Skip to main content

Posts

Showing posts from March, 2015

मुनि श्री प्रज्ञा सागर

छोटे बाबा की मुस्कुराहट

श्री महावीराष्टक

यदीये चैतन्ये मुकुर इव भावाश्चिदचितः समं भान्ति ध्रौव्य व्यय-जनि-लसन्तोऽन्तरहिताः। जगत्साक्षी मार्ग-प्रकटन परो भानुरिव यो महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु में॥1॥ अताम्रं यच्चक्षुः कमल-युगलं स्पन्द-रहितं जनान्कोपापायं प्रकटयति वाभ्यन्तरमपि। स्फुटं मूर्तिर्यस्य प्रशमितमयी वातिविमला महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥2॥ नमन्नाकेंद्राली-मुकुट-मणि-भा जाल जटिलं लसत्पादाम्भोज-द्वयमिह यदीयं तनुभृताम्‌। भवज्ज्वाला-शान्त्यै प्रभवति जलं वा स्मृतमपि महावीर स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥3॥ यदर्च्चा-भावेन प्रमुदित-मना दर्दुर इह क्षणादासीत्स्वर्गी गुण-गण-समृद्धः सुख-निधिः। लभन्ते सद्भक्ताः शिव-सुख-समाजं किमुतदा महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥4॥ कनत्स्वर्णाभासोऽप्यपगत-तनुर्ज्ञान-निवहो विचित्रात्माप्येको नृपति-वर-सिद्धार्थ-तनयः। अजन्मापि श्रीमान्‌ विगत-भव-रागोद्भुत-गतिर्‌ महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥5॥ यदीया वाग्गंगा विविध-नय-कल्लोल-विमला बृहज्ज्ञानाभ्भोभिर्जगति जनतां या स्नपयति। इदानीमप्येषा बुध-जन-मरालै परिचिता महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे॥6॥ अनिर्वारोद्रेकस्त्रिभुवन...

मेरे भगवन के बारे में !

परम पूज्य आचार्य गुरुवर विद्यासागर जी महाराज, जिन्होंने पिछले 43 वर्षों से मीठे (शक्कर) तथा नमक का त्याग कर रखा है, बमुश्किल 3 घंटे की नींद लेते हैं और इसी तप-साधना से अपनी इंद्रिय शक्ति को नियंत्रित कर केवल एक करवट सोते हैं। मल-मूत्र विसर्जन भी अपने नियम के निर्धारित समयानुसार ही करते हैं। दिगंबर जैन परंपरा के संत आचार्य विद्यासागरजी एवं मुनिजनों की त्याग परंपरा का विलक्षण व आदर्श उदाहरण हैं। आचार्यश्री ने पिछले 43 वर्ष से मीठे व नमक तथा पिछले 38 वर्ष से रस व फल का त्याग किया हुआ है। उन्होंने 19 वर्ष से रात्रि विश्राम के समय चटाई तक का भी त्याग किया हुआ है। 22 वर्ष से सब्जियों व दिन में सोने का भी त्याग कर रखा है। 26 वर्ष से मिर्च-मसालों का त्याग किए हुए हैं। आहार में सिर्फ दाल, रोटी, दलिया, चावल, जल, दूध ही लेते हैं और जैन आगम की परंपरा का पालन करते हुए दिन में केवल एक बार कठोर नियमों का पालन खड्गासन मुद्रा में हाथ की अंजुलि में भोजन लेते हैं। भोजन में किसी भी प्रकार के सूखे फल, मेवे और किसी भी प्रकार के व्यंजनों का सेवन भी नहीं करते। दिगंबर जैन परंपरा के अनुरूप परम तपस्वी ...

वह जैन नही

आचार्य चाणक्य

भगवान मूर्तियों या मंदिरो में नहीं है ! भगवान हमारी अनुभूति में ही विराजमान है ! हमारी आत्मा ही भगवान का मंदिर है ! सभी के शरीर में आत्मा रुपी मंदिर में अनुभूति रुपी भगवान विराजमान रहते है ! बस इंसान इन्हे महसूस नहीं कर पाता और दुनिया भर में खोजता रहता है जबकि भगवान हमारे अंदर ही मौजूद हैं !

समस्याओं

शिकायत करके समस्याओं से बचा नहीं जा सकता, किन्तु जिम्मेदारी उठकर समस्याओं को कम जरूर किया जा सकता हैं !

सफलता के सात भेद

सफलता के सात भेद मुझे अपने कमरे के अंदर ही उत्तर मिल गये ! १. छत ने कहा ऊँचे उद्देश्य रखो ! २. पंखे ने कहा ठन्डे रहो ! ३. घड़ी ने कहा हर मिनट कीमती है ! ४. शीशे ने कहा कुछ करने से पहले अपने अंदर झाँक लो !  ५. खिड़की ने कहा दुनिया को देखो ! ६. कैलेंडर ने कहा अप टू डेट रहो ! ७. दरवाजे ने कहा अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए पूरा जोर लगाओ !

जैन अंक ज्ञान

१. आत्मा २. जीव=१. संसारी जीव २. मुक्त जीव ३. रत्नत्रय=१. सम्यग्दर्शन २.समयग्ज्ञान ३.समय्कचारित्र ४. गति=१. नरक २. तिर्यंच ३. मनुष्य ४. देव ५. पाप=१. हिंसा २. झूठ ३. चोरी ४. कुशील ५. परिग्रह ६. द्रव्य=१. जीव २. पुदगल ३. धर्म ४. अधर्म ५. आकाश ६. काल ७. तत्व=१. जीव २ अजीव ३ आस्त्रव ४ बंध ५ संवर ६ निर्जरी ७ मोक्ष ८. कर्म=१. ज्ञानावरण २ दर्शनावरण ३ वेदनीय ४ मोहनीय  ५ आयु      ६ नाम ७ गोत्र ८ अंतराय ९. पदार्थ=१. जीव २ अजीव ३ आस्त्रव ४ बंध ५ संवर ६ निर्जरा ७ मोक्ष     ८ पाप ९ पुण्य १०. धर्म=१. उत्तम क्षमा २ मार्दव ३ आर्जव ४ सत्य ५ शोच ६संयम       ७ तप ८ त्याग ९.अकिंचन १० ब्रम्हचर्य ११. प्रतिमा=१. दर्शन २ व्रत ३ सामायिक ४ प्रोषधोपवास ५ सचित्तत्याग       ६ रात्रिभोजन त्याग ७ ब्रम्हचर्य ८ आरंभत्याग ९.परिग्रह त्याग       १० अनुमतित्याग ११ उद्दिष्टत्याग १२. भावना=१. अनित्य २ अशरण ३  संसार ४ एकत्व ५ अन्यत्व  ...

भगवन बोलते हैं

तुम करते वही हो, जो तुम चाहते हो ! पर होता वही है, जो मैं चाहता हूँ !! तुम भी वही करो, जो मैं चाहता हूँ ! फिर होगा वही, जो तुम चाहते हो !!

जीवन ही व्यर्थ हैं

गुण न हो तो रूप व्यर्थ हैं, होश न हो तो जोश व्यर्थ हैं ! भूख न हो तो भोजन व्यर्थ हैं, साहस न हो तो शस्त्र व्यर्थ हैं ! विन्रमता न हो तो विद्या व्यर्थ है, साद उपयोग न हो तो धन व्यर्थ है ! और परोपकार न करने वालों का तो जीवन ही व्यर्थ हैं !

दुखी रहने के १० रास्ते

दुखी रहने के १० रास्ते - देरी से सोना, देरी से उठना, लेन - देन  का हिसाब न रखता, किसी के लिये कुछ न करना, स्वयं की बात को ही सत्य बताना, किसी का विश्वास न करना, बिना कारण झूठ बोलना, कोई भी काम समय पर न करना, बिना माँगे सलाह देना, बीते हुए सुख को बार बार याद करना, हमेशा अपने लिये ही सोचना !

मनुष्य का अपना क्या है

मनुष्य का अपना क्या है - जन्म दूसरे ने दिया, नाम दूसरे ने दिया, शिक्षा दूसरे ने दी, रिश्ता भी दूसरे से जुड़ा, काम करना भी दूसरे ने सिखाया, अंत में शमशान भी दूसरे के कंधे पर जायेगे ! तुम्हारा इस संसार में क्या हैं, जो तुम इतना घमंड करते हो !

आदमी

आदमी को खल रहा हैं आदमी, मरुस्थल सा जल रहा हैं आदमी ! दूसरे का कौर मुँह से छीनकर, आजकल में पल रहा हैं आदमी !! आदमी की शक्ल से अब डर रहा हैं आदमी, आदमी हे मरता हैं मर रहा हैं आदमी ! आदमी को लूट कर घर भर रहा हैं आदमी, समझ कुछ आता नहीं क्या कर रहा हैं आदमी !!

अनमोल वचन

जब ऊपर वाला आपसे कुछ वापिस लेता है तो, यह मत सोचो कि उसने आपको कोई दंड दिया है, हो सकता है, उसने आपका हाथ खाली किया हो, पहले से बेहतर कुछ देने के लिए !

सुविचार

उलझी हुई दुनिया को पाने की जिद करो, जो ना हो अपना उसे अपनाने की जिद करो, इस समंदर में तूफ़ान बहुत आते हैं तो क्या हुआ, इसके साहिल पे घर बनाने की जिद करो…   

जार्ज अल्बर्ट आइंसटीन

मैं नहीं जानता कि मृत्यु के पश्चात् भी जीवन हैं या नहीं, किन्तु यदि यह सत्य हैं की मृत्यु पश्चात् भी जीवन हैं तो मैं चाहूँगा कि मैं भारत में पैदा होउँ वो भी जैन धर्म में ! - जार्ज अल्बर्ट आइंसटीन विश्व प्रसिद्ध महान वैज्ञानिक

मुनि प्रज्ञासागर

Jainism is not merely a religion but a way to live life... Him who is the leader in the path of salvation Him who destroys the huge mountain of Karmas Him whose knowledge apprehends the whole of reality I worship with object of obtaining similar qualities for myself.  - Muni Shree Pragya Sagar Ji Maharaj   source: pragyasagar.com/

'माँ' जिसकी कोई परिभाषा नहीं

इन्सान के शरीर 45 डेल (इकाई) तक ही दर्द सह सकता है ! परन्तु जन्म देते समय एक महिला को ५७ डेल (इकाई) तक दर्द महसूस करती है ! यह दर्द 22 हड्डियों का एक साथ टूटने के बराबर है ! अपनी माँ की प्यार करो , इस धरती पर सबसे खुबसूरत अगर कोई है तो वो माँ है उसे दर्द (दुःख) मत दो ! सबसे बड़ी आलोचक , लेकिन फिर भी सबसे अच्छी सहयोगी है 'माँ' जिसकी कोई परिभाषा नहीं, जिसकी कोई सीमा नहीं, जो भगवान से भी बढ़कर है !

मेरी भावना

जिसने राग-द्वेष कामादिक, जीते सब जग जान लिया सब जीवों को मोक्ष मार्ग का निस्पृह हो उपदेश दिया, बुद्ध, वीर जिन, हरि, हर ब्रह्मा या उसको स्वाधीन कहो भक्ति-भाव से प्रेरित हो यह चित्त उसी में लीन रहो। ॥१॥ विषयों की आशा नहीं जिनके, साम्य भाव धन रखते हैं निज-पर के हित साधन में जो निशदिन तत्पर रहते हैं, स्वार्थ त्याग की कठिन तपस्या, बिना खेद जो करते हैं ऐसे ज्ञानी साधु जगत के दुःख-समूह को हरते हैं। ॥२॥ रहे सदा सत्संग उन्हीं का ध्यान उन्हीं का नित्य रहे उन ही जैसी चर्या में यह चित्त सदा अनुरक्त रहे, नहीं सताऊँ किसी जीव को, झूठ कभी नहीं कहा करूँ पर-धन-वनिता पर न लुभाऊँ, संतोषामृत पिया करूँ। ॥३॥ अहंकार का भाव न रखूँ, नहीं किसी पर खेद करूँ देख दूसरों की बढ़ती को कभी न ईर्ष्या-भाव धरूँ, रहे भावना ऐसी मेरी, सरल-सत्य-व्यवहार करूँ बने जहाँ तक इस जीवन में औरों का उपकार करूँ। ॥४॥ मैत्रीभाव जगत में मेरा सब जीवों से नित्य रहे दीन-दु:खी जीवों पर मेरे उरसे करुणा स्रोत बहे, दुर्जन-क्रूर-कुमार्ग रतों पर क्षोभ नहीं मुझको आवे साम्यभाव रखूँ मैं उन पर ऐसी परिणति हो जावे। ॥५॥ गुणीजनों को देख हृदय में ...

जिनवाणी स्तुति

मिथ्यातम नासवे को, ज्ञान के प्रकासवे को, आपा-पर भासवे को, भानु-सी बखानी है । छहों द्रव्य जानवे को, बन्ध-विधि भानवे को, स्व-पर पिछानवे को, परम प्रमानी है ॥ अनुभव बतायवे को, जीव के जतायवे को, काहू न सतायवे को, भव्य उर आनी है । जहाँ-तहाँ तारवे को, पार के उतारवे को, सुख विस्तारवे को, ये ही जिनवाणी है ॥ हे जिनवाणी भारती, तोहि जपों दिन रैन, जो तेरी शरणा गहै, सो पावे सुख चैन । जा वाणी के ज्ञान तें, सूझे लोकालोक, सो वाणी मस्तक नवों, सदा देत हों ढोक ॥

नवकार मंत्र ही महामंत्र

नवकार मंत्र ही महामंत्र, निज पद का ज्ञान कराता है। निज जपो शुद्ध मन बच तन से, मनवांछित फल का दाता है॥1॥ नवकार मंत्र ही महामंत्र पहला पद श्री अरिहंताणां, यह आतम ज्योति जगाता है। यह समोसरण की रचना की भव्यों को याद दिलाता है॥2॥ नवकार मंत्र ही महामंत्र दूजा पद श्री सद्धाणं है, यह आतम शक्ति बढ़ाता है। इससे मन होता है निर्मल, अनुभव का ज्ञान कराता है॥3॥ नवकार मंत्र ही महामंत्र तीजा पद श्री आयरियाणां, दीक्षा में भाव जगाता है। दुःख से छुटकारा शीघ्र मिले, जिनमत का ज्ञान बढ़ाता है॥4॥ नवकार मंत्र ही महामंत्र चौथा पद श्री उवज्ज्ञायणं, यह जैन धर्म चमकता है। कर्मास्त्रव को ढीला करता, यह सम्यक्‌ ज्ञान कराता है॥5॥ नवकार मंत्र ही महामंत्र पंचमपद श्री सव्वसाहूणं, यह जैन तत्व सिखलाता है। दिलवाता है ऊँचा पद, संकट से शीघ्र बचाता है॥6॥ नवकार मंत्र ही महामंत्र तुम जपो भविक जन महामंत्र, अनुपम वैराग्य बढ़ाता है। नित श्रद्धामन से जपने से, मन को अतिशांत बनाता है॥7॥ नवकार मंत्र ही महामंत्र संपूर्ण रोग को शीघ्र हरे, जो मंत्र रुचि से ध्याता है। जो भव्य सीख नित ग्रहण करे, वो जामन मरण मिटाता है॥8॥ नवकार मंत्र ही महा...

एक खूबसूरत सच

मंदिर के बाहर लिखा हुआ एक खूबसूरत सच……" अगर उपवास करके भगवान खुश होते, तो इस दुनिया में बहुत दिनो तक खाली पेट रहने वाला भिखारी सबसे सुखी इन्सान होता। इसलिऐ सच ही कहा गया है,  मनुष्य का जीवन एक खेत है, जिसमें कर्म बोए जाते हैं और उन्ही के अच्छे-बुरे फल काटे जाते हैं । जो अच्छा ‪कर्म‬ करता है, वह अच्छे फल पाता है। बुरे कर्म करने वाला बुरार्इ समेटता है। "

दिल को छू लेने वाली बातें

गरीबो की बस्ती में जरा जाकर तो देखो, वहाँ बच्चे भुखे तो मिलेगें मगर उदास नही ! दुनिया में बुराई इसलिए नहीं फैल रही कि बुरे लोग अधिक हैं, बल्कि इसलिए फैल रही हैं, कि अच्छे लोग चुप हैं ! बादाम खाने से उतनी अक्ल नहीं आती, जितनी धोखा खाने से आती है ! आप का खुश रहना ही, आप का बुरा चाहने वालों के लिए सबसे बड़ी सजा है ! खुबसूरत लोग हमेशा अच्छे नहीं होते, अच्छे लोग हमेशा खूबसूरत नहीं होते ! रिश्ते और रास्ते एक ही सिक्के के दो पहलु हैं, कभी रिश्ते निभाते निभाते रास्ते खो जाते हैं और कभी रास्तो पर चलते चलते रिश्ते बन जाते हैं ! बेहतरीन इंसान अपनी मीठी जुबान से ही जाना जाता है, वरना अच्छी बातें तो दीवारों पर भी लिखी होती है ! इस कलयुग में रूपया चाहे कितना भी गिर जाए, इतना कभी नहीं गिर पायेगा, जितना रूपये के लिए इंसान गिर चुका है ! रास्ते में अगर मंदिर देखो तो प्रार्थना नहीं करो तो चलेगा, पर रास्ते में एम्बुलेंस मिले तब प्रार्थना जरूर करना शायद कोई जिन्दगी बच जाये ! जिसके पास उम्मीद हैं, वह लाख बार हार के भी, नही हार सकता ! दुनिया में कोई काम impossible” नहीं बस होसला और मेहनत की जरूरत है impossi...

कहावत है

आम बोएगा वह आम खाएगा, बबूल बोएगा वह कांटे पाएगा। बबूल बोकर आम प्राप्त करना, जिस प्रकार प्रकृति का ‪सत्य‬ नही, उसी प्रकार बुरार्इ के बीज बोकर, भलार्इ पा लेने की कल्पना भी नही की जा सकती ! ये कड़वी सच्चाई है !!     - मुनि श्री

बहाने नहीं सफलता के रास्ते खोजिए

1. मुझे उचित शिक्षा लेने का अवसर नही मिला। उचित शिक्षा का अवसर फोर्ड मोटर्स के मालिक हेनरी फोर्ड को भी नही मिला। 2. अत्यंत गरीब घर से हूँ। पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम भी गरीब घर से थे। 3. बचपन मे ही मेरे पिता का देहाँत हो गया था। प्रख्यात संगीतकार ए.आर.रहमान के पिता का भी देहांत बचपन मे हो गया था। 4. मै बचपन से ही अस्वस्थ था। आँस्कर विजेता अभिनेत्री मरली मेटलिन भी बचपन से बहरी व अस्वस्थ थी। 5. मैने साइकिल पर घूमकर आधी ज़िंदगी गुजारी है। निरमा के करसन भाई पटेल ने भी साइकिल पर निरमा बेचकर आधी ज़िंदगी गुजारी। 6. एक दुर्घटना मे अपाहिज होने के बाद मेरी हिम्मत चली गयी। प्रख्यात नृत्यांगना सुधा चन्द्रन के पैर नकली है। 7. मुझे बचपन से मंद बुद्धि कहा जाता है। थामस अल्वा एडीसन को भी बचपन से मंदबुद्धि कहा जाता था। 8. मै इतनी बार हार चूका, अब हिम्मत नही। अब्राहम लिंकन 15 बार चुनाव हारने के बाद राष्ट्रपति बने थे। 9. मुझे बचपन से परिवार की जिम्मेदारी उठानी पङी। लता मंगेशकर को भी बचपन से परिवार की जिम्मेदारी उठानी पङी थी। 10. मेरी लंबाई बहुत कम है। सचिन तेंदुलकर की भी ल...

क्रोध का खांनदान

क्या आपको पता है ? क्रोध का पूरा खांनदान है ! क्रोध की एक लाडली बहन है ! ॥ जिद ॥ क्रोध की पत्नी है ॥ हिंसा ॥ क्रोध का बडा भाई है ॥ अंहकार॥ क्रोध का बाप जिससे वह डरता है ॥ भय ॥ क्रोध की बेटिया हैं ॥ निंदा और चुगली॥ क्रोध का बेटा है ॥ बैर॥ इस खानदान की नकचडी बहू है ॥ ईर्ष्या॥ क्रोध की पोती है ॥ घृणा॥ क्रोध की मां है ॥ उपेक्षा॥ और क्रोध का दादा है ॥ द्वेष॥ तो इस खानदान से हमेशा दूर रहें और हमेशा खुश रहो।

खूबसूरती की परिभाषा

हर किसी को अपनी खूबसूरती पर घमण्ड होता है मै आज आपको खूबसूरती की परिभाषा बताता हूँ खूबसूरत है वो लब जिन पर दूसरों के लिए कोई दुआ आ जाए खूबसूरत है वो दिल जो किसी के दुख मे शामिल हो जाए खूबसूरत है वो जज्बात जो दूसरो की भावनाओं को समज जाए खूबसूरत है वो एहसास जिस मे प्यार की मिठास हो जाए खूबसूरत है वो बातें जिनमे शामिल हों दोस्ती और प्यार की किस्से कहानियाँ खूबसूरत है वो आँखे जिनमे किसी के खूबसूरत ख्वाब समा जाए खूबसूरत है वो हाथ जो किसी के लिए मुश्किल के वक्त सहारा बन जाए खूबसूरत है वो सोच जिस मैं किसी कि सारी ख़ुशी झुप जाए खूबसूरत है वो दामन जो दुनिया से किसी के गमो को छुपा जाए खूबसूरत है वो आंसू जो किसी और के गम मे बह जाए जो दौड़ दौड़ कर भी नहीं मिलता वही संसार है जो बिना दौड़े मिल जाता है वही परमात्मा हैं !

सोचो, समझो, फिर करो

मानव जीवन में उपयोगी तीन ज्ञानवर्ध एवं महत्वपूर्ण बातें !! तीन चीजों को कभी छोटी ना समझे – बीमारी, कर्जा, शत्रु ! तीनों चीजों को हमेशा वश में रखो – मन, काम और लोभ ! तीन चीज़ें कमज़ोर बना देती है – बदचलनी, क्रोध और लालच ! तीन चीज़े असल उद्धेश्य से रोकता हैं – बदचलनी, क्रोध और लालच ! तीन चीज़ें कोई चुरा नहीं सकता – अकल, चरित्र, हुनर ! तीन व्यक्ति वक़्त पर पहचाने जाते हैं – स्त्री, भाई, दोस्त ! तीनों व्यक्ति का सम्मान करो – माता, पिता और गुरु ! तीनों व्यक्ति पर सदा दया करो – बालक, भूखे और पागल ! तीन चीज़े कभी नहीं भूलनी चाहिए - कर्ज़, मर्ज़ और फर्ज़ ! तीन बातें कभी मत भूलें – उपकार, उपदेश और उदारता ! तीन चीज़े याद रखना ज़रुरी हैं – सच्चाई, कर्तव्य और मृत्यु ! तीन बातें चरित्र को गिरा देती हैं – चोरी, निंदा और झूठ ! तीन चीज़ें हमेशा दिल में रखनी चाहिए – नम्रता, दया और माफ़ी ! तीन चीज़ों पर कब्ज़ा करो – ज़बान, आदत और गुस्सा ! तीन चीज़ों से दूर भागो – आलस्य, खुशामद और बकवास ! तीन चीज़ों के लिए मर मिटो – धेर्य, देश और मित्र ! तीन चीज़ें इंसान की अपनी होती ह...

मांस निर्यात के खिलाफ अभियान

विशेष :-प्रतिज्ञा-पत्र में पहचान-पत्र की जानकारी अनिवार्य रूप से दी जाना है। माननीय-सर्वोच्च न्यायालय में याचिका लगाई जाना है। समाज के सभी लोग प्रतिज्ञा-पत्र भरकर अतिशीघ्र आपके यहाँ जो व्यक्ति या समूह प्रयास कर रहा है, उन्हें दे दें। इस महान कार्य में सभी शाकाहारी योगदान दें।

आचार्यश्री विशुद्ध सागर जी

जन्म : १८ दिसम्बर १९७१, जन्म नाम : राजेन्द्र कुमार जैन, जन्मस्थान : भिडं (म.प्र.), माता का नाम : श्री मति रत्तीबाई जैन, पिता का नाम : राम नारायण जी जैन (मुनि श्री विश्वजीत सागर जी), क्षुल्लक दीक्षा : ११ अक्टुबर १९८९ (भिन्ड), ऐलक दीक्षा तिथि : १९ जून १९९१ (पन्ना), ऐलक दीक्षा गुरू : प.पू.गणाचार्य श्री विराग सागर जी महाराज, मुनि दीक्षा: २१ नवंबर १९९१ (श्रेयासं गिरि), दीक्षा नाम : पूज्य मुनि श्री १०८ विशुद्ध सागर जी महाराज मुनि दीक्षा गुरू : प.पू.गणाचार्य श्री विराग सागर जी महाराज, आचार्य पद प्रदाता : प.पू. मुनि श्री १०८ विशुद्ध सागर जी महाराज को परम पूज्य आचार्य श्री १०८ विराग सागर जी के कर कमलो से ३१ मार्च २००७ को मुनि दीक्षा के १५ वर्ष ६ माह बाद ३५ वर्ष की आयु में दिनांक ३१ मार्च २००७ को आचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया गया। चैतन्य कृतियाँ: मुनिश्री १०८ मनोज्ञसागर जी, मुनिश्री १०८ प्रमेयसागर जी, मुनिश्री १०८ प्रशमसागर जी, मुनिश्री १०८ प्रत्यक्षसागर जी(समाधी ), मुनिश्री १०८ सुप्रभसागर जी, मुनिश्री १०८ सुव्रतसागर जी, मुनिश्री १०८ सुयशसागर जी, मुनिश्री १०८ अनुत्तर सागर जी, मुनिश्...

प्रमुख जैन तीर्थ: गुजरात तथा दक्षिण

तारंगा: गुजरात में स्टेशन तारंगाहिल से 3 मील दूर पहाड़ पर यह क्षेत्र है। यहाँ से वरदत्तादि साढ़े तीन करोड़ मुनि मोक्ष गए हैं। गिरिनार: काठियावाड़ में जूनागढ़ स्टेशन से 4 5 मील की दूरी पर गिरिनार पर्वत की तलहटी है। पहाड़ पर 7000 सीढ़ियों का चढ़ाव है। यहाँ से नेमिनाथ स्वामी तथा 72 करोड़ 700 मुनि मोक्ष गए हैं। शत्रुंजय: पालीताना स्टेशन से 2 मील पर। यहाँ से युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन तथा 8 करोड़ मुनि मोक्ष गए हैं। पावागढ़: बड़ौदा से 28 मील की दूरी पर यह क्षेत्र है। यहाँ से लव, कुश आदि पाँच करोड़ मुनि मोक्ष गए हैं। माँगीतुंगी: मनमाड़ स्टेशन से 70 मील पर घने जंगल में पहाड़ पर यह क्षेत्र है। यहाँ से रामचंद्र, सुग्रीव, गवय, गवाक्ष, नील आदि 99 करोड़ मुनि मोक्ष गए हैं। गजपन्था: नासिक रोड स्टेशन से 9 मील नसरुल ग्राम के पास। यहाँ से बलभद्र आदि आठ करोड़ मुनि मोक्ष गए हैं। कुंथलगिरि: वार्सी टाउन रेलवे स्टेशन से 21 मील दूरी पर। यहाँ से देशभूषण, कुलभूषण मुनि मोक्ष गए हैं। Source: http://en.wikipedia.org

प्रमुख जैन तीर्थ: राजस्थान

श्री महावीरजी: पश्चिम रेलवे की नागदा-मथुरा लाइन पर श्री महावीरजी स्टेशन है। यहाँ से 4 मील पर क्षेत्र है। भगवान महावीर की अतिमनोज्ञ प्रतिमा पास के ही एक टीले के अंदर से निकली थी। चाँदखेड़ी : कोटा के निकट खानपुर नाम का एक प्राचीन नगर है। खानपुर से 2 फर्लांग की दूरी पर चाँदखेड़ी नाम की पुरानी बस्ती है। यहाँ भूगर्भ में एक अतिविशाल जैन मंदिर है एवं अनेक विशाल जैन प्रतिमाएँ हैं। पद्मपुरी: स्टेशन श्योदापुर। भगवान पद्मप्रभु की अतिशयपूर्ण भव्य और मनोज्ञ प्रतिमा के अतिशय के कारण इस क्षेत्र का नाम पद्मपुरी पड़ा है। केसरियानाथ: उदयपुर स्टेशन से 40 मील पर। यहाँ ऋषभदेव स्वामी का विशाल मंदिर है। यहाँ भारत के सभी तीर्थों से अधिक केसर भगवान को चढ़ती है। इसी से इसका नाम केसरियानाथ है। सोनीजी की णसियन (अजमेर जैन मन्दिर): यह स्‍थापत्‍य कला की दृष्टि से एक भव्य जैन मन्दिर है। इसका निर्माण १९वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में हुआ। Source: http://en.wikipedia.org

प्रमुख जैन तीर्थ: उत्तरप्रदेश

वाराणसी: इस नगर में भदैनीघाट सातवें तीर्थंकर भगवान सुपार्श्वनाथ का जन्म स्थान है। भेलुपुर में तेईसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ की जन्मभूमि है। शहर में अन्य कई मंदिर दर्शनीय हैं। सिंहपुरी: बनारस से 7 मील। यहाँ श्रेयांसनाथ भगवान के गर्भ, जन्म, तप से तीन कल्याणक हुए। चंद्रपुरी: बनारस से 13 मील अथवा सारनाथ से 7 मील पर गंगा किनारे। यहाँ पर चंद्रप्रभु भगवान का जन्म हुआ था। प्रयाग: यहाँ त्रिवेणी संगम के पास एक पुराना किला है। किले के भीतर जमीन के अंदर एक अक्षय वट (बड़ का पेड़) है। कहते हैं कि श्री ऋषभदेव ने यहाँ तप किया था। अयोध्या: आदिनाथ, अजितनाथ, अभिनन्दननाथ, सुमतिनाथ, अनन्तनाथ का जन्म स्थान। रत्नपुरी: फैजाबाद जिले में सोहावल स्टेशन से डेढ़ मील। धर्मनाथ स्वामी के चार कल्याणक हुए हैं। श्रावस्ती: बहराइच से 29 मील। यह भगवान संभवनाथ की पवित्र जन्मभूमि है और यहीं 4 कल्याणक हुए हैं। कौशाम्बी: प्रयाग से 32 मील पर फफौसा ग्राम के पास। यहाँ पर पद्मप्रभु स्वामी के चार कल्याणक हुए हैं। कम्पिला: कानपुर कासगंज लाइन पर। कायमगंज स्टेशन से 8 मील। यहाँ विमलनाथ स्वाम...

प्रमुख जैन तीर्थ: मध्यप्रदेश, बुंदेलखंड

सोनागिरि: ग्वालियर झाँसी लाइन पर सोनागिरि स्टेशन से 2 मील श्रमणाचल पर्वत है। पहाड़ पर 77 दिगंबर जैन मंदिर हैं। वहाँ से नंगानंगकुमार आदि साढ़े पाँच सौ करोड़ मुनि मोक्ष गए हैं। पपौरा: ललितपुर से 36 मील और टीकमगढ़ से 3 मील है। चारों ओर कोट बना है। यहाँ लगभग 90 मंदिर हैं। कार्तिक सूदी 14 को मेला भरता है। चन्देरी: ललितपुर से 24 मील। वहाँ से मोटर जाती है। यहाँ की चौबीसी भारतवर्ष में प्रसिद्ध है। पचराई:चन्देरी से 24 मील खनियाधाना स्थान है। वहाँ से 8 मील पर पचराई गाँव है। यहाँ पर 28 जिन मंदिर हैं। थूबौन: चन्देरी से आठ मील। यहाँ 25 मंदिर हैं। भगवान शांतिनाथ की 20 फुट उत्तुंग मूर्ति अपनी विशालता के लिए प्रसिद्ध है। अतरिक्ष पार्श्वनाथ: सेंट्रल रेलवे के अकोला (बरार) स्टेशन से लगभग 40 मील पर शिवपुरी नाम का गाँव है। गाँव के मध्य धर्मशालाओं के बीच में एक बहुत बड़ा प्राचीन विशाल दुमंजिला जैन मंदिर है। नीचे की मंजिल में एक श्यामवर्ण ढाई फुट ऊँची पार्श्वनाथजी की प्राचीन प्रतिमा है। जो वेदी के ऊपर अधर में विराजमान है। खजुराहो: मध्यप्रदेश में छतरपुर से 7 मील। यह एक छोटा सा गाँव है। 31 दि...

प्रमुख जैन तीर्थ: उड़ीसा, कर्नाटक

खण्डगिरि: उड़ीसा में भुवनेश्वर स्टेशन से 4 मील पर खण्डगिरि और उदयगिरि नाम की दो पहाड़ियाँ हैं। यहीं से कलिंग देश के 500 मुनि मोक्ष गए हैं। मूडबिद्री: कारकल से दस मील पर यह एक अच्छा कस्बा है। यहाँ 18 मंदिर हैं। यहाँ के मंदिरों में हीरा, पन्ना, पुखराज, मूँगा, नीलम की मूर्तियाँ हैं। कर्कला: भगवान बाहुबली (जिन्हें गोमतेश्वर भी कहा जाता है) की विशाल मूर्ति 45 फीट ऊंची है। इसका वजन 80 टन है। यह मूर्ति विजयनगर के शासको के भैरासा सामंतो द्वारा 1432 ई. में स्थापित की गई थी। श्रवणबेलगोला: हासन जिले के अंतर्गत यह क्षेत्र है। हासन से मोटर जाती है। श्रवणबेलगोला में चंद्रगिरि और विन्ध्यगिरि नाम की दो पहाड़ियाँ पास पास हैं। पहाड़ पर 57 फुट ऊँची बाहुबलि की प्रतिमा विराजमान है। हर 12 वर्ष बाद महामस्तकाभिषेक होता है। Source: http://en.wikipedia.org

प्रमुख जैन तीर्थ: बिहार, झारखण्ड

सम्मेद शिखर: पूर्वी रेलवे के पारसनाथ अथवा गिरीडीह स्टेशन से पहाड़ की तलहटी मधुवन तक क्रमशः 14 और 18 मील है। इस क्षेत्र से 20 तीर्थंकर एवं असंख्य मुनि मोक्ष गए हैं। पहाड़ की चढ़ाई उतराई तथा यात्रा करीब 18 मील की है। पारसनाथ हिल और गिरीडीह से बस शिखरजी जाने के लिए मिलती है। कुलुआ पहाड़: यह पहाड़ जंगल में है। गया से जाया जाता है। इसकी चढ़ाई 2 मील है। इस पहाड़ पर 10वें तीर्थंकर शीतलनाथजी ने तप करके कैवल्य ज्ञान प्राप्त किया था। गुणावा: पटना जिले के नवादा स्टेशन से डेढ़ मील। यहाँ से गौतम स्वामी मोक्ष गए हैं। पावापुरी: बिहार के स्टेशन बिहार शरीफ से 12 मील। नवादा से मोटर भी जाती है। यहाँ से महावीर स्वामी कार्तिक कृष्ण 30 को मोक्ष गए हैं। यहाँ का जल मंदिर दर्शनीय है। उसी में भगवान के चरणचिह्न स्थित हैं। राजगृही: बिहार प्रांत में स्टेशन राजगिरि कुंड से 4 मील अथवा बिहार शरीफ से 24 मील। यहाँ विपुलाचल, सोनागिरि, रत्नागिरि, उदयगिरि, वैभारगिरि ये पंच पहाड़ियाँ प्रसिद्ध हैं। इन पर 23 तीर्थंकरों का समवशरण आया था तथा कई मुनि मोक्ष भी गए हैं। (यह राजा श्रेणिक की राजधानी थी)। ...

भक्तामर स्त्रोत (हिंदी)

1.झुके हुए भक्त देवो के मुकुट जड़ित मणियों की प्रथा को प्रकाशित करने वाले, पाप रुपी अंधकार के समुह को नष्ट करने वाले, कर्मयुग के प्रारम्भ में संसार समुन्द्र में डूबते हुए प्राणियों के लिये आलम्बन भूत जिनेन्द्रदेव के चरण युगल को मन वचन कार्य से प्रणाम करके (मैं मुनि मानतुंग उनकी स्तुति करुँगा)| 2. सम्पूर्णश्रुतज्ञान से उत्पन्न हुई बुद्धि की कुशलता से इन्द्रों के द्वारा तीन लोक के मन को हरने वाले, गंभीर स्तोत्रों के द्वारा जिनकी स्तुति की गई है उन आदिनाथ जिनेन्द्र की निश्चय ही मैं (मानतुंग) भी स्तुति करुँगा| 3. देवों के द्वारा पूजित हैं सिंहासन जिनका, ऐसे हे जिनेन्द्र मैं बुद्धि रहित होते हुए भी निर्लज्ज होकर स्तुति करने के लिये तत्पर हुआ हूँ क्योंकि जल में स्थित चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को बालक को छोड़कर दूसरा कौन मनुष्य सहसा पकड़ने की इच्छा करेगा? अर्थात् कोई नहीं| 4. हे गुणों के भंडार! आपके चन्द्रमा के समान सुन्दर गुणों को कहने लिये ब्रहस्पति के सद्रश भी कौन पुरुष समर्थ है? अर्थात् कोई नहीं| अथवा प्रलयकाल की वायु के द्वारा प्रचण्ड है मगरमच्छों का समूह जिसमें ऐसे समुद्र को भुजाओं के...

भक्तामर स्त्रोत (आचार्य श्री मानतुंग)

भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा- मुघोतकं दलित-पाप-तमो-वितानम्। सम्यक्-प्रणम्य जिन-पाद-युगं  युगादा- वालम्बनं भव-जले पततां   जनानाम् ||1|| यः संस्तुतः सकल-वाड्मय-तत्व-बोधा- दुद् भूत-बुद्धि-पटुभिः सुर-लोक-नाथेः | स्तोत्रैर्जगत् त्रितय-चित-हरैरुदारेः स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रनम् ||2|| बुद्धया विनापि विबुधार्चित-पाद-पीठ स्तोतुं समुधत-मतिर्विगत-त्रपोऽहम् | बालं विहाय जल-संस्थितमिन्दु-विम्ब- मन्यः क इच्छति जनः सहसा ग्रहितुम् ||3|| वक्तुं गुणान्गुण-समुद्र शशाड्क-कान्तान् कस्ते क्षमः सुर-गुरु-प्रतिमोऽपि बुद्धया| कल्पान्त-काल-पवनोद्ध-नक्र-चक्रं को वा तरीतुमलमम्बुनिधिं भुजाभ्याम् ||4||      सोऽहं तथापि तव भक्ति-वशान्मुनीश कतुं स्तवं विगत-शक्तिरपि प्रवृत्तः| प्रीत्यात्मवीर्यमविचार्य मृगो मृगेन्द्रं नाभ्येति किं निज-शिशोः परिपालनार्थम् ||5|| अल्प-श्रुतं श्रुतंवतां परिहास-धाम त्वद् भक्तिरेव मुखरीकुरुते बलान्माम् | यत्कोकिलः किल मधौ मधुरं विरौति तच्चाम्र-चारु-कलिका-निकरैक-हेतुः||6|| त्वत्संस्तवेन भव-सन्तति-सन्निबद्धं पापं क्षणात्...
फीडबैक दें