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Showing posts from April, 2018

अक्षय तृतीया पर्व की महिमा

भव्यात्माओं! भगवान ऋषभदेव का जब छह माह का योग पूर्ण हो गया वे यतियों-मुनियों की आहार विधि बतलाने के उद्देश्य से शरीर की स्थिति के लिये निर्दोष आहार हेतु निकल पड़े। महामेरू भगवान ऋषभदेव ईर्यापथ से गमन कर रहे हैं, अनेकों ग्राम नगर शहर आदि में पहुँच रहे हैं। उन्हें देखकर मुनियों की चर्या को न जानने वाली प्रजा बड़े उमंग से साथ सन्मुख आकर उन्हें प्रणाम करती है। उनमें से कितने ही लोग कहने लगते हैं कि हे देव! प्रसन्न होइये और कहिये क्या काम है ? हम सब आपके किंकर हैं, कितने ही भगवान के पीछे-पीछे हो लेते हैं। अन्य कितने ही लोग बहुमूल्य रत्न लाकर भगवान् के सामने रख देते हैं और कहते हैं कि हे नाथ! प्रसन्न होइये, तुच्छ भेंट स्वीकार कीजिये, कितने ही सुन्दरी और तरुणी कन्याओं को सामने करके कहते हैं प्रभो! आप इन्हें स्वीकार कीजिये, कितने ही लोग वस्त्र, भोजन, माला आदि अलंकार ले-लेकर उपस्थित हो जाते हैं, कितने ही लोग प्रार्थना करते हैं कि प्रभो! आप आसन पर विराजिये, भोजन कीजिये इत्यादि इन सभी निमित्तों से प्रभु की चर्या में क्षण भर के लिए विघ्न पड़ जाता है पुनः वे आगे बढ़ जाते हैं। इस प्रकार से जगत को...

।।श्री चन्द्रप्रभु चालीसा।।

वीतराग सर्वज्ञ जिन, जिन वाणी को ध्याय | लिखने का साहस करुं, चालीसा सिर नाय |1| देहरे के श्रीचन्द्र को, पूजौं मन वच काय | ऋद्धि सिद्धि मंगल करें, विघ्न दूर हो जाय |2| जय श्रीचन्द्र दया के सागर, देहरे वाले ज्ञान उजागर |3| शांति छवि मूरति अति प्यारी, भेष दिगम्बर धारा भारी |4| नासा पर है दृष्टि तुम्हारी, मोहनी मूरति कितनी प्यारी |5| देवों के तुम देव कहावो, कष्ट भक्त के दूर हटावो |6| समन्तभद्र मुनिवर ने ध्याया, पिंडी फटी दर्श तुम पाया |7| तुम जग में सर्वज्ञ कहावो, अष्टम तीर्थंकर कहलावो |8| महासेन के राजदुलारे, मात सुलक्षणा के हो प्यारे |9| चन्द्रपुरी नगरी अति नामी, जन्म लिया चन्द्र-प्रभु स्वामी |10| पौष वदी ग्यारस को जन्मे, नर नारी हरषे तब मन में |11| काम क्रोध तृष्णा दुखकारी, त्याग सुखद मुनि दीक्षा धारी |12| फाल्गुन वदी सप्तमी भाई, केवल ज्ञान हुआ सुखदाई |13| फिर सम्मेद शिखर पर जाके, मोक्ष गये प्रभु आप वहां से|14| लोभ मोह और छोड़ी माया, तुमने मान कषाय नसाया |15| रागी नहीं, नहीं तू द्वेषी, वीतराग तू हित उपदेशी |16| पंचम काल महा दुखदाई, धर्म कर्म भूले सब ...

पूज्य गुरुदेव के बढ़ते कदम...

11 अप्रैल, बुधवार।  परम पूज्य आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ का मंगल विहार-  आज का रात्रि विश्राम- लखनपुरा (8 किमी),  कल की आहार चर्या- मरुताल (9 किमी) दमोह यहाँ से मात्र 4 किमी ।  सूचना प्रदाता: शुभान्शु जैन दमोह 
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