हैं। मृत्यु निश्चित है इसलिए हमें हर पल हर श्वास में प्रभु का स्मरण करते हुए आगम अनुसार मोक्ष मार्ग में चारों कषायों को जीतकर मन को संयमित कर संलेखना व्रत ...

आचार्य श्री

भगवान पर भरोसा रखें, लेकिन भगवान भरोसे न रहे। - आचार्य श्री विद्यासागर जी प्रवचन के समय मोबाइल से बेवजह फोटो खींचे जाने पर आचार्यश्री ने मोबाइल के दुरुपयोग और इसके अनावश्यक अप्पव्य पर सतर्क किया। रविवारीय प्रवचन श्रंखला में आचार्य श्री ने आज चंद्रगिरि डोंगरगढ़ में मांगलिक उपदेश  देते हुये  एक दृष्टान्त के माध्यम से बताया कि एक बार तीन व्यक्ति वाहन से यात्रा कर रहे थे असंतुलन बिगड़ने के कारण वे दुर्घटना ग्रस्त हो जाते है। जिसके कारण तीनो के पैर टूट जाते है। और उन्हे चिकित्सक के पास ले जाया जाता है चिकित्सक मरीज़ों से कहते है उन्हें भरोसा है कि वे ठीक हो जाएंगे। लेकिन उन्हें भरोसा रखते हुए पुरुषार्थ भी करना होगा चिकित्सक उनके पैरों में लेप लगाकर उस पट्टा चढ़ा देते है। लेकिन निर्धारित समय पर पट्टा खोलने पर पता चलता है उसकी हड्डी तो जुडी ही नही फिर दूसरे मरीज का पट्टा खोलने पर चिकित्सक को विश्वास होता है की इस मरीज का पैर अब ठीक हो गया है वह उसे उठकर चलने को कहा जाता है पर मरीज का जो पैर टुटा नहीं था वह उसे उठाता पर जो पैर टुटा था उसे नहीं उठा पाता है इसकी वजह उसे चिकित्सक पर भ...

उज्जैन के दानीगेट

उज्जैन के दानीगेट स्थित 2300 वर्ष प्राचीन देश का एक मात्र एक ऐसा जैन मंदिर है, जहां मंदिर के अंदर कल्याण स्त्रोत की 44 गाथाएं देहरियों पर लिखी हुई हैं। कल्याण स्त्रोत की 44 गाथाएं लिखी होने और पूरे देश के 108 पाश्र्वनाथ मंदिरों में इसके शामिल होने है, यही कारण है कि इसे देश के महत्वपूर्ण मंदिरों में गिना जाता है। आचार्य मरिप्रभ सागर जी महाराज के दिशा-निदेॅशन एवं उनकी प्रेरणा से देशभर के समाज के आर्थिक सहयोग से वर्ष 2008 में इसका जीर्णोद्धार शुरू हुआ। राजस्थान के मकराना के सफेद मार्बल से इस प्राचीन मंदिर को एक नये स्वरूप में राजस्थान के लगभग 100 कारीगरों कारीगरी का काम किया जा रहा है और वर्ष 2018 में इसकी प्राण-प्रतिष्ठा की तैयारियां चल रही हैं। आचार्यश्री स्वयं विहार करके 30 मई को इस भव्य कार्यक्रम की रूपरेखा बनाने उज्जैन आ रहे हैं। मंदिर जीर्णोद्वार समिति के अध्यक्ष पुखराज चौपड़ा, ट्रस्ट अध्यक्ष हीराचंद्र छाजेड़ ने बताया कि आचार्य यहां एक दिन रुककर समाजजनों केसाथ कार्यक्रम को लेकर चर्चा करेंगे और अगले चातुर्मास हेतु राजस्थान के बीकानेर के लिए रवाना होंगे। साभार: जैन24न्यूज़ ...

प्रमाण सागर जी

जन्म: 27 जून 1967 पूर्व नाम: नवीन कुमार जैन पिता का नाम: श्री सुरेन्द्र कुमार जैन माता का नाम: श्रीमती सोहनी देवी जैन जन्म स्थान: हजारी बाग ( झारखण्ड) वैराग्य: 4 मार्च 1984, राजनांदगांव (छतीसगढ़) क्षुल्लक दीक्षा: 8 नवम्बर 1985, सिद्ध क्षेत्र आहार जी, जिला- टीकमगढ़ (म.प्र.)  ऐलक दीक्षा: 10 जुलाई 1987, अतिशय क्षेत्र थुवौनजी मुनि दीक्षा:  31 मार्च 1988 महावीर जयंती, सिद्ध क्षेत्र सोनागिरी जीदीक्षा गुरू:संत शिरोमणी आचार्य श्री विद्यासागर जी झारखंड प्रान्त के हजारीबाग शहर में जन्मे मुनि श्री प्रमाणसागर जी, संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के प्रमुख शिष्यों में से हैं। अल्पवय में ही अंतर्यात्रा की ओर उन्मुख होने वाले मुनिश्री साधना, संयम और सृजन के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपका चिन्तन और अभिव्यक्ति कौशल हजारों - हजारों श्रोताओं को मंत्र मुग्ध कर भाव-विभोर कर देता है। धारा प्रवाह प्रवचन में शब्द-सौष्ठव एवं प्रस्तुतिकरण की मोहकता, मधुबन में बांसुरी की भांति प्रभावी है। आप हिन्दी, संस्कृत, प्राकृत एवं अंग्रेजी के अधिकारी विद्वान के रूप में बहु-आद...

साधू की चर्या

आए जाने दिगंबर जैन साधू की चर्या:  दिगंबर जैन साधू नग्न रहते हैं क्योंकि वो अपरिग्रह महाव्रत का पालन करते हुए अपने पास एक कपडा भी नहीं रखते । वो नग्न रहकर ठण्ड, बरसात आदि मौसम को भी सहन करते हैं । दिगंबर जैन साधू अपने पास केवल पिच्छी (मोर पंख से बनती है जो चींटी आदि कीड़ों को अहिंसा पूर्वक हटाने के लिए), कमंडल (शौच के लिए पानी रखने) और शास्त्र रखते हैं । इसके अलावा दिगंबर जैन साधू अपने पास कोई भी वस्तु अथवा पैसे आदि नहीं रखते हैं । दिगंबर जैन साधू पैरों में चप्पल जूते आदि कुछ भी नहीं पहनते चाहे काँटे ही क्यों न लगे, चाहे पैरों में चल चल कर छाले ही क्यों न हो जाए वो धुप में तपती सड़कों पर नंगे पाँव ही चलते है और जीवन भर नंगे पाँव ही चलते हैं । दिगम्बर जैन साधू अपने सर और दाढ़ी के बाल हर २ से ४ महीनों में स्वयं के हाथों से पूरे उखाड़ देते हैं क्योंकि वो कैची आदि का प्रयोग नहीं करते । बाल इसलिए उखाड़ते हैं क्योंकि बालों आदि में जीव उत्पन्न न हो उनकी हिंसा न हो । दिगम्बर जैन साधू २४ घंटे में एक वक़्त दिन में खड़े होकर अपने हाथों में आहार (भोजन) लेते है जो जैन समाज उनको देती है । दिगम...
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