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Showing posts from September, 2015

क्षमावाणी

जिस प्रकार अग्नि सब कुछ जला कर ख़ाक कर देती है, उसी प्रकार क्रोध भी इस जीवन को जलाकर ख़ाक कर देता है, जिस प्रकार जल अग्नि को शांत कर देता है, उसी प्रकार क्षमा रूपी जल भी क्रोध रूपी अग्नि को शांत कर देता है, अतः बंधुओं अपने जीवन को ख़ाक होने से बचाने हेतु आइये हम अपने जीवन को क्षमा रूपी जल से सींचे ताकि इस आतम रूपी बगिया के धर्म रूपी वृक्ष में संयम रूपी फूल खिले और मोक्ष रूपी फल सभी को प्राप्त हों, जन्म से लेकर मोक्ष तक की इस अनंत यात्रा का अंत करने की पहली सीढ़ी क्षमा है तो आइये आप सभी को क्षमा करके एवं सभी से क्षमा मांग कर इस मोक्ष सीढ़ी में पहला पग रखना चाहता हूँ ! सबको क्षमा सबसे क्षमा ! उत्तम क्षमा 

परम पावन तीर्थराज सम्मेद शिखर जी

सम्मेद शिखर सिद्ध क्षेत्र - ईस्टर्न रेलवे के पारसनाथ स्टेशन से 14 मील (22 कि.मी.) तथा गिरीडीह स्टेशन से पहाड़ की तलहटी मधुवन 18 मील (30 कि.मी.) है । इस क्षेत्र ; से भूतकाल में अनन्तों तथा वर्तमान अवसर्पिणी काल में 20 तीर्थंकर एवं असंख्यात मुनि मोक्ष गये हैं, पहाड़ की चढ़ाई-उतराई तथा यात्रा 18 मील (30 कि.मी.) की है। पारसनाथ हिल और गिरिडीह से शिखरजी जाने के लिए मोटर मिलती है। परम पावन तीर्थराज सम्मेदशिखर जी की वन्दना यहाँ से इस अवसर्पिणी काल में भगवान श्री आदिनाथ जी, वासुपूज्य जी, श्रीनेमिनाथ जी एवं भगवान श्रीमहावीर स्वामी को छोड़ शेष 20 तीर्थंकर मोक्ष पधारे।  इस वन्दना में टोंकों का दर्शन क्रम इस प्रकार है :- 1 - श्रीकुन्थु नाथजी 2 - श्रीनमिनाथजी 3 - श्रीअरहनाथजी 4 - श्रीमल्लिनाथजी 5 - श्रीश्रेयांसनाथजी 6 - श्रीपुष्पदन्तजी 7 - श्रीपद्मप्रभुजी 8 - श्रीमुनिसुव्रतनाथजी 9 - श्रीचन्द्रप्रभजी 10 - श्रीआदिनाथजी (कैलाश) 11 - श्रीशीतलनाथजी 12 - श्रीअनन्तनाथजी 13 - श्रीसम्भवनाथजी 14 - श्रीवासुपूज्यजी (चंपापुर) 15 - श्रीअभिनन्दनजी 16 - श्रीधर्मनाथजी 17 - श्रीसुमतिन...

जैन कौन ?

जो स्वयं को अनर्थ हिंसा से बचाता है। जो सदा सत्य का समर्थन करता है। जो न्याय के मूल्य को समझता है। जो संस्कृति और संस्कारों को जीता है। जो भाग्य को पुरुषार्थ में बदल देता है। जो अनाग्रही और अल्प परिग्रही होता है। जो पर्यावरण सुरक्षा में जागरुक रहता है। जो त्याग-प्रत्याख्यान में विश्वास रखता है। जो खुद को ही सुख-दःख का कर्ता मानता है। संक्षिप्त सूत्र- व्यक्ति जाति या धर्म से नहीं अपितु,  आचरण एवं व्यवहार से जैन कहलाता है।

एक किस्सा

सन् 1902 में, एक प्रोफेसर ने अपने छात्र से पूछा क्या वह भगवान था, जिसने इस संसार की हर वस्तु को बनाया ? छात्र का जवाब : हां । उन्होंने फिर पूछा : शैतान क्या हैं ? क्या भगवान ने इसे भी बनाया ? छात्र चुप हो गया।  फिर छात्र ने आग्रह किया कि- क्या वह उनसे कुछ सवाल पुछ सकता हैं ? प्रोफेसर ने इजाजत दी उसने पुछा-क्या ठण्ड होती हैं ? प्रोफेसर ने कहा: हां, बिल्कुल क्या तुम्हे यह महसुस नहीं होती? छात्र ने कहा: मैं माफी चाहता हुं सर, लेकिन आप गलत हो । गर्मी का पुर्ण रुप से लुप्त होना ही ठण्ड कहलाता हैं, जबकि इसका अस्तित्व नहीं होता । ठण्ड होती ही नहीं ? छात्र ने फिर पुछा: क्या अन्धकार होता हैं ? प्रोफेसर ने कहा: हां,होता हैं छात्र ने कहा:आप फिर गलत है सर । अन्धकार जैसी कोई चीज नहीं होती, वास्तव में इसका कारण रोशनी का पुर्ण रुप से लुप्त होना हैं  सर हमने हमेशा गर्मी और रोशनी के बारे में पढा और सुना हैं । ठण्ड और अन्धकार के बारे में नहीं । वैसे ही भगवान हैं और बस इसी तरह शैतान भी नहीं होता, वास्तव में, पुर्ण रुप से भगवान में विश्वास, सत्य और आस्थ...

न्यायालयों के निर्णय

हमारा जैन धर्म बहुत प्राचीन धर्म है इसके कुछ प्रमाण  1927-- मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा air 1927 मद्रास 228 मुकदमें के निर्णय में " जैन धर्म को स्वतंत्र, प्राचीन ब ईसा से हजारो वर्ष पूर्व का माना ।" 1939 -- बम्बई उच्च न्यायालय ने Air1939 बम्बई 377 मुकदमें के निर्णय में कहा कि " जैन धर्म वेदों को स्वीकार नही करता हैं, श्राद्धों को नही मानता है ब अनुसंधान बताते हैं कि भारत में जैन धर्म  ब्राह्राण धर्म से पहले था।" बम्बई सरकार ने 19 अगस्त, 1948 को अपनी अधिसूचना में इस तथ्य को स्वीकार किया कि "यद्दपि जैनों पर हिन्दू लॉ लागू है परंतु जैनों को हिन्दुओ के रूप में बर्णित नही किया जा सकता" । 1951-- बम्बई हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एम.सी. छगला और न्यायमूर्ति गजेन्द्र गड़कर ने याचिका CWJC 91/1951 पर यह निर्णय दिया कि "हरिजनों को जैनों के मंदिरों में प्रवेश करने का कोई अधिकार नहीं है क्योकि बे हिन्दू मंदिर नही है, यह विदित है कि जैन हिंदुओं से भिन्न मतावलंबी हैं " 1954 --  उच्चतम न्यायालय ने AIR 1954 SC 282 के निर्णय में माना कि " भारत में...

मुनि क्षमासागर जी

जीवन आकाश-सा हो तो विस्तार असीम है वृक्ष-सा हो तो छाया सघन है जीवन सूरज-सा हो तो रोशनी हरदम है जीवन में आत्मीय स्पर्श हो तो हर क्षण स्वर्णिम है। - मुनि क्षमासागर जी ऐसे ही उनके आत्मीय स्पर्श  की अनुभूति को संजोने के लिए मुनिश्री की दीक्षा स्थली नैनागिर जी में, उनके मुनि दीक्षा दिवस (20 अगस्त) के दिन एक संग्रहालय का लोकार्पण किया गया है उनकी अनुपस्थति के सूनेपन को भरने की पहल।

अब जैन बनो

ना श्वेतांबर बनो, ना दिगंम्बर बनो, छिङ गया धर्म युद्ध अब जैन बनो, अब एक बनो बस, अब जैन बनो, ना तलवार से, ना हथियार से, भगवान महावीर की संतान हैं, अहिंसा के हत्यार से लड़ो, अब एक बनो, बस अब जैन बनो, जैन धर्म पर विप्दा की घड़ी आई है, संतो की गरीमा पर बन आई है, धर्म नही मांग रहा जान का बलीदान, धर्म मांग रहा बस समय का बलीदान, भगवान महावीर की आन बनो, जैन संतो का सम्मान बनो, वीर बनो तुम धीर बनो, अब एक बनो सब अब जैन बनो ।
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