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Showing posts from July, 2019

लोग बँटते रहेंगे, पंथ बनते रहेंगे

जब-जब समाज व्यक्तिप्रधान होगा, तब-तब फूट पड़ती रहेगी, लोग बँटते रहेंगे, पंथ बनते रहेंगे। जब हम सर्वज्ञ सिद्धि पढ़ते थे तो उसमें दो प्रकार की सर्वज्ञ सिद्धि होती थी एक सामान्य सर्वज्ञ सिद्धि और दूसरी विशेष सर्वज्ञ सिद्धि।          सामान्य सर्वज्ञ सिद्धि में तो ये सिद्ध करना होता कि इस दुनिया में सर्वज्ञ होते हैं और विशेष सर्वज्ञ सिद्धि में सिद्ध करना होता है कि वो सर्वज्ञ केवल अर्हन्त ही हैं अन्य नहीं।        कई बार हम सोचते थे कि विशेष सर्वज्ञ सिद्धि में अर्हन्त ही सर्वज्ञ हैं ऐसा क्यों सिद्ध करते हैं? अर्हन्त की जगह, आदिनाथ या महावीर सर्वज्ञ हैं ऐसा सिद्ध क्यों नहीं करते। न्यायशास्त्र में भी जैन मत को जब प्रदर्शित करना हो तो उसे आर्हत मत- आर्हत मत शब्द का प्रयोग किया जाता है। वहाँ भी आदिनाथ के या महावीर के मत में ऐसा कहा है इस प्रकार का प्रयोग क्यों नहीं किया जाता? जैन धर्म में सर्वमान्य और हर जैनी की जुबान पर चढ़ा एक महामन्त्र उसमें भी महावीर,आदिनाथ या कुन्दकुन्द को नमस्कार न करके अर्हन्त,सिद्ध, साधु जैसे पदों को...

परम पूज्य 108 आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज पूजन

श्री विद्यासागर के चरणों में झुका रहा अपना माथा। जिनके जीवन की हर चर्यावन पडी स्वयं ही नवगाथा।। जैनागम का वह सुधा कलश जो बिखराते हैं गली-गली। जिनके दर्शन को पाकर के खिलती मुरझायी हृदय कली।। ऊँ ह्रीं श्री 108 आचार्य विद्यासागर मुनीन्द्र अत्र अवतर सम्बोषट आव्हानन। अत्र तिष्ठ ठः ठः स्थापनं। अत्र मम सन्निहितो भवः भव वषद सन्निध्किरणं। सांसारिक विषयों में पडकर, मैंने अपने को भरमाया। इस रागद्वेष की वैतरणी से, अब तक पार नहीं पाया।। तब विद्या सिन्धु के जल कण से, भव कालुष धोने आया हूँ। आना जाना मिट जाये मेरा, यह बन्ध काटने आया हूँ।। जन्म जरा मृत्यु विनाशनाय जलम् निर्व स्वाहा। क्रोध अनल में जल जल कर, अपना सर्वस्व लुटाया है। निज शान्त स्वरूप न जान सका, जीवन भर इसे भुलाया है।। चन्दन सम शीतलता पाने अब, शरण तुम्हारी आया हूँ। संसार ताप मिट जाये मेरा, चन्दन वन्दन को जाया हूँ।। संसार ताप विनाशनाय चन्दनं निर्व स्वाहा। जड को न मैंने जड समझा, नहिं अक्षय निधि को पह्चाना। अपने तो केवल सपने थे, भ्रम और जगत को भटकाना।। चरणों में अर्पित अक्षय है, अक...
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