दोषों के ज्ञान बिना हम गुणों को प्राप्त नहीं कर सकते। धन तो सुलभ है पर धर्म दुर्लभ है। क्रोध, मान, माया, लोभ और राग-द्वेष परिणाम ही मनुष्य के शत्रु हैं। - आ. विद्यासागरजी महाराज (आज कटंगी के प्रवचन से)
इतनी ऊँचाई न देना प्रभु कि, धरती पराई लगने लगे!! इतनी खुशियाँ भी न देना कि, दुःख पर किसी के हंसी आने लगे!! नहीं चाहिए ऐसी शक्ति जिसका, निर्बल पर प्रयोग करूँ!! नहीं चाहिए ऐसा भाव कि, किसी को देख जल-जल मरूँ!! ऐसा ज्ञान मुझे न देना, अभिमान जिसका होने लगे!! ऐसी चतुराई भी न देना जो, लोगों को छलने लगे!!
आज फाल्गुन सुदी अष्टमी से आठ दिन तक चलने वाले महान अष्टाह्निका पर्व आरम्भ हो रहे हैं।यों तो हम सिद्धों की आराधना कभी भी कर सकते हैं पर ये आठ दिन सिद्ध भगवान की आराधना करने के विशेष दिनहोते हैं जब देव भी अपने परिवार सहित इन दिनों में पंचमेरु और नन्दीश्वर द्वीप में विराजमान भगवान की भव्य प्रतिमाओं के दर्शन करते हैं ।हम मनुष्य नन्दीश्वर और पंचमेरु नहीं जा सकते हैं।इसीलिए हमलोग यहीं से भाव सहित इन दिनों में पंचमेरु और नन्दीश्वर द्वीप की पूजा करते हैं।जगह जगह मन्दिरों में सिद्ध चक्र विधान का भी आयोजन किया जाता है।सिद्ध चक्र विधान को सभी विधानों का राजा कहा जाता है जिसमें हमारे बड़े से बड़े पापों को भी काटने की अकाट्य क्षमता होती है।सात सौ सभासदों सहित श्रीपाल राजा को पूर्व जन्म में मुनि का अपमान करने के कारण ऐसा घोर कुष्ठरोग हो गया था कि तीन सौ किलोमीटर की दूरी तक लोग उनके शरीर से आने वाली भयंकर दुर्गंध से व्याकुल थे।ऐसे में मैना सती ने मुनि के वचनों पर दृढ़ आस्था रखते हुए सिद्धचक्र विधान की आठ दिन तक पूजा करके गन्धोदक का जल श्रीपाल व सभी सभासदों पर छिड़का।फिर क्या हुआ हम सब जानते हैं।कुष...
आज परम पूज्य भगवान श्री 1008 चन्द्रप्रभ स्वामी जी का निर्वाण कल्याणक का पावन दिवस है । देश भर में अत्यंत भक्ति भाव से इस दिन को मनाया जा रहा है। आप सभी को बधाई, अनंत मंगल कामनाएं ।
चलता रहा हुं अग्निपथ पर चलता चला जाऊँगा। जैन बन कर जन्म लिया मैंने जैन बन कर ही मर जाऊंगा। भगवान् महावीर की संतान हूँ, रुकना मैंने सीखा नहीं। वर्धमान का भक्त हूँ, झुकना मैंने सीखा नही। ह्रदय में जो धड़क रहा है, वो धड़कन तेरे नाम का रगो में जो बह रहा है, वो लहू है महावीर भगवान् का।