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Showing posts from April, 2015

आज का आदमी

आज का आदमी  आश्रय देने पर सिर चढ़ जाता है, उपदेश देने पर मुडक़र बैठता हैं, उपकार करने पर अस्वीकार करता हैं, क्षमा करने पर दुर्बल समझता हैं, आदर करने पर खुशामद समझता हैं, विश्वास करने पर हानि पहुँचता हैं, प्यार करने पर आघात करता हैं, क्या यह चरित्र उचित हैं।  

६ मन्त्र

अगर पूजा कर रहे हो तो विश्वास करना सीखो। बोलने से पहले सुनना सीखो। अगर खर्च करना है तो कमाना सीखो। अगर लिखना है तो सोचना सीखो। हार मानने से पहले फिर से कोशिश करना सीखो। मरने से पहले खुल के जीना सीखो।

अपना रास्ता

अपना रास्ता बनाने से पहले आपको कई वर्षो तक दूसरों के बनाये रास्ते पर ही चलना होता हैं।  #एककटुसत्य

मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी

पूर्व नाम: श्री जय कुमार जैन पिता: श्री रूपचन्द्र जैन माता: श्रीमती शन्तिबाई जैन जन्म स्थान: ईशुरवारा (जिला सागर म०प्र०) जन्म तिथि: मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी (मोक्ष सप्तमी), सम्वत २०१५ तदनुसार दिनांक: २१ अगस्त १९५८ दिन गुरुवार शिक्षा: बी.कॉम।  भ्राता: २ (ज्येष्ठ श्री ऋषभ कुमार जैन, कनिष्ठ श्री ज्ञान चन्द्र जैन) भगिनी: २ (निरंजना, कंचनमाला) विवाह: नहीं किया (आजन्म बाल ब्रम्हचारी) ब्रम्हचर्य व्रत आचार्य श्री १०८ विद्यासगर जी महाराज से श्री दिगम्बर जैन सिद्ध क्षेत्र नैनागिर जी में १९ अक्तूबर १९७८ क्षुल्लक दीक्षा: १० जनवरी १९८० को नैनागिर में आचार्य श्री १०८ विद्यासागर जी महाराज जी से और नाम पाया क्षुल्लक श्री परमसागर। एलक दीक्षा: १५ अप्रेल १९८२ को सागर म०प्र० में भगवान महावीर जयन्ती के पावन दिन आचार्य श्री १०८ विद्यासागर जी महाराज से। मुनि दीक्षा: अश्विन क्रष्ण त्रतीया तदनुसार दिनाँक २५ सितम्बर १९८३ को ईसरी (जिला गिरिडीह बिहार) में आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से परम जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण की और नाम पाया मुनि श्री सुधासागर जी महाराज...

राष्ट्रसंत मुनि श्री पुलक सागरजी

पूर्व नाम : श्री पारस जैन जन्म दिनांक : ११ मई १९७० जन्म स्थल : धाम्त्री, छत्तीसगढ़  पिताजी का नाम : श्री भिकमचंद जैन  माताजी का नाम : श्रीमती गोपी बाई जैन  शिक्षण : बेचलर ऑफ़ आर्ट्स (जबलपुर)  ब्रह्मचर्य व्रत (ग्रह त्याग) : २७ जनवरी १९९३  ब्रह्मचर्य : आचार्य श्री विद्या सागरजी महाराज ऐलक दीक्षा : २७ जनवरी १९९४ दीक्षा स्थल : ग्वालियर म.प्र मुनि दीक्षा : 11 दिसंबर १९९५ दीक्षा स्थल : कानपूर यू.पी दीक्षा गुरु : आचार्य श्री पुष्पदंत सागरजी महाराज  चातुर्मास :  मेरठ, भोलानाथ नगर, सहारनपुर, नविन शाहदरा, आगरा, ग्वालियर, जयपुर, इंदौर, नागपुर, मुंबई, मध्यप्रदेश।

मेरी भावना

जिसने राग द्वेष कामादिक जीते सब जग जान लिया सब जीवोको मोक्षमार्ग का निस्पृह हो उपदेश दिया बुध्ध, वीर, जिन, हरि, हर, ब्रम्हा, या उसको स्वाधीन कहो भक्ति-भाव से प्रेरित हो यह चित्त उसी में लीन रहो ||1|| विषयो की आशा नहि जिनके साम्य भाव धन रखते हैं निज परके हित-साधन में जो निश दिन तत्पर रहते हैं स्वार्थ त्याग की कठिन तपस्या बिना खेद जो करते हैं ऐसे ज्ञानी साधू जगत के दुःख समूह को हारते हैं ||2|| रहे सदा सत्संग उन्ही का ध्यान उन्ही का नित्य रहे हैं उन्ही जैसी चर्या में यह चित्त सदा अनुरक्त रहे हैं नहीं सताऊ किसी जीव को झूठ कभी नहीं कहा करू परधन वनिता पर न लुभाऊ, संतोशामृत पीया करू ||3|| अहंकार का भाव न रखु नहीं किसी पर क्रोध करू देख दुसरो की बढती को कभी न इर्ष्या भाव धरु रहे भावना ऐसी मेरी, सरल सत्य व्यव्हार करू बने जहा तक जीवन में, औरो का उपकार करू||4|| मंत्री भाव जगत में मेरा सब जीवो से नित्य र...

अहिंसा परमो धर्मः

चौबीस चरण वंदना: श्री सम्मेद शिखर जी

आधा जीना और मरना

जीना हो तो पूरा जीना, मरना हो तो पूरा मारना, बहुत बड़ा कष्ट जगत में, आधा जीना और आधा मरना !

जरा सोचिये ?

पहले दरवाजे के बाहर लिखा जाता था अतिथि देवों भव फिर लिखा जाने लगा शुभ लाभ अब लिखा जाता हैं कुत्तों से सावधान जरा सोचिये ? हम किस तरफ बढ़ रहे हैं !

सूक्तियाँ

1.निंदा उनकी होती है, जो दूसरों की प्रशंसा नहीं करते। 2. जो दूसरों पर निर्भर रहता है, वह सबसे बड़ा कायर और भिखारी हैं। 3. बड़े लोग अहंकार नहीं करते और अहंकारी कभी बड़े नहीं हो सकते।

अच्छा इंसान वही बन सकता है

निम्न बातों को अपने जीवन में उतारने की कोशिश करे । अपनी भूल-चूक स्वीकारें। दूसरों के सामने अपना दुखड़ा न रोते रहें। नम्रता एवं कृतज्ञता से व्यवहार करें। प्रशंसा औ मान-सम्मान की अपेक्षा न करें। अपनी तुलना श्रेष्ठ लोगों से करें। अपनी श्रेष्ठता जताने के लिए अनुभूति न बताएं। ‘मैं’ और ‘मेरा’ कहने से बचें। परिजनों के साथ स्वेच्छा से नहीं, परेच्छा से व्यवहार करें। दूसरों को सिखाने की जगह दूसरों से सीखने का प्रयास करें।

एक बात हमेशा याद रखना

मंदिर बनाना, मस्जिद बनाना, अस्पताल बनाना, गुरुद्वारा बनाना, चर्च बनाना, स्कूल बनाना लेकिन कभी वृद्धा आश्रम  मत बनाना, अपने माता पिता को हमेशा दिल से लगाकर रखना।

जीओ और जीने दो

जीओ और जीने दो के सिद्धांत वाला अपना जैन धर्म अहिंसा प्रधान, कर्म प्रधान धर्म हैं, सत्कर्मो के द्वारा भाग्य बदला जा सकता हैं। - जैनम्

सबसे बड़ी दस बातें

सर्वोत्तम दिन - आज। सबसे उपयुक्त समय - अभी। सबसे बड़ी आवश्यकता - सामान्य ज्ञान। सबसे विश्वसनीय मित्र - अपना हाथ। सबसे बड़ा पाप - भय। सबसे बड़ी भूल - समय का अपव्यय। सबसे बड़ी बाधा - अधिक बोलना। सबसे बुरी भावना - ईर्ष्या। सबसे बड़ा दरिद्र - उत्साहहीन। सबसे बड़ा भाग्यशाली - कायर्रत।

शीतलनाथ जी

पिता: दृढरथ माता: सुनन्दा वंश: इक्ष्वाकु जन्म: भद्रिकापुरी निर्वाण: सम्मेद शिखर रंग: सुनहरा चिन्ह: कल्पवृक्ष ऊंचाई: ९० धनुष (२७० मीटर) आयु: १,००,००० पूर्व (७.०५६ × १०१८ वर्ष) शीतलनाथ जी दसवें तीर्थंकर है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

पूर्व नाम : श्री विद्याधरजी पिता श्री : श्री मल्लप्पाजी अष्टगे (मुनिश्री मल्लिसागरजी) माता श्री : श्रीमती श्रीमंतीजी (आर्यिकाश्री समयमतिजी) भाई/बहन : चार भाई, दो बहन जन्म स्थान : चिक्कोड़ी (ग्राम-सदलगा के पास), बेलगाँव (कर्नाटक) जन्म तिथि : आश्विन शुक्ल पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा) वि.सं. २००३, १०-१०-१९४६, गुरुवार, रात्रि में १२:३० बजे जन्म नक्षत्र : उत्तरा भाद्र शिक्षा : ९वीं मैट्रिक (कन्नड़ भाषा में) ब्रह्मचर्य व्रत : श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र, चूलगिरि (खानियाजी), जयपुर (राजस्थान) प्रतिमा : सात (आचार्यश्री देशभूषणजी महाराज से) स्थल : १९६६ में श्रवण बेलगोला, हासन (कर्नाटक) मुनि दीक्षा स्थल : अजमेर (राजस्थान) मुनि दीक्षा तिथि : आषाढ़, शुक्ल पंचमी वि.सं., २०२५, ३०-०६-१९६८, रविवार आचार्य पद तिथि : मार्गशीर्ष कृष्ण द्वितीया-वि.सं. २०२९, दिनांक २२-११-१९७२, बुधवार आचार्य पद स्थल : नसीराबाद (राजस्थान) में, आचार्यश्री ज्ञानसागरजी ने अपना आचार्य पद प्रदान किया। मातृभाषा : कन्नड़

सुविचार

दुनिया का गरीब आदमी मंदिर के बाहर भीख मांगता हैं ! और दुनिया का अमीर आदमी मंदिर के अंदर भीख मांगता !!

काल में इतनी शक्ति हैं

किसी भी मनुष्य की वर्तमान स्थिति देखकर उसके भविष्य का मजाक मत उड़ाओ। क्योंकि काल में इतनी शक्ति हैं कि वो एक साधारण से कोयले को भी धीरे-धीरे हीरे में बदल देता हैं।

सीमा में रहना सीखों

सीमित खाने वाला, सीमित बोलने वाला, सीमा में कमाने और खर्च करने वाला, कभी परेशान नहीं होता, अत: सीमा में रहना सीखों। - आ. श्री विद्यासागर जी महाराज

सुविचार

धर्म से कर्म इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि धर्म करके भगवान से मांगना पड़ता हैं जबकि कर्म करने से भगवान को खुद ही देना पड़ता हैं। - जैनम्

सम्मान

श्रध्दा जान देती है नम्रता मान देती है योग्यता स्थान देती है तीनों मिल जाएं तो सम्मान देती हैं।   - जैनम्

पुष्पदन्त जी

पिता: सुग्रीव माता: रामा वंश: इक्ष्वाकु जन्म: काकंदी निर्वाण: सम्मेद शिखर रंग: सफ़ेद चिन्ह: मगर ऊंचाई: १०० धनुष (३०० मीटर) आयु: २,००,००० पूर्व (१४.११२ × १०१८ वर्ष) पुष्पदन्त जी, जो सुविधिनाथ के नाम से भी जाने जाते हैं, नवें तीर्थंकर है

चंद्रप्रभ जी

पिता: महासेन माता: लक्ष्मणा वंश: इक्ष्वाकु जन्म: चन्द्रपुरी निर्वाण: सम्मेद शिखर रंग: सफ़ेद चिन्ह: चंद्रमा ऊंचाई: १५० धनुष (४५० मीटर) आयु: १०,००,००० पूर्व (७०.५६ × १०१८ वर्ष) चंद्रप्रभ जी आठवें तीर्थंकर है।

सुपार्श्वनाथ जी

पिता: सुप्रतिष्ठ माता: पृथ्वी वंश: इक्ष्वाकु जन्म: काशी (बनारस) निर्वाण: सम्मेद शिखर रंग: सुनहरा चिन्ह: स्वास्तिक ऊंचाई: २०० धनुष (६०० मीटर) आयु: २०,००,००० पूर्व (१४१.१२ × १०१८ वर्ष) सुपार्श्वनाथ जी सातवें तीर्थंकर है !

जैन किसे कहते हैं ?

'जैन' कहते हैं उन्हें, जो 'जिन' के अनुयायी हों। 'जिन' शब्द बना है 'जि' धातु से। 'जि' माने-जीतना। 'जिन' माने जीतने वाला। जिन्होंने अपने मन को जीत लिया, अपनी वाणी को जीत लिया और अपनी काया को जीत लिया, वे हैं 'जिन'। जैन धर्म अर्थात 'जिन' भगवान्‌ का धर्म।

गणधर स्वामी

गणधर जैन धर्मानुयायियों में प्रचलित एक उपाधि है। जो अनुत्तर, ज्ञान और दर्शन आदि धर्म के गण को धारण करता है वह गणधर कहा जाता है। इसको तीर्थंकर के शिष्यों के अर्थ में ही विशेष रूप से प्रयोग किया जाता है। गणधर को द्वादश अंगों में पारंगत होना आवश्यक है। प्रत्येक तीर्थंकर के अनेक गणधर कहे गए है। भगवान महावीर स्वामी के 11 गणधर थे। उनके नाम, गोत्र और निवासस्थान इस प्रकार हैं: 1. इंद्रभूति गोतम (गोर्वरग्राम) 2.अग्निभूति गोतम (गोर्वरग्राम) 3.वायुभूति गोतम (गोर्वरग्राम) 4. व्यक्त भारद्वाज कोल्लक (सन्निवेश) 5. सुधर्म अग्निवेश्यायन कोल्लक (सन्निवेश) 6. मंडिकपुत्र वाशिष्ठ मौर्य (सन्निवेश) 7.भौमपुत्र कासव मौर्य (सन्निवेश) 8. अकंपित गोतम (मिथिला) 9. अचलभ्राता हरिभाण (कोसल) 10.मेतार्य कौंडिन्य तुंगिक (सन्निवेश) 11.प्रभास कौंडिन्य (राजगृह) ये सभी ब्राह्मण थे। इससे ऐसा जान पड़ता है कि भगवान महावीर स्वामी के समय में ब्राह्मणों में ही वैचारिक क्रांति का आरंभ हुआ था। 

अहिंसा का सामान्य अर्थ

अहिंसा का सामान्य अर्थ है 'हिंसा न करना'। इसका व्यापक अर्थ है - किसी भी प्राणी को तन, मन, कर्म, वचन और वाणी से कोई नुकसान न पहुँचाना। मन मे किसी का अहित न सोचना, किसी को कटुवाणी आदि के द्वार भी नुकसान न देना तथा कर्म से भी किसी भी अवस्था में, किसी भी प्राणी कि हिंसा न करना, यह अहिंसा है। जैन धर्म में अहिंसा का बहुत महत्त्व है। अहिंसा परमो धर्म: (अहिंसा परम सबसे बड़ा) धर्म कहा गया है। आधुनिक काल में महात्मा गांधी ने भारत की आजादी के लिये जो आन्दोलन चलाया वह काफी सीमा तक अहिंसात्मक था।

अगर आप हैं।

अगर आप सास हैं तो अपनी बहु को इतना प्रेम दें, इतना प्रेम दें कि बहु अपने पीहर के फ़ोन नंबर ही भूल जाये। अगर आप बहु हैं तो अपनी सास को इतना आदर करें की सास अपनी बेटी का नाम लेना ही भूल जाये। अगर आप बाप हैं तो अपने बेटे को ऐसे संस्कार दें, ऐसे संस्कार दें कि आपके नाम की पहचान उसके नाम से हो। अगर आप बेटे हैं तो ऐसा जीवन जीये, ऐसा जीवन जीये की दुनियां तुम्हारे माँ बाप से पूछे की आखिर किस तपस्या के फल से तुमने ऐसा होनहार बेटा पाया है। जय जिनेन्द्र©

पदम प्रभु जी

पिता: श्रीधर माता: सुसीमा वंश: इक्ष्वाकु जन्म: कौशाम्बी निर्वाण: सम्मेद शिखर रंग: लाल चिन्ह: कमल ऊंचाई: २५० धनुष (७५० मीटर) आयु: ३०,००,००० पूर्व (२११.६८ × १०१८ वर्ष) पद्मप्रभ जी छटवें तीर्थंकर है।

सुमतिनाथ जी

जन्म: चैत्र शु० ११ जन्म: अयोध्या निर्वाण: सम्मेद शिखर निर्वाण: चैत्र शु० १० पिता: मेघरथ माता: सुमंगला वंश: इक्ष्वाकु रंग: सुनहरा चिन्ह: चकवा ऊंचाई: ३०० धनुष (९०० मीटर) आयु: ४०,००,००० पूर्व (२८२.२४ × १०१८ वर्ष) सुमतिनाथ जी पांचवें तीर्थंकर है।

अभिनंदन जी

जन्म: माघ शु० १२ जन्म स्थान: अयोध्या पिता: सन्वर माता: सिद्धार्था वंश: इक्ष्वाकु निर्वाण: बैशाख शु० ७ निर्वाण स्थान: सम्मेद शिखर निशान: बन्दर रंग: सुनहरा ऊंचाई: ३५० धनुष (१०५० मीटर) आयु: ५०,००,००० पूर्व (३५२.८ × १०१८ वर्ष) अभिनंदन जी चतुर्थ तीर्थंकर है।

संभवनाथ जी

जन्म - कार्तिक शु० पू० जन्म स्थान: श्रावस्ती पिता: राजा जितारी माता: सेना रानी वंश: इक्ष्वाकु निर्वाण: चैत्र शु० ६ निर्वाण स्थान: सम्मेद शिखर निशान: घोडा रंग: सुनहरा चिन्ह: घोड़ा ऊंचाई: ४०० धनुष (१२०० मीटर) आयु: ६०,००,००० पूर्व (४२३.३६० × १०१८ वर्ष) संभवनाथ जी तीसरे तीर्थंकर है।

अजितनाथ जी

जन्म: माघ शु० १० जन्म स्थान: अयोध्या नगरी पिता: राजा जितशत्रु माता: विजयादेवी वंश: इक्ष्वाकु निर्वाण: चैत्र शु ५ निर्वाण: स्थान सम्मेद शिखर् निशान: हाथी रंग: सुनहरा चिह्न: हाथी ऊंचाई: ४५० धनुष (१३५० मीटर) आयु: ७२,००,००० पूर्व (५०८.०३२ × १०१८ वर्ष) अजितनाथ जी द्वितीय तीर्थंकर है !

ऋषभदेव जी

जन्म: चैत्र कृष्ण ९ जन्म स्थान: अयोध्या अन्य नाम: आदिनाथ, ऋषभनाथ, वृषभनाथ माता: महारानी मरूदेवी पिता: महाराज नाभिराय निर्वाण: माघ कृष्ण १४ निर्वाण स्थल: श्री कैलाश पर्वत् निशान: वृषभ या बैल रंग: सुनहरा ऊंचाई: ५०० धनुष (१५०० मीटर) आयु: ८,४००,००० पूर्व (५९२.७०४ × १०१८ वर्ष) ऋषभदेव प्राचीन भारत के एक सम्राट थे, जो कि जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर हैं। इनके पुत्र भरत के नाम पर ही भारत का नाम भारतवर्ष पड़ा। ऋषभदेव जी को भगवान आदिनाथ के नाम से भी जाना जाता है। भगवान ऋषभदेव जी की विश्व की सबसे बडी प्रतिमा बडवानी (मध्यप्रदेश) (भारत) के पास बावनगजा मे है। यह ८४ फीट की है।

आचार्यश्री से दीक्षित आर्यिकायें

परम पूज्य संत शिरोमणि आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज से दीक्षित 172 आर्यिकाओं के नाम की लिस्ट क्रमशः देखें :- 1. आर्यिका गुरुमति जी 2. आर्यिका दृढमति जी 3. आर्यिका मृदुमति जी 4. आर्यिका ऋजुमति जी 5. आर्यिका तपोमति जी 6. आर्यिका सत्यमति जी 7. आर्यिका गुणमति जी 8. आर्यिका जिनमति जी 9. आर्यिका निर्णयमति जी 10. आर्यिका उज्ज्वलमति जी 11. आर्यिका पावनमति जी 12. आर्यिका प्रशांतमति जी 13. आर्यिका पूर्णमति जी 14. आर्यिका अनंतमति जी 15. आर्यिका विमलमति जी 16. आर्यिका शुभ्रमति जी 17. आर्यिका कुशलमति जी 18. आर्यिका निर्मलमति जी 19. आर्यिका साधुमति जी 20. आर्यिका शुक्लमति जी 21. आर्यिका साधनामति जी 22. आर्यिका विलक्षणामति जी 23. आर्यिका धारणामति जी 24. आर्यिका प्रभावनामति जी 25. आर्यिका भावनामति जी 26. आर्यिका चिंतनमति जी 27. आर्यिका वैराग्यमति जी 28. आर्यिका अदर्शमति जी 29. आर्यिका दुर्लभमति जी 30. आर्यिका अंतरमति जी 31. आर्यिका अविचलमति जी 32. आर्यिका अनुनयमति जी 33. आर्यिका अनुग्रहमति जी 34. आर्यिका अक्षयमति जी 35. आर्यिका अमूर्तमति जी 36. आर्यिका अखंडमति ज...

आचार्यश्री से दीक्षित मुनिराज

परम पूज्य संतशिरोमणि आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज से दीक्षित -117 मुनिराजो के नाम की लिस्ट क्रमशः देखेँ- 1-मुनिश्री समयसागर जी 2-मुनिश्री योगसागर जी 3-मुनिश्री नियमसागर जी 4-मुनिश्री चेतनसागर जी 5-मुनिश्री ओमसागर जी 6-मुनिश्री क्षमासागर जी* 7-मुनिश्री गुप्तिसागर जी 8-मुनिश्री संयमसागर जी 9-मुनिश्री सुधासागर जी 10-मुनिश्री समतासागर जी 11-मुनिश्री स्वभावसागर जी 12-मुनिश्री समाधिसागर जी 13-मुनिश्री सरलसागर जी 14-मुनिश्री वैराग्यसागर जी 15-मुनिश्री प्रमाणसागर जी 16-मुनिश्री आर्जवसागर जी 17-मुनिश्री मार्दवसागर जी 18-मुनिश्री पवित्रसागर जी 19-मुनिश्री उत्तमसागर जी 20-मुनिश्री चिन्मयसागर जी 21-मुनिश्री पावनसागर जी 22-मुनिश्री सुखसागर जी 23-मुनिश्री अपूर्वसागर जी 24-मुनिश्री प्रशांतसागर जी 25-मुनिश्री निर्वेगसागर जी 26-मुनिश्री विनीतसागर जी 27-मुनिश्री निर्णयसागर जी 28-मुनिश्री प्रबुद्धसागर जी 29-मुनिश्री प्रवचनसागर जी 30-मुनिश्री पुण्यसागर जी 31-मुनिश्री पायसागर जी 32-मुनिश्री प्रसादसागर जी 33-मुनिश्री अभयसागर जी 34-मुनिश्री अक्षयसागर जी 35-मुनिश्री प्र...

चौबीस तीर्थंकर

क्र सं  तीर्थंकार जन्म नगरी माता का नाम पिता का नाम चिह्न १ ऋषभदेव जी अयोध्या मरूदेवी नाभिराजा बैल २ अजितनाथ जी अयोध्या विजया जितशत्रु हाथी ३ सम्भवनाथ जी श्रावस्ती सेना जितारी घोड़ा ४ अभिनन्दन जी अयोध्या सिद्धार्था संवर बन्दर ५ सुमतिनाथ जी अयोध्या सुमंगला मेधप्रय चकवा ६ पद्मप्रभु जी कौशाम्बीपुरी सुसीमा धरण कमल ७ सुपार्श्वनाथ जी काशीनगरी पृथ्वी सुप्रतिष्ठ साथिया ८ चन्द्रप्रभु जी चंद्रपुरी लक्ष्मण महासेन चन्द्रमा ९ पुष्पदन्त जी काकन्दी रामा सुग्रीव मगर १० शीतलनाथ जी भद्रिकापुरी सुनन्दा दृढ़रथ कल्पवृक्ष ११ श्रेयान्सनाथ जी सिंहपुरी विष्णु विष्णुराज गेंडा १२ वासुपुज्य जी चम्पापुरी जपा वासुपुज्य भैंसा १३ विमलनाथ जी काम्पिल्य शमी कृतवर्मा शूकर १४ अनन्तनाथ जी विनीता सूर्वशया सिंहसेन सेही १५ धर्मनाथ जी रत्नपुरी सुव्रता भानुराजा वज्रदण्ड १६ शांतिनाथ जी हस्तिनापुर ऐराणी विश्वसेन हिरण १७ कुन्थुनाथ जी हस्तिनापुर श्रीदेवी...

२४ तीर्थंकर नाम

1. ऋषभदेव जी इन्हें 'आदिनाथ' भी कहा जाता है 2. अजितनाथ जी 3. सम्भवनाथ जी 4. अभिनंदन जी 5. सुमतिनाथ जी 6. पद्ममप्रभु जी 7. सुपाश्वॅनाथ जी 8. चंदाप्रभु जी 9. सुविधिनाथ जी इन्हें 'पुष्पदन्त' भी कहा जाता है 10. शीतलनाथ जी 11. श्रेंयांसनाथ जी 12. वासुपूज्य जी 13. विमलनाथ जी 14. अनंतनाथ जी 15. धर्मनाथ जी 16. शांतिनाथ जी 17. कुंथुनाथ जी 18. अरनाथ जी 19. मल्लिनाथ जी 20. मुनिसुव्रत जी 21. नमिनाथ जी 22. अरिष्टनेमि जी - इन्हें 'नेमिनाथ' भी कहा जाता है। जैन मान्यता में ये नारायण श्रीकृष्ण के चचेरे भाई थे। 23. पाश्वॅनाथ जी 24. महावीर स्वामी जी - इन्हें वर्धमान, सन्मति, वीर, अतिवीर भी कहा जाता है।

सराक

सराक एक जैनधर्मावलंवी समुदाय है। इस समुदाय के लोग बिहार, झारखण्ड, बंगाल एवं उड़ीसा के लगभग १५ जिलों में निवास करते हैं। इनकी संख्या लगभग १५ लाख है। सराक संस्कृत के शब्द श्रावक का अपभ्रंश रूप है। इसका अर्थ है श्रावक अर्थात जैनधर्म में आस्था रखने वाले श्रद्धालु। ये जैनधर्म के २३वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ के तीर्थकाल के प्राचीन श्रावकों की वंश परंपरा के उत्तराधिकारी हैं। सराक जाति पिछले दो हज़ार वर्षों से देश में व्यवस्थित शासन के अभाव, अराजकता, नैतिक अस्थिरता आदि परिस्थितियों में धर्मद्रोहियों से बचने के लिए जंगलों में भटकती रही है। समय की मार, क्रूर शासको के अत्याचारों के साथ-साथ अनेक झंझावातों एवं विपरीत परिस्थितियों को झेलते हुए भी उन्होंने अपने मूल संस्कारों जैसे-नाम/ गोत्र/ भक्ति/ उपासना/ पुजपध्दति/ जलगालन/ रात्रिभोजन त्याग/ अहिंसा की भावना को नहीं छोड़ा। परन्तु समाज के उपेक्षा-भाव तथा निर्ग्रन्थ साधुयों का साथ न मिलने के कारण वे जैन समाज की मूलधारा से कटकर आदिवासी और जनजाति की श्रेणी में आ गये।

कुछ सुंदर पंक्तियाँ

किसी की मजबूरियाँ पे न हँसिये, कोई मजबूरियाँ ख़रीद कर नहीं लाता ! डरिये वक़्त की मार से, बुरा वक़्त किसी को बताकर नही आता ! अकल कितनी भी तेज ह़ो, नसीब के बिना नही जीत सकती ! बीरबर अकलमंद होने के बावजूद, कभी बादशाह नही बन सका ! ना तुम अपने आप को गले लगा सकते हो, ना ही तुम अपने कंधे पर सर रखकर रो सकते हो ! एक दूसरे के लिये जीने का नाम ही जिंदगी है, इसलिये वक़्त उन्हें दो जो तुम्हे चाहते हों दिल से रिश्ते पैसो के मोहताज़ नहीं होते क्योंकि कुछ रिश्ते मुनाफा नहीं देते पर जीवन को अमीर जरूर बना देते है !

किसकी कीमत ज्यादा

इस जहाँ में, मैं किसकी कीमत ज्यादा समझूँ हे प्रभू तुम मिट्टी से इंसान को बनाते हो और इंसान मिट्टी से तुम्हे !

मुनि क्षमासागर

सूरज ने कहा- अपने द्वार खोलो मेरी रोशनी तुम्हारी होगी। वृक्षों ने कहा- मेरे करीब बैठो मेरी छाया तुम्हारी होगी। नदियों ने कहा- मेरे किनारे आकर हाथ बढ़ाओ मेरी बहती धारा तुम्हारी होगी। मैंने ऐसा ही किया अब रोशनी मेरी है छाया भी मेरी है मेरे जीवन की धारा निर्बाध बहती है। - मुनि क्षमासागर

किससे क्या कहना हैं।

आई लव यू अरिहंत से कहो,  आई मिस यू सामायिक से कहो,  आई हेट यू रागद्वेष से कहो,  आई बिलीव यू अगम कहो,  आई ट्रस्ट यू जिनवाणी से कहो,  आई एम जैन फखर से कहो,  मैसेज अछा लगे तो फॉरवर्ड करो,  वर्ना अपनी दुनिया में मगन रहो।

तुम भी महावीर बन जाओगे

मै को पहिचाना नही और हिँसा छोड दिया । जीवन को जाना नही और जीना छोड दीया । वैराग को समझा नही और गृहस्थ छोड दीया । धर्म को सीखा नही और धार्मिक बन गये । आचरण को जाना नही और नकल करते रहे । जैनी तुम्हे अगर है बनना महावीर को आचरण मे लाओ । पूजा उनकी बाद मे करना पहले उन्हे पहिचानो । मै को शरीर से अलग किया वो तप कहलाया । जब तप मे खाना भूल गये वो व्रत कहलाया । तप की तालिनता मे कपडे फट कर उतर गये वे दिगम्बर धारी कहलाये । आचरण को अपनाओगे तो तुम भी महावीर बन जाओगे ।  - श्री मति ज्योति जैन (कोलाघाट, कलकत्ता)

बुजुर्गो की संगति करो।

बुजुर्गो की संगति करो। क्योंकि बुजुर्गो के चेहरे की एक एक झुर्री पर हजार हजार अनुभव लिखे होते है। उनके कांपते हुये हाथ, हिलती हुई गर्दन लड़खड़ाते हुये कदम और मुर्झाया हुआ चेहरा सन्देश देता है की जो भी शुभ करना है वह आज, अभी और इसी वक़्त कर लो। कल कुछ भी नहीं कर पाओगे। बुढा व्यक्ति इस पृथ्वी का सबसे बड़ा शिक्षालय है क्योंकि उसे देखकर उगते सूरज की डूबती कहानी का बोध होता है।

खूब लिखा है

सांप बेरोजगार हो गये है अब आदमी काटने लगे, कुत्ते क्या करें ? जब तलवे आदमी चाटने लगे, कहीं चांदी के चमचे हैं तो कहीं चमचों की चांदी है, छोटी छोटी बातें दिल में रखने से, बड़े बड़े रिश्ते कमजोर हो जाते हैं, कभी पीठ पीछे आपकी बात चले तो घबराना मत, बात तो उन्हीं की होती है जिनमें कोई 'बात' होती है !

निवेदन हैं

गर्मी का मौसम आ गया है, प्रत्येक वर्ष गर्मी में हजारों पंछी प्यास के कारण मर जाते है, अत: आपसे निवेदन है कि अपने घर की छत या दीवार पर एक पानी का बर्तन जरुर रखें ताकि प्यासे पंछी अपनी प्यास बुझा सकें ! आपको भी मन मे शांति की अनुभूति प्राप्त होगी ! जय जिनेन्द्र
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